राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने मध्य प्रदेश के सतना जिले में थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों के एचआईवी संक्रमित पाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया है और जांच के आदेश दिए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने रविवार (28 दिसंबर) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने पोस्ट शेयर कर बताया कि मध्य प्रदेश के सतना में बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाकर संक्रमित किया गया। हमने इस मामले पर संज्ञान लिया है और जांच के आदेश दिए हैं।
अस्पताल की लापरवाही से हैरान
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने लगातार देश के बच्चों के हित में काम किया है। जीवन की आस में अस्पताल में खून चढ़वाने गए बच्चों को लापरवाही के कारण लाइलाज बीमारी मिल गई है। उन्होंने अस्पताल की गंभीर चूक पर हैरानी जताते हुए लिखा, “आज सतना जिले के दौरे पर हूं। शनिवार (27 दिसंबर) को जिला कलेक्टर को फोन पर सूचित किया गया था कि वह पीड़ितों के परिजनों से मिलने की व्यवस्था कर दें। परंतु प्रशासन मामले को दबाने में इतना लिप्त है कि ना तो परिजनों को सूचित कर बुलवाया गया, ना ही उनके पतों की जानकारी दी गई है।”
प्रशासन की सुस्ती सवालों के घेरे में
इस मामले को गंभीरता से न लेने के कारण प्रशासन सवालों के घेरे में है। कानूनगो अपनी पोस्ट में आगे लिखते हैं कि असहाय सी सूरत के साथ एसडीएम साहब बता रहे हैं कि पीड़ित लोग प्रशासन की बात नहीं सुन रहे हैं इसलिए हम उनको आपसे मिलवाने में अक्षम हैं। पते की जानकारी गोपनीय है, इसलिए हम आपको नहीं दे सकते हैं। गजब ही है…
स्वास्थ्य विभाग संक्रमित डोनर को पकड़ने में नाकाम
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सतना जिला अस्पताल में जनवरी से मई 2025 के बीच बच्चों में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई और यह मामला अब सामने आया है। हालांकि इतने महीनों बाद भी स्वास्थ्य विभाग उस संक्रमित डोनर (रक्तदाता) को पकड़ नहीं पाया है। ब्लड बैंक प्रभारी देवेंद्र सिंह के अनुसार 57 थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों में से चार एचआईवी पॉजिटिव मिले हैं। उन्होंने आशंका जताई कि जांच किट खराब होने की वजह से शायद स्क्रीनिंग में गलती हुई हो। अभी तक 50 प्रतिशत डोनर्स की ही दोबारा जांच हो पाई है। कुछ दिन से यह मामला और गरमा गया है। बताया जा रहा है कि थैलीसीमिया से पीड़ित चार नहीं बल्कि छह मासूम बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाया गया था, जिससे वे सभी एचआईवी पॉजिटिव हो गए। यहां स्वास्थ्य विभाग की घोर लापरवाही का आलम यह है कि जांच टीम में उन्हीं लोगों को शामिल किया गया है, जो ब्लड बैंक के जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं।
थैलीसीमिया में बच्चों को हर महीने चढ़ाना होता है खून
ज्ञात हो कि थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों को जीवित रहने के लिए हर महीने खून चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की जरूरत होती है। किसी को महीने में दो तो किसी को तीन बार रक्त चढ़ाया जाता है। इसके लिए किसी भी डोनर का खून लेने से पहले उसकी एचआईवी, हेपेटाइटिस समेत कई गंभीर बीमारियों की जांच अनिवार्य होती है, लेकिन सतना ब्लड बैंक में इस प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाई गईं। संक्रमित रक्त को बिना किसी जांच के मासूमों की धमनियों में चढ़ा दिया गया, जिसे अब ये बच्चे थैलीसीमिया के साथ-साथ एचआईवी से भी जूझने को मजबूर हैं।
पहले भी सामने आ चुके हैं अस्पतालों में घोर लापरवाही के मामले
बता दें कि इससे पहले भी मध्य प्रदेश के कई अस्पतालों में घोर लापरवाही के मामले सामने आ चुके हैं। इस वर्ष सितंबर में इंदौर जिले के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवाय के एनआईसीयू में चूहों ने दो मासूम नवजातों को काट लिया था, जिसके बाद एक मासूम की दर्दनाक मौत हो गई थी। हालांकि अस्पताल प्रबंधन ने चूहे के काटने के कारण मौत होने की बात से इनकार किया था। वहीं, कुछ दिन पहले रीवा के संजय गांधी अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में आग लगने से एक नवजात बच्चे की मौत हो गई थी।

















