हाल ही में उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में फास्ट फूड के अत्यधिक सेवन से 16 वर्षीय एक छात्रा की मौत हो गई। 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा को बचपन से ही फास्ट फूड खाने का शौक था। वह घर के बने खाने के बजाय हर दिन चाऊमीन, मैगी, पिज्जा और बर्गर खाना पसंद करती थी। परिवार वालों के मना करने के बाद भी उसकी आदतें नहीं बदलीं। लंबे समय से खराब खानपान के कारण उसकी आंतें आपस में चिपक गई थीं और पाचन तंत्र पूरी तरह बिगड़ चुका था। पेट में काफी मात्रा में पानी भर गया था। हालत गंभीर होने पर सर्जरी की गई, लेकिन इलाज के दौरान दिल्ली एम्स में उसकी मौत हो गई। सोशल मीडिया पर अहाना के पिता का भावुक पोस्ट भी खूब वायरल हो रहा है, जिसमें वह बच्चों को फास्ट फूड न देने की अपील कर रहे हैं।
अहाना की मौत पर देश भर में चर्चा
यह घटना सभी माता-पिता, स्कूल और समाज के लिए एक कड़ा संदेश है, जो बताती है कि फास्ट फूड हमारे स्वास्थ्य के लिए कितने हानिकारक साबित हो सकते हैं। अहाना की मृत्यु के अन्य गंभीर मेडिकल कारण भी हो सकते हैं, परन्तु सवाल अभी भी वही है कि आखिर अभिभावक अपने बच्चों को फास्ट फूड के नाम पर क्या खिला रहे हैं? क्यों वे अपने बच्चों की जिद के आगे बेबस हो जाते हैं और उन्हें इस पर निर्भर रहने की आदत डाल देते हैं? आखिर क्यों स्वास्थ्य विभाग का ध्यान स्कूल-कॉलेज के अंदर और बाहर फास्ट फूड की दुकानों और ठेले लगाने वालों पर नहीं जा रहा?
फास्ट फूड से बच्चों के साथ युवाओं को भी खतरा
यह सच है कि भारत में फास्ट फूड खाने के शौकीनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आज हर गली-मोहल्ले में कम दाम में फास्ट फूड मिल रहे, जिन्हें बच्चों से लेकर बड़े सभी चाव से खा रहे हैं। हर शहर, कस्बे यहां तक की गांवों में भी शाम से शुरू होकर देर रात फास्ट फूड बेचने वालों के ठेले खूब घूम रहे हैं। कई स्कूलों-कालेजों के अंदर फास्ट फूड की दुकानें व बाहर खड़े ठेलों ने बच्चों और युवाओं की सेहत को खतरे में डाल दिया है। खाद्य विभाग के इस ओर ध्यान नहीं देने के कारण गली-मोहल्लों में खड़े फास्ट फूड के ठेलों पर कड़ाही में बर्गर, भजिया, समोसे, फ्रेंच फाइज, समोसे, चाऊमीन, मोमोज तले जा रहे हैं। तेल कैसा है, खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता क्या है, इसकी अनदेखी की जा रही है। खाद्य विभाग ने भी आज तक इन स्ट्रीट फूड बेचने वालों से जांच के लिए नमूना नहीं लिया है। लैंसेट पत्रिका के वर्ष 2019 में किए गए एक शोध के अनुसार, भारत में हर साल खराब गुणवत्ता वाला भोजन खाने की वजह से सैकड़ों मौतें होती हैं। वहीं, वैश्विक स्तर यह आंकड़ा पांच में से एक व्यक्ति की मौत का है।
स्वाद के लिए मिलाया जाता है केमिकल और सिंथेटिक रंग
फास्ट फूड में स्वाद के लिए केमिकल और सिंथेटिक रंग मिलाए जाते हैं। इसमें बहुत अधिक तेल, चीनी और नमक होता है, जबकि शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व बहुत कम मात्रा में होते हैं। एक ही तेल में बार-बार तले गए फास्ट फूड लगातार खाने से वजन बढ़ने लगता है और पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। खासकर बच्चों के शरीर पर इसका असर बहुत जल्दी दिखता है। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है और बच्चे जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं। साफ-सफाई में कमी के कारण डायरिया भी हो सकता है। इसके अलावा लंबे समय तक फास्ट फूड खाने से आंतों में संक्रमण हो जाता है, क्योंकि ये आतों में जाकर फंस जाते हैं और उसे छलनी कर देते हैं। सर्जरी द्वारा भी आंतों को नहीं बदला जा सकता।
संतुलित, पौष्टिक खाना सुरक्षित भविष्य की कुंजी
संतुलित, पौष्टिक खाना बच्चों व किशोरों के सही विकास और सुरक्षित भविष्य की कुंजी है। माता-पिता का बच्चों की खाने की आदतों पर समय रहते ध्यान देना बेहद जरूरी है। उनके भोजन में प्रतिदिन फल, सब्जियां, दालें, प्रोटीन और घर का बना ताजा खाना होना चाहिए। दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय बच्चों को फास्ट फूड से दूरी बनाने के लिए कहें। उन्हें इससे होने वाले नुकसान के बारे में समझाएं। उनको अच्छी सेहत के लिए हरी सब्जियां और पौष्टिक भोजन कितना आवश्यक के इसके बारे में बताएं। दूसरी ओर खाद्य विभाग को भी समय-समय पर गली-मोहल्लों और दुकानों में बिकने वाले फास्ट फूड की जांच करनी चाहिए। स्ट्रीट फूड के नमूने लेने के लिए अभियान चलाया जाना चाहिए। खराब गुणवत्ता वाली खाद्य सामग्री की बिक्री पर रोक लगाई जानी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग की टीम को स्कूल-कॉलेज में जाकर बच्चों को इसके प्रति जागरूक करना चाहिए।
















