सेकुलर मिथक ध्वस्त करती ‘धुरंधर’
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सेकुलर मिथक ध्वस्त करती ‘धुरंधर’

यह फिल्म वह दिखा देती है, जिसे भारतीय नेता खुलकर बोलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे हर कोई जानता है, लेकिन सबसे ताकतवर लोग भी स्वीकार करने में असहाय दिखते हैं। ‘

Written byसुशील पंडितसुशील पंडित
Jan 3, 2026, 10:55 am IST
inमनोरंजन

आदित्य धर की फिल्म केवल पाकिस्तान द्वारा चलाए जा रहे जिहाद की कड़वी सच्चाई ही नहीं दिखाती, यह सेकुलर झूठ, इस्लामी-वामपंथी नैरेटिव को तोड़कर कैथार्सिस का तूफान खड़ा करती है।

सामान्य तौर पर मैं ‘धुरंधर’ देखने से आसानी से चूक जाता। लेकिन एक खास महिला, जो हर किसी से इसे न देखने की अपील करती घूम रही हैं, उनके कारण मैंने सब कुछ छोड़कर यह फिल्म देखने का फैसला किया। यहां तक कि फ्लाइट छूटने का जोखिम भी लिया और तीन लोगों को साथ ले गया।

कम से कम इतना तो तय है कि आदित्य धर को एक थैंक यू कार्ड जरूर भेजना चाहिए, अपनी फिल्म का स्वघोषित ब्रांड एम्बैसडर बनने के लिए। ‘धुरंधर’ देसी गॉडफादर है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है। यह भी जरूरी नहीं कि आदित्य धर कोई भारतीय कोपोला बनने की कोशिश कर रहे हों। इस फिल्म में वह कुछ ऐसा नहीं बता रहे, जो हमें पहले से पता न हो। खून-खराबे और हिंसा को लेकर जो हाइप बनाया गया है, हम इससे कहीं ज्यादा देख चुके हैं। और सच तो यह है कि दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने की वजह यह भी नहीं है।

भारतीय दर्शकों की कराची के स्लम-लॉर्डस में कोई दिलचस्पी नहीं है। वैसे भी, दुनिया के किसी भी कोने के स्लम-लॉर्डस, उनका राजनीतिक संरक्षण और उनके बीच की खूनी दुश्मनी-यह फिल्मी जॉनर बहुत पुराना है। सितारों की भूमिका भी भीड़ खींचने में सीमित ही है। ज्यादातर तो अब ढलान पर हैं। कुछ कलाकार जरूर चमकते हैं, लेकिन अपने स्टारडम के कारण नहीं, बल्कि उन किरदारों के कारण जिन्हें वे एक खास संदर्भ में निभाते हैं। मेरे हिसाब से ‘धुरंधर’ की असली जीत इसी संदर्भ में है। और वह संदर्भ है भारत के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा चलाया जा रहा जिहाद।

सीधी बात यह है कि यह फिल्म वह दिखा देती है, जिसे भारतीय नेता खुलकर बोलने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे हर कोई जानता है, लेकिन सबसे ताकतवर लोग भी स्वीकार करने में असहाय दिखते हैं। ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’ जैसी घिसी-पिटी, तथाकथित सेकुलर मातृत्व वाली पंक्तियां ‘धुरंधर’ में पूरी तरह ध्वस्त कर दी गई हैं।

हां, फिल्म की शुरुआत में लंबे-चौड़े डिस्क्लेमर और कुछ औपचारिक वाक्य तो आते हैं, पर पूरी फिल्म में वे गायब रहते हैं। यहां ‘मंकी बैलेंसिंग’ नहीं है। राजनीतिक शुचिता का बंदर बड़े नाटकीय ढंग से पीठ से उतार फेंका गया है। यही वजह है कि बॉक्स ऑफिस पर भीड़ उमड़ रही है। लोग अविश्वास में यह देखने आ रहे हैं कि आखिरकार वह साहस कैसे संभव हुआ, जो अब न सिर्फ कुछ फिल्मकारों, बल्कि सेंसर बोर्ड में भी दिखाई दे रहा है। झूठे नैरेटिव्स की घुटन से मिली यह आजादी सिनेमाघरों में एक तरह का कैथार्सिस बन जाती है। फिल्म की दो सौ मिनट से ज्यादा की अवधि को वही खुलापन और साफगोई आगे बढ़ाती है। इसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था।

अब जरा उस महिला की आपत्तियों पर भी बात हो जाए। क्या जिहाद की हिंसक और बर्बर सच्चाई को दिखाना पूरे समुदाय को निशाना बनाना है? यह तभी होगा, जब पूरा समुदाय खुद को उससे जोड़ने का फैसला करे। और अगर वह ऐसा करता है, तो फिर ठीक है। अब समय आ गया है कि भले-भाव वाले आस्थावान लोग भी एक सचेत चुनाव करें। आप हर बार हर ‘काफिर’ को मूर्ख नहीं बना सकते।

कोई भी ग्रंथ या संदर्भ, चाहे वह कितना ही दैवी क्यों न बताया जाए, किसी को ‘दूसरा’ ठहराने या अंधाधुंध हत्या को जायज ठहराने का आधार नहीं हो सकता। सुविधा के हिसाब से आयतें चुनना-कभी खरगोश के साथ दौड़ना, कभी शिकारी कुत्ते के साथ- अब टिकाऊ रणनीति नहीं रह गई है।

Topics: राजनीतिक संरक्षणधुरंधर फिल्ममंकी बैलेंसिंगसचेत चुनावआतंक और मानवताकाफिर (Kafir)
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