Ram Mandir History: 500 साल के संघर्ष के बाद कैसे मिला रामलला को न्याय?
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Ram Mandir History: 500 साल के संघर्ष के बाद कैसे मिला रामलला को न्याय?

राम मंदिर विवाद की शुरुआत साल 1528 से मानी जाती है। उस समय भारत में मुगल शासक बाबर का शासन स्थापित हो चुका था। इतिहासकारों के अनुसार, बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के आदेश पर अयोध्या में स्थित भगवान श्रीराम के प्राचीन मंदिर को तुड़वा दिया।

Written byMahak SinghMahak Singh
Dec 24, 2025, 06:01 pm IST
inभारत
Ram Mandir History

Ram Mandir History

31 दिसंबर को अयोध्या में बने भव्य श्रीराम मंदिर की दूसरी वर्षगांठ मनाई जाएगी। आज यह मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था और विश्वास का प्रतीक बन चुका है। लेकिन राम मंदिर का निर्माण आसान नहीं था। इसके पीछे लगभग 500 साल लंबा संघर्ष, कई आंदोलन, अदालतों में चली लंबी सुनवाई और अनेक राम भक्तों का बलिदान जुड़ा हुआ है। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको राम मंदिर के पूरे इतिहास के बारे में बताएंगे-

मीर बाकी ने तोड़वाया राम मंदिर

राम मंदिर विवाद की शुरुआत साल 1528 से मानी जाती है। उस समय भारत में मुगल शासक बाबर का शासन स्थापित हो चुका था। इतिहासकारों के अनुसार, बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबर के आदेश पर अयोध्या में स्थित भगवान श्रीराम के प्राचीन मंदिर को तुड़वा दिया। मंदिर को तोड़कर उसी स्थान पर एक नया ढांचा बनवाया गया, जिसे आगे चलकर बाबरी ढांचा कहा गया। हिंदू समाज का विश्वास रहा है कि यही स्थान भगवान श्रीराम का जन्मस्थान है।

1838: पहली बार हुआ सर्वे

कई वर्षों तक यह विवाद दबा रहा। फिर 1838 में ब्रिटिश शासन के दौरान अयोध्या में पहली बार आधिकारिक सर्वे किया गया। इस सर्वे को ब्रिटिश अधिकारी मॉन्टगोमेरी मार्टिन ने किया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बाबरी ढांचे में लगे कई खंभे और संरचनाएं किसी पुराने हिंदू मंदिर से ली गई लगती हैं। इस रिपोर्ट के बाद अयोध्या में माहौल गरमा गया और हिंदू समुदाय ने दावा किया कि बाबरी ढांचे की जगह पहले राम मंदिर था।

1853-1859: पहला दंगा और दीवार का निर्माण

साल 1853 में अयोध्या में पहली बार हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच दंगे हुए। विवाद बढ़ने पर मुस्लिम पक्ष ने जिला मजिस्ट्रेट के पास शिकायत दर्ज कराई। स्थिति को शांत करने के लिए 1859 में प्रशासन ने बाबरी ढांचे के अंदर एक दीवार बनवा दी। इसके बाद मुसलमानों को ढांचे के अंदर नमाज पढ़ने की अनुमति मिली। हिंदुओं को बाहर पूजा करने की अनुमति दी गई।

1885: मामला पहली बार अदालत पहुंचा

1885 में राम मंदिर विवाद पहली बार अदालत पहुंचा। निर्मोही अखाड़े के महंत रघुवर दास ने फैजाबाद की अदालत में याचिका दायर की। उन्होंने बाबरी ढांचे के पास राम मंदिर बनाने की अनुमति मांगी, लेकिन 1886 में अदालत ने यह याचिका खारिज कर दी। हालांकि इससे हिंदू समाज निराश हुआ, लेकिन संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1947: आज़ादी के बाद आंदोलन को मिली नई ताकत

1947 में भारत आज़ाद हुआ। आज़ादी के बाद राम मंदिर आंदोलन ने फिर से जोर पकड़ लिया। साधु-संतों और हिंदू संगठनों ने इस मुद्दे को सक्रिय रूप से उठाना शुरू किया। दिसंबर 1949 में अयोध्या में 9 दिनों का रामचरितमानस पाठ आयोजित किया गया, जिससे माहौल और धार्मिक हो गया।

1949: रामलला की मूर्ति प्रकट हुई

23 दिसंबर 1949 की रात बाबरी ढांचे के अंदर भगवान श्रीराम की मूर्ति प्रकट हुई। इसके बाद बड़ी संख्या में लोग वहां पूजा करने पहुंचने लगे। मुस्लिम पक्ष ने आरोप लगाया कि हिंदुओं ने जबरन मूर्ति रखी है। स्थिति बिगड़ने पर प्रशासन ने उस स्थान को विवादित घोषित कर दिया और वहां ताला लगा दिया गया।

1950: पूजा और मूर्ति को लेकर मुकदमे

1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो केस फाइल किए गए, जिसमें राम लल्ला की पूजा करने और मूर्ति को उसी जगह पर रखने की इजाज़त मांगी गई थी। कोर्ट ने मूर्ति हटाने से मना कर दिया, लेकिन रेगुलर पूजा पर रोक लगा दी। इस फैसले के बाद राम मंदिर आंदोलन को नई दिशा मिली।

1959-1961: जमीन पर अधिकार की लड़ाई

1959 में निर्मोही अखाड़े ने विवादित स्थल पर कब्जे के लिए मुकदमा दायर किया। अखाड़े ने राम चबूतरा सहित पूरी 2.77 एकड़ जमीन पर अधिकार मांगा। 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी अदालत में केस दायर किया और दावा किया कि वहां बाबरी ढांचा पहले भी था और अब भी है।nइसके बाद यह मामला करीब 20-25 साल तक अदालतों में चलता रहा।

1986: ताला खुला, पूजा शुरू

1 फरवरी 1986 को फैजाबाद कोर्ट ने बाबरी ढांचे का ताला खोलने का आदेश दिया। इसके साथ ही हिंदुओं को अंदर जाकर पूजा करने की अनुमति मिल गई।nइस फैसले से हिंदू समाज में खुशी की लहर दौड़ गई, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इस फैसले का विरोध किया और मामला हाई कोर्ट पहुंच गया।

1989: हाई कोर्ट का अहम आदेश

14 अगस्त 1989 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। इससे राम जन्मभूमि पक्ष को बड़ी राहत मिली और आंदोलन और तेज हो गया।

1990: कारसेवा और गोलीकांड

30 अक्टूबर 1990 को देशभर से हजारों कारसेवक अयोध्या पहुंचे। उस दिन अयोध्या में कर्फ्यू लगाया गया था, लेकिन फिर भी भारी भीड़ जमा हो गई। कारसेवक बाबरी ढांचे पर चढ़ गए और भगवा झंडा फहरा दिए। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश पर पुलिस ने निहत्थे कारसेवकों पर गोली चला दी। 2 नवंबर 1990 को भी ऐसी ही घटना हुई, जिसमें कई राम भक्त मारे गए। इनमें कोठारी बंधु भी शामिल थे।

1992: बाबरी ढांचे का विध्वंस

6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने विवादित बाबरी ढांचे को गिरा दिया। इसके बाद पूरे देश में तनाव फैल गया। उसी दिन शाम तक उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

2002: गोधरा कांड

2002 में कारसेवकों को लेकर जा रही ट्रेन को गोधरा में आग लगा दी गई। इस घटना में कई लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद गुजरात में बड़े दंगे हुए।

2003: ASI की खुदाई

अप्रैल 2003 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को खुदाई का आदेश दिया। ASI ने छह महीने तक खुदाई की। रिपोर्ट में ASI ने बताया कि वहां 10वीं से 12वीं सदी के हिंदू मंदिर के अवशेष मिले।
खंभे, ईंटें और शिलालेख पाए गए।

2010: हाई कोर्ट का फैसला

30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया- रामलला, निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड।

2011: सुप्रीम कोर्ट की रोक

तीनों पक्ष इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

2018–2019: अंतिम सुनवाई

2018 में सुप्रीम कोर्ट में नियमित सुनवाई शुरू हुई। जनवरी 2019 में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच जजों की संवैधानिक पीठ बनाई गई। 6 अगस्त 2019 से रोज़ाना सुनवाई हुई और 16 अक्टूबर 2019 को फैसला सुरक्षित रखा गया।

9 नवंबर 2019: ऐतिहासिक फैसला

9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। पूरा 2.77 एकड़ विवादित भूमि श्रीराम जन्मभूमि को सौंप दी गई। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अलग जगह देने का आदेश दिया गया।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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