सभ्यता का सबसे बड़ा दुश्मन वह हथियार नहीं, बल्कि वह दवा है, जिसका उचित प्रयोग करना इंसान भूल जाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में जनता से अपील की कि वे दवाओं के उपयोग में सावधानी बरतें। दवा खासकर एंटीबायोटिक के सेवन से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
मानव इतिहास के लंबे सफ़र में, चिकित्सा क्षेत्र में कुछ खोजें ऐसी हुईं जिन्होंने जीवन की दिशा ही बदल दी। एंटीबायोटिक ऐसी ही एक अद्भुत खोज थी । बीसवीं सदी की शुरुआत में जब भी साधारण इंफेक्शन जैसे निमोनिया, टाइफाइड, सेप्टीसीमिया या प्रसव या सामान्य घाव के बाद संक्रमण होते थे, तो मृत्यु लगभग निश्चित मानी जाती थी। लेकिन 1928 में अलेक्ज़ेंडर फ्लेमिंग द्वारा पेनिसिलिन की खोज ने चिकित्सा जगत में क्रांति ला दी। यह खोज ऐसी थी कि इससे लाखों सैनिकों को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान मृत्यु से बचाया जा सका और इसके बाद धीरे-धीरे चिकित्सा विज्ञान ने तेज़ गति से प्रगति करते हुए 100 से अधिक प्रकार की प्रभावी एंटीबायोटिक दवाएँ तैयार कर लीं।
इन दवाओं ने जटिल ऑपरेशनों, प्रसव, कैंसर-उपचार, ट्रांसप्लांट , गंभीर जीवाणुजनीत रोगों और आपात चिकित्सा में असीम संभावनाएँ खोल दीं और मानव जीवन को लगभग सुरक्षित कर दिया । किन्तु आज, वही एंटीबायोटिक्स मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही हैं। यह संकट है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) कहते हैं। यह एक धीरे फैलने वाला, मौन, लेकिन अत्यंत घातक संकट है, जिसे न तो आम जनता समझ पा रही है और न ही चिकित्सा जगत उतनी गंभीरता से ले पा रहा है जितनी आवश्यकता है।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस क्या है?
जब बैक्टीरिया बार-बार एंटीबायोटिक दवाओं का सामना करते हैं, तो वे अपने भीतर ऐसे परिवर्तन (म्यूटैशन ) करते हैं जिससे दवा का असर निष्प्रभावी हो जाता है। इस प्रकार जब अगली बार वही दवा दी जाती है, तो बैक्टीरिया बच जाते हैं और अधिक ताकतवर बन कर फैलते हैं। इन बैक्टीरिया को ही सुपरबग्स कहा जाता है—जो अब सामान्य दवाओं से नष्ट नहीं होते और कभी-कभी सभी उपलब्ध दवाओं को परास्त कर देते हैं। परिणामस्वरूप बीमारी लंबी चलती है और गंभीर बन जाती है, अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता बढ़ जाती है, इलाज की लागत कई गुना बढ़ जाती है, आईसीयू और सर्जरी में जोखिम अत्यधिक बढ़ जाता है, और मृत्यु का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है। अर्थात यदि एंटीबायोटिक अपना असर खो दें, तो आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था लगभग ढह जाएगी।
चेतावनी देतीं रिपोर्ट
विश्व स्वास्थ्य संगठन और द लेसेन्ट की रिपोर्टें स्पष्ट चेतावनी देती हैं कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अब भविष्य का संकट नहीं, बल्कि वर्तमान में तेजी से फैलती हुई महामारी है।
2019 में लगभग 13 लाख लोग सीधे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण मरे, जबकि 50 लाख मौतें ड्रग-रेजिस्टेंट संक्रमण से जुड़ी रहीं।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर 6 में से 1 बैक्टीरियल संक्रमित मरीज पर दवाएं असर नहीं करतीं। 2023 में जारी वैश्विक आंकड़ों में 40% से अधिक बैक्टीरिया ऐसे मिले जिन पर सामान्य एंटीबायोटिक बिल्कुल प्रभावी नहीं रहीं। वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि दुनिया ने अभी कार्रवाई नहीं की, तो 2050 तक हर वर्ष 1 करोड़ लोग एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस से मरेंगेजो कैंसर और दिल की बीमारी से भी अधिक होगा। आर्थिक आँकड़े और भी डराते हैं , वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस 2030 तक वैश्विकजीडीपी में 3–4% की गिरावट ला सकता है। 2.8 करोड़ लोग गरीबी में धकेले जा सकते हैं, क्योंकि इलाज महँगा और जटिल होता जाएगा। अर्थात यह संकटबहुआयामी है क्योंकि यह न सिर्फ स्वास्थ्य का है, बल्कि अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और मानव अस्तित्व का भी है।
भारत की स्थिति क्यों सबसे अधिक खतरनाक है?
भारत आज एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के वैश्विक संकट के मुहाने पर खड़ा दिखाई देता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत दुनिया में एंटीबायोटिक दवाओं का सबसे बड़ा उपभोक्ता बन चुका है और इनके दुरुपयोग की गति भी यहाँ सबसे अधिक तेज़ है। एंटीबायोटिक का सहज, अनियंत्रित और अक्सर अवैज्ञानिक उपयोग इस संकट को लगातार गहरा करता जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की रिपोर्टें और हालिया चिकित्सा विश्लेषण स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, भारत में हर छह में से एक बैक्टीरियल संक्रमण अब सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं से ठीक नहीं होता। यह आँकड़ा अपने आप में यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि दवाओं की प्रभावशीलता किस हद तक समाप्त होती जा रही है। अस्पतालों, विशेषकर गहन चिकित्सा इकाइयों (ICU) की स्थिति और भी चिंताजनक है। विभिन्न अध्ययनों में यह सामने आया है कि ICU में होने वाले 80 प्रतिशत से अधिक संक्रमण सुपरबग्स से जुड़े होते हैं, यानी ऐसे बैक्टीरिया से जो शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाओं को भी निष्प्रभावी बना चुके हैं। उदाहरण के लिए, Acinetobacter baumannii नामक बैक्टीरिया में Meropenem जैसी अंतिम पंक्ति की दवा के प्रति लगभग 91 प्रतिशत प्रतिरोध पाया गया है। इसी प्रकार, Klebsiella pneumoniae में Carbapenem समूह की दवाओं के प्रति 56 प्रतिशत तक प्रतिरोध दर्ज किया गया है।
ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन की स्थिति भयावह
रक्तप्रवाह संक्रमण (ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन) की स्थिति भी कम भयावह नहीं है। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार, ऐसे लगभग 72 प्रतिशत संक्रमण ड्रग-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया के कारण होते हैं, जिनका उपचार सीमित और अत्यंत जटिल हो चुका है। इन सभी तथ्यों का समग्र परिणाम यह है कि भारत में हर वर्ष अनुमानतः तीन लाख से अधिक मौतें सीधे तौर पर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से जुड़ी मानी जा रही हैं। इसका अर्थ यह है कि अस्पतालों में डॉक्टरों के पास उपचार के विकल्प कम होते जा रहे हैं और चिकित्सा विज्ञान अपनी सीमाओं से टकरा रहा है।
यह संकट क्यों बढ़ा?
भारत में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल, साथ ही रोगियों का त्वरित उपचार के लिए डॉक्टर पर दबाब डालना , जब लोग स्वयं दवा लेकर सेवन करते हैं, तो सही खुराक और अवधि का पालन नहीं हो पाता, जिससे बैक्टीरिया तेजी से प्रतिरोधक बन जाते हैं। दूसरा प्रमुख कारण यह है कि वायरल रोगों—जैसे सर्दी-जुकाम, फ्लू या सामान्य बुखार—में भी एंटीबायोटिक का उपयोग किया जाता है, जबकि इन विषाणुजनीत रोगों पर इन एंटिबयोटिक्स दवाओं का कोई प्रभाव नहीं होता। उलटे, बैक्टीरिया को दवाओं के विरुद्ध मजबूत बनने का मौका मिल जाता है। तीसरी बड़ी गलती है एंटीबायोटिक का कोर्स अधूरा छोड़ देना। जैसे ही रोगी को कुछ आराम महसूस होता है, दवा बंद कर दी जाती है। इससे कमजोर बैक्टीरिया तो नष्ट हो जाते हैं, लेकिन सबसे मजबूत बैक्टीरिया जीवित बच जाते हैं और आगे चलकर सुपरबग्स का रूप ले लेते हैं।
पशुपालन और पोल्ट्री उद्योग में एंटीबायोटिक का अंधाधुंध उपयोग
इसके अतिरिक्त, पशुपालन और पोल्ट्री उद्योग में एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध उपयोग भी इस संकट को बढ़ा रहा है। जानवरों को जल्दी बढ़ाने और बीमारियों से बचाने के नाम पर दी गई दवाएँ भोजन श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में पहुँचती हैं और प्रतिरोधक बैक्टीरिया को और मजबूत करती हैं। झोलाछाप डॉक्टरों और मेडिकल स्टोरों पर एंटीबायोटिक की खुलेआम बिक्री स्थिति को और गंभीर बनती है । जब दवाएँ आसानी से उपलब्ध होती हैं, तो उनका दुरुपयोग कई गुना बढ़ जाता है और खतरे की गति भी उसी अनुपात में तेज़ हो जाती है। इसके साथ ही, स्वच्छता का अभाव, भीड़भाड़, और सुरक्षित पानी की कमी संक्रमण के प्रसार को और आसान बना देती है, जिससे एंटीबायोटिक पर निर्भरता लगातार बढ़ती जाती है। आज भारत में एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह बन गई है कि जैसे ही किसी व्यक्ति को संक्रमण का संदेह होता है, उसकी पहली माँग एंटीबायोटिक की होती है। यही मानसिकता इस पूरे संकट की जड़ में है और यही आदत सबसे अधिक विनाशकारी सिद्ध हो रही है।
क्या समाधान संभव है?
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का यह संकट अजेय नहीं है, लेकिन इसके लिए त्वरित, दृढ़ और सामूहिक निर्णय अनिवार्य हैं। यदि आज सही दिशा में कदम उठा लिए जाएँ, तो भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है। सबसे पहले व्यक्तिगत स्तर पर बदलाव आवश्यक है। आम नागरिक को यह समझना होगा कि एंटीबायोटिक कोई सामान्य दर्दनिवारक नहीं है। डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक लेना बंद करना होगा और जब दवा दी जाए तो उसका पूरा कोर्स ईमानदारी से पूरा करना होगा। वायरल रोगों—जैसे सर्दी-जुकाम, फ्लू या सामान्य बुखार—में एंटीबायोटिक की मांग नहीं की जानी चाहिए। साथ ही, स्वच्छता की आदतें और नियमित टीकाकरण संक्रमण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चिकित्सकीय स्तर पर हर अस्पताल में एंटीबायोटिक स्टीवर्डशिप कार्यक्रम को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। दवाओं का चयन अनुमान के बजाय कल्चर-सेंसिटिविटी टेस्ट के आधार पर हो और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण व स्वच्छता के नियमों का कठोरता से पालन किया जाए।
एंटीबायोटिक का दुरुपयोग न करें
सरकारी स्तर पर बिना प्रिस्क्रिप्शन एंटीबायोटिक बिक्री पर सख्त नियंत्रण, पोल्ट्री व पशुपालन में दवाओं के उपयोग का नियमन, राष्ट्रीय AMR सर्विलांस नेटवर्क का विस्तार तथा नई दवाओं और वैक्सीन के लिए अनुसंधान में निवेश अनिवार्य है। इसके साथ-साथ व्यापक जन-जागरूकता अभियान “एंटीबायोटिक बचाओ, भविष्य बचाओ” समय की मांग है।
एंटीबायोटिक मानव सभ्यता का महान वरदान रही हैं, पर हमारे दुरुपयोग ने उन्हें कमजोर कर दिया है। यदि आज विवेक नहीं अपनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ ऐसी दुनिया में रहेंगी जहाँ दवाएँ होंगी, पर असर नहीं होगा। यह लड़ाई केवल डॉक्टर या सरकार की नहीं, बल्कि हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। संवेदनशीलता, जागरूकता और अनुशासन ही एंटीबायोटिक विहीन भविष्य से मानवता को बचा सकते हैं>

















