उन दिनों चन्द्रशेखर आजाद झांसी में थे। वहां बुन्देलखण्ड कम्पनी में मोटर चलाना सीख रहे थे। क्रांन्तिकारी कार्यों में वे लगे ही रहते थे। स्थिति यह थी कि उन्हें चने खाकर समय व्यतीत करना पड़ता था।
एक दिन चन्द्रशेखर के पास इकन्नी बची थी। उन्होंने दिन भर कुछ नहीं खाया था। सांझ हुई तो दिन भर की भूख उछाल मारने लगी। चन्द्रशेखर आजाद इकन्नी के भुने हुए चने ले आये।
वे चने खा ही रहे थे कि चनों के बीच एक इकन्नी निकल आयी। वाह ! इससे कल का काम भी चल जायेगा; परसों की चिन्ता फिर करेंगे। किन्तु तभी वे गम्भीर हो गये। सोचने लगे कि यह इकन्नी मेरी कैसे हो सकती है , लगता है यह भूल से चली आयी है।
चने खाकर चन्द्रशेखर ने एक लोटा पानी पी लिया। फिर पहुंचे चने वाले के पास और बोले-क्यों भाई, तुमने मुझे एक आने के चने दिये और साथ में एक इकन्नी भी डाल दी ! ऐसा करोगे तो क्या कमाओगे? वह जब तक कुछ समझे और उत्तर दे, आजाद उसे इकन्नी देकर चले गए।
गरीब भड़भूरा कभी वापस की गयी इकनों को देखता तो कभी सड़क पर जाते उस युवक को। मन ही मन सत्यनिष्ठ जवान की वह प्रशंसा कर रहा था।











