पाञ्चजन्य के सागर मंथन संवाद 4.0 में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने बिहार के राज्यपाल डॉ आरिफ मोहम्मद खान ने विभिन्न विषयों पर चर्चा की। इस्लाम और शरिया के नाम पर हिंसा करने वालों को कड़ा संदेश दिया कि जो लोग शरिया की वकालत करते हैं, वो पहले लोगों का दिल जीतें।
शाहबानों प्रकरण से लेकर आज तक आप मजहब और संविधान के रिश्ते पर लगातार सार्वजनिक असहमति दर्ज कराते रहे हैं। इन सारी बहस में आप मुस्लिम समाज को कैसे देखते हैं? और क्या मुस्लिम समाज इसे समझने में परिपक्व हुआ है?
मैं किसी भी विषय पर अपने विचार दे सकता हूं। मैं किसी के बारे में अनुमान नहीं लगा सकता। हां अंग्रेजों के वक्त में अलग इलेक्टोरेट था। आस्था की बात करें तो भारतीय दृष्टिकोण को बहुत ही सुंदरता से रामकृष्ण परमहंस ने बताया था कि ‘यतो मत तथो पथ’। आप किसी भी परिवार या समुदाय के व्यक्तियों को पर्ची दीजिए और उनके मत पूछिए तो वो अलग-अलग ही होंगे।
क्या आपने कुरान और भारतीय संविधान के बीच कोई नैतिक रिश्ता पाया है? अगर पाया है, तो वो क्या है, जिसे सार्वजनिक विमर्श में नजरअंदाज कर दिया जाता है?
कुरान का 12वां चैप्टर है, जो कि पैगंबर यूसुफ के नाम से है, जिसमें कहा गया है कि वो बहुत ही आकर्षक थे और पिता के प्यारे थे, जिससे बाकी भाइयों को इससे जलन होने लगी और उन्हें कुएं में फेंक दिया। वो और एक छोटा भाई एक मां से थे और 10 भाई एक मां से थे। बाद में उन्हें किसी ने कुएं से बाहर निकाला और गुलाम बनाकर बेंच दिया। ये वो दौर था, जब यहूदी समुदाय मिस्र में स्थापित हुई। कुरान के अनुसार, पैगंबर को भी इसकी इजाजत नहीं है कि वो जिस देश में रहते हैं, वहां के कानून को तोड़ें।
भारत ही नहीं, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी में भी कुछ लोग शरिया की मांग कर रहे हैं। लेकिन, जिस देश में आप रहते हैं, वहां के कानून को चुनौती देना तो कुरान की दृष्टि से भी गलत है?
शरीयत से ऐतराज किसको है। शरीयत का अर्थ है कानून। दुनिया में आज अधिकतर लोकतंत्र है, आप लोगों का दिल जीतिए और उनका समर्थन लीजिए। कुरान एक अरबी और फारसी का शब्द है, हिंदी में इसे विधि कहते हैं। लेकिन, कुरान में कहीं भी कानून शब्द का जिक्र नहीं हुआ है। भारतीय संदर्भ में देखें, तो स्मृति, श्रुति नहीं है। अगर श्रुति, स्मृति का काम कर रही होती तो फिर इसे लिखने की आवश्यकता नहीं होती। श्रुति का उद्देश्य कुछ और है, जबकि स्मृति का उद्देश्य समाज का संरक्षण है। इसलिए, कानून बनाने का एक तरीका है, लोगों का दिल जीतिए और बनाइए कानून। आप क्या तलवार से कानून की हुकूमत कायम करना चाहते हो।
आप अपनी बातचीत में संस्कृत का इस्तेमाल करते हैं, तो अरबी और फारसी की वकालत करने वाला मुस्लिम समाज आपसे गुस्सा नहीं करता?
1986 में मेरे भाषण में कुरान और हदीस से इतने सारे उदाहरण हैं, तो जो लोग मुझे काफिर बताकर मेरी जान लेना चाहते थे, उन्हीं पर सवाल उठने लगे कि आप लोग तो कभी कुरान और हदीस की बात नहीं करते। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का जो रुख 1986 में था, वह 2017 में बिल्कुल ही बदल गया। तब मैंने जो बातें कही थी, उसे उन्होंने अपने एफिडेविट में शामिल किया और स्वीकार किया कि तीन तलाक गलत है।
जब भी मुस्लिम समाज में सुधारों की बात आती है तो विरोध होने लगता है, तो ये मुस्लिम उलेमाओं के कारण है, या कम्युनल राजनीति या फिर दोनों ही मिले हुए हैं?
कुरान कहता है कि पूरी दुनिया में हमने अपने पैगंबरों को भेज दिया। सिर्फ अरब वो थे, जिनके पास संदेशवाहक नहीं आया था। भाषा एक बड़ी चुनौती रही है। केवल भारत ही ऐसा देश है, जहां भाषा, धर्म और मत के भेद मिट जाते हैं। ये विवधता से भरा देश है। उसके बावजूद आध्यात्मिक एकता के जो प्रतीक हैं, वो भी पूरे देश में एक ही हैं। कुरान कहता है कि सब दुनिया में पैगंबर हैं। किसी ने मुझसे कहा कि क्या हिन्दुस्तान में नहीं आया, तो अगर ऐसा है तो हिन्दुस्तान से अधिक सौभाग्यशाली तो कोई है ही नहीं। कुरान में बताया गया है कि केवल स्वार्थ के कारण झगड़े हुए हैं।
कुरान को लेकर कुरान डॉट कॉम जैसी वेबसाइट हैं, जिसमें 27-28 प्रकार के कुरान हैं। सिर्फ एक ही लिखावट सही और उसमें कोई तब्दीली नहीं हुई है ये विमर्श क्या आंदोलन की आड़ में बहुत ज्यादा आक्रोश बढ़ाता है?
इस मामले पर मैंने काफी काम किया है। इसी पर मेरी एक किताब है जो कि असल में 1986 के बाद जो लेख मैंने लिखे हैं, उसका कारण ये था कि अरुण शौरी और एमजे अकबर ने कहा कि ये लेख किताब में होने चाहिए। इसमें मैंने सवाल किया है कि मुस्लिम कानून (शरीयत) क्या कुरान पर आधारित है? कुरान बादशाहत की इजाजत नहीं देता है, लेकिन पैगंबर मुहम्मद की मौत के 30 साल के बाद बादशाहत कायम हो गई। तो सवाल ये है कि ये कानून कुरान से आये हैं, या जो लोग राजदरबारों का हिस्सा थे, वहां से आए हैं?
सारे कानून वो हैं, जो बादशाहों के लिए लिखे गए हैं। तीन तलाक है और इसके अलावा पर्सनल लॉ बोर्ड की किताब के अनुसार, दूसरा तलाक है, तलाक ए जबर। यानि अनिच्छा से मिला तलाक। कुरान कहता है कि कोई जोर जबर्दस्ती नहीं हो सकती है, लेकिन पर्सनल लॉ बोर्ड कहता है कि अगर किसी ने अपनी मर्जी के खिलाफ, डर, दवाब में तलाक बोल दिया तो वो तलाक माना जाएगा।
इतिहासकार रिचर्ड ईटन और मानव विज्ञानी तलाल के अनुसार, इस्लाम स्थानीयता के हिसाब से ढलता है और चुनौती भी देता है। तो क्या ये जो ग्लोबल उम्माह (विचार) है। क्या स्थानीयता को विस्थापित कर रहा है?
राज्य उस जमाने में थी नहीं। उस जमाने ये या तो एम्पायर थे या कबीले थे। क्या आप किसी ऐसी स्टेट की कल्पना कर सकते हैं, जिसके पास एक्सचेकर न हो और पुलिस न हो। बैतूलमाल (जहां पैसा रखा जाता था) पैगंबर के जमाने में नहीं था। विस्तार के साथ ही व्यवस्थाओं की आवश्यकता पड़ी। उस बुनियादी किताब का कोई रोल इसमें नहीं है। सब अपनी-अपनी जरूरत के हिसाब से इसे फॉर्मुलेट करते चले गए और उसकी क्रेडिबिलिटी पैदा करने के लिए उसे धर्म का नाम दे दिया। इसलिए ये चुनौती भी है। पैगंबर के जमाने में तो जब वो निकलते थे, हर जनजाति को अलग रंग का झंडा दिया जाता था। हरे रंग को इस्लाम से जोड़ा जाता है, लेकिन इसमें इतिहास का कोई सेंस नहीं है।
पैगंबर मुहम्मद के बाद उम्मवियों ने 100 साल तक शासन किया था और उनका झंडा तो काले रंग का था। बाद में उनके खिलाफ क्रांति करके अब्बासी आए और 500 साल हुकूमत में रहे और इनके झंडे का रंग सफेद था। इन्हें हटाने के बाद तुर्कों ने सत्ता हथियाई और तुर्कों के झंडे का रंग इस्लाम में आने से पहले से हरा था। अब सबसे आखिर वाला हमें याद है। बाकी भूल गए। लेकिन अब ये कह रहे हैं कि हरा रंग इस्लाम है। जबकि पैगंबर के जमाने में वो हर ट्राइब को अलग रंग का झंडा देते थे। अब्बासियों की राजधानी दमिश्क थी।
भगवा से भागना, इसके पीछे कोई इस्लामी आधार नहीं है?
कुरान में एक ही रंग का जिक्र है और वो है भगवा रंग। कुरान में इसे कहा गया है आंखों को अच्छा लगने वाला रंग। इसे जाफरानी रंग कहा जाता है। राजासाहब मेहमूराबाद अब नहीं रहे, उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य भी थे। कुरान के विद्वान थे वो। दिल्ली में एक सम्मेलन के दौरान मैंने उन्हें ये दिखाया तो उन्हें तो भरोसा ही नहीं हुआ। हमारी समस्या ये है कि जो चीज हमारी रुचि के अनुसार नहीं है, हम उसे अनदेखा करके आगे निकल जाते हैं। ये अकेले मुसलमानों की समस्या नहीं, बल्कि ये ह्यूमन समस्या है।
व्लाइल हर्लाक और लुइस बर्नाड आधुनिका ज्ञान परंपरा और इस्लामी परंपरा की बात करते हैं। अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट बताती है कि मदरसा शिक्षा रटने पर जोर देती है। क्या इससे आलोचनात्मक विवेक घटता है?
रटंत में कोई समस्या नहीं है। आप किसी भी मदरसे में जाकर देखेंगे तो पाएंगे कि एक किताब शिक्षक के पास है और वही किताब बच्चों के पास है। उसे ही पढ़ना है केवल। वहां कोई लेक्चर नहीं, कोई व्याख्या नहीं होती। इस मामले पर मौलाना आजाद ने 1954 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ संपूर्णानंद के बुलावे पर मदरसों को मौलवियों को संबोधित करते हुए उन्हें इतिहास को पढ़ने की सलाह दी थी। आज संभव नहीं है कि किसी मदरसे में कोई गैर मुस्लिम इंचार्ज हो, लेकिन बैतूल इकमा नाम के संस्थान को अब्बासियों के दौर में बनाया गया था, जिसका इंचार्ज एक ईसाई था। रही बात मदरसे की तो ये तो किसी भी विद्यालय को कहा जा सकता है। जैसे सिख परंपरा में सिख का अर्थ है शिष्य।
क्या आप चाहेंगे कि मदरसों के इंचार्ज आज भी गैर मुस्लिम हों?
क्यों नहीं हों! वो ज्ञान के लिए जा रहे हैं और वो विद्यालय है। हम उसे कैसे अलग रख सकते हैं। मैं मुस्लिम परिवार में पैदा हुआ हूं औऱ मुझे गीता पढ़ने का शौक है। तो मैं किसके पास जाऊं, जो उसे जानने वाला विद्वान होगा उसी के पास जाऊंगा।
आप पॉलिटिकल इस्लाम की बात करतें हैं और कई बार कहते हैं कि अन्याय को मजहब के फ्रेम में फिट करने की कोशिश हुई?
जब कभी भी पारिवारिक राज होगा, अथॉरिटेरिएन राज होगा, किंगशिप होगा, जो किंग की सुविधा के अनुसार उसे जो अच्छा लगेगा, वही किया जाएगा। इसे ठाकुर सुहाती कहा जाता है।
बांग्लादेश में कोई इलेक्टेड सरकार नहीं है, लेकिन वहां जो खबरें आ रही हैं, वो पूरे समाज को व्यथित करती है, खासतौर से भारत के लिए चिंता का विषय है। इसे आप कैसे देखते हैं?
यूनुस अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। इसी कट्टरता के सहारे वो अपनी सत्ता को आगे बढ़ाना चाहते हैं। मौलाना आजाद ने 1946 में दिए साक्षात्कार में कहा था कि पाकिस्तान में 10 साल के अंदर सारे लीडर गायब हो जाएंगे और सेना टेकओवर कर लेगी। उन्होंने ये भी कहा था कि पूर्वी बंगाल पाकिस्तान के साथ नहीं रहेगा। आजाद ने कहा था कि ये मुसलमानों के नाम पर बंटवारा चाहते हैं, लेकिन मुसलमानों को लेकर देश बना लें, लेकिन वहां मुसलमान नहीं रहेगा।
कट्टरपंथी लामबंदियों के सहारे राजनीतिक हित साधने को आप सभ्य समाज में कैसे देखते हैं?
ये पहले से स्थापित प्रक्रिया है। जिन्ना को तो हिन्दू-मुस्लिम एकता का दूत कहा जाता था। मेरा मानना है कि अगर खिलाफत आंदोलन को सपोर्ट नहीं किया गया होता तो हिन्दुस्तान में कहीं भी इस्लामिज्म नहीं था। जिन्ना ने खिलाफत मूवमेंट की मुखालफत की और नागपुर अधिवेशन में गांधी जी की तरफ देखकर कहा था कि आप आग से खेल रहे हो। मौलवियों ने जिन्ना का विरोध किया, जिन्ना ने दो-तीन बार महात्मा गांधी की तरफ देखा। महात्मा गांधी को खिलाफत आंदोलन का तानाशाह बनाया गया था। जिन्ना अपनी स्पीच को बीच में रोककर गया और वापस आया तो उसका व्यवहार बदला था। जिन्ना का ये मानना था कि आपने बीज बोए हैं और फसल मैं काटूंगा। पाकिस्तान में अहमदियों को गैर मुस्लिम करार भुट्टो के जमाने में दिया गया। वो एक कट्टरपंथी था।

















