अटल बिहारी वाजपेयी को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, कवि और राजनेता के रूप में तो सब जानते हैं, लेकिन उनका आत्मिक और वैचारिक संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रारंभ से रहा। युवा अटल जब कॉलेज में थे, तब से उन्होंने संघ की शाखा में जाना शुरू किया था और यहीं से उनकी राजनीतिक व सामाजिक चेतना का आरंभ हुआ था। 27 अगस्त, 2000 को प्रधानमंत्री के रूप में वे पहली बार रा.स्व.संघ के नागपुर मुख्यालय गए थे और संघ प्रचारक नारायण राव तरटे से भेंट की थी, जिन्होंने 1939 में ग्वालियर में उन्हें स्वयंसेवक बनाया था।
अटल बिहारी वाजपेयी और रा.स्व.संघ का संबंध केवल संगठनात्मक नहीं था, बल्कि यह एक गहरा वैचारिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव भी था। अटल जी अक्सर कहते थे, “संघ ने मुझे देश और समाज के लिए जीना सिखाया।” वे संघ के प्रचारक तो नहीं बने, लेकिन संघ के विचारों, अनुशासन और राष्ट्रवाद से अत्यंत प्रभावित रहे। 1951 में जब भारतीय जनसंघ बना, तो संघ ने अटलजी को राजनीतिक मंच पर संगठन का चेहरा बनाने में सहयोग दिया। उस समय श्रीगुरुजी संघ के सरसंघचालक थे, जो अत्यंत विचारवान, तपस्वी और दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता माने जाते थे।
अटल जी और श्रीगुरुजी
अटल जी उन स्वयंसेवकों में से थे, जो श्रीगुरुजी के व्याख्यानों और विचारधारा से गहराई से प्रभावित हुए। उन्होंने श्रीगुरुजी की वाणी, जीवनशैली और राष्ट्रभक्ति से प्रेरणा ली और उसे अपने राजनीतिक जीवन में आत्मसात किया। उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि श्रीगुरुजी उनके वैचारिक संस्कारों के मूल आधार हैं। संघ के जिन स्वयंसेवकों ने आगे चलकर राजनीति में प्रवेश किया, उनमें अटल जी सबसे प्रतिभाशाली माने जाते थे और श्रीगुरुजी को भी यह स्पष्ट रूप से ज्ञात था।
अटल जी और श्रीगुरुजी के बीच का संबंध अत्यंत आदरपूर्ण, वैचारिक और मार्गदर्शक-शिष्य के भाव से जुड़ा हुआ था। वे श्रीगुरुजी को केवल एक संगठन प्रमुख नहीं, बल्कि एक द्रष्टा, संघ-परंपरा के एक ऋ षि और एक प्रेरणा-पुरुष के रूप में देखते थे। उन्होंने श्रीगुरुजी के बारे में कहा था, “गुरुजी ने हमें यह सिखाया कि राष्ट्रभक्ति केवल भाव नहीं, बल्कि आचरण और कर्म का विषय है। उन्होंने विचारों को जीने की कला सिखाई।” अटल जी की भाषण कला, लेखनी, तर्कशक्ति और संतुलित सोच से श्रीगुरुजी अत्यंत प्रभावित रहते थे। यह भी माना जाता है कि जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद जनसंघ में नेतृत्व के विकल्पों पर चर्चा हुई, तो श्रीगुरुजी ने अटल जी के नेतृत्व को समर्थन देने का संकेत दिया था। अटल जी को राजनीति में संघ का ‘विचारशील, संतुलित और शिष्ट चेहरा’ माना जाता था और इसमें श्रीगुरुजी का मार्गदर्शन प्रमुख था।
श्रीगुरुजी का मानना था कि भारत को एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखना चाहिए, जो विविधता में एकता का परिचायक हो। अटल जी ने भी अपने राजनीतिक जीवन में यही विचार लोकतांत्रिक भाषा और व्यवहार के माध्यम से प्रस्तुत किया। वे अक्सर कहते थे, “हम गुरुजी के विचारों को राजनीति में ले जाना चाहते हैं, लेकिन जबान और शैली ऐसी हो कि देश का हर वर्ग उसे सुने और समझे।” वे श्रीगुरुजी को एक आदर्श पुरुष, जीवन मार्गदर्शक और आत्मिक नेता मानते थे।
जब श्रीगुरुजी का 1973 में निधन हुआ, तब अटल जी ने उन्हें अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में श्रद्धांजलि दी थी। उन्होंने कहा था, “गुरुजी केवल एक संगठन के प्रमुख नहीं थे, वे एक विचारधारा के वाहक, एक युगद्रष्टा और एक तपस्वी कर्मयोगी थे। उन्होंने भारत माता की सेवा को जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लिया था।”
अटल बिहारी वाजपेयी और श्रीगुरुजी के बीच का रिश्ता गुरु-शिष्य परंपरा, वैचारिक अनुरूपता और मानवीय श्रद्धा का एक आदर्श उदाहरण था। जहां अटल जी ने राजनीति में व्यावहारिकता को अपनाया, वहीं उन्होंने श्रीगुरुजी के विचारों को अपने आचरण, भाषा और दृष्टिकोण में जीवित रखा। संघ से उनके रिश्ते जीवनपर्यंत बने रहे, यह दर्शाता है कि जब कोई नेता अपने मूल वैचारिक स्रोत से निष्ठा से जुड़ा रहता है, तो वह चाहे कितना भी ऊंचा पद क्यों न प्राप्त कर ले, विनम्रता और मूल्यों से कभी भटकता नहीं है।

रज्जू भैया से आत्मीयता
वैसे तो अपने सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में संघ के अनेक पदाधिकारियों के साथ उनके संबंध रहे, लेकिन उनमें से कुछ संबंध विशेष रूप से आत्मीय थे। जैसे-उनका संबंध सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ से खास और पारदर्शी था। रज्जू भैया रा.स्व. संघ के चौथे सरसंघचालक, प्रख्यात भौतिक विज्ञानी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल, सौम्य, विद्वान और आत्मीय था। उनके और अटल जी के संबंध केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि मित्रता, आपसी समझ और आदर्शवादिता पर आधारित थे। रज्जू भैया ने अटल जी के राजनीतिक संतुलन, उदार राष्ट्रवाद और व्यावहारिक दृष्टिकोण को कभी आलोचना नहीं, बल्कि समझदारी के रूप में देखा। संघ के भीतर जब कभी अटल जी की उदार छवि को लेकर कुछ आलोचनाएं होती थीं, रज्जू भैया अटल जी का स्पष्ट समर्थन करते थे।
एक बार रज्जू भैया ने कहा था, “अटल जी जैसे लोग संघ की शक्ति हैं, क्योंकि वे विचारों को जनमानस से जोड़ने का माध्यम बनते हैं।” अटल जी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कई बार रज्जू भैया से व्यक्तिगत सलाह ली, विशेषतः नैतिक व वैचारिक संकट के समय। वहीं रज्जू भैया ने भी कभी अटल जी पर विचार थोपने की बजाय उन्हें आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता दी। दोनों के बीच संवाद में हमेशा संघ और सरकार के बीच संतुलन, नीति और आदर्श तथा मर्यादा और व्यावहारिकता का भाव बना रहा। 1999 के बाद जब सरकार को गुजरात दंगों, अंतरराष्ट्रीय दबावों या सहयोगी दलों के मतभेदों से जूझना पड़ा, अटल जी ने रज्जू भैया से संपर्क बनाए रखा और उनका मार्गदर्शन लिया।
अटल जी की शैली संघ के कुछ समर्थकों को बहुत उदार लगती थी, लेकिन रज्जू भैया ने अटल जी को ‘संघ का सच्चा स्वयंसेवक’ बताते हुए यह संदेश दिया कि ‘विचारों को सख्ती से नहीं, जीवन में आत्मसात करके अपनाना ही संघ का मार्ग है।’ जब रज्जू भैया का देहावसान हुआ, तब उन्होंने कहा था, “वे संघ के अनुशासन के साथ एक प्रोफेसर की विनम्रता और ऋ षि का दृष्टिकोण रखते थे। उनका सान्निध्य मेरे लिए ऊर्जा का स्रोत था।”
अटल बिहारी वाजपेयी और रज्जू भैया का संबंध विचार एवं व्यावहारिकता, संगठन एवं सत्ता तथा शिष्टता व दृढ़ता का एक आदर्श संतुलन था। जहां अटल जी ने संघ के विचारों को जनमानस तक पहुंचाया, वहीं रज्जू भैया ने उन्हें संघ के भीतर पूर्ण समर्थन, विश्वास प्रदान किया तथा संघर्ष व समर्पण के बीच सामंजस्य, विचारधारा और विवेक के बीच संतुलन बनाए रखने में सफलता प्राप्त की।

बालासाहब देवरस से संबंध
अटल बिहारी वाजपेयी और रा.स्व. संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस के बीच का संबंध भारतीय राजनीति और वैचारिक संगठनात्मक समन्वय का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह रिश्ता केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि गहरे विचार-संवाद, आत्मीयता और रणनीतिक विश्वास पर आधारित था।
बालासाहब ने अटल जी के बारे में कहा था, “यह नेता केवल भाषण नहीं देता, यह विचारों को जीता है।” उन्होंने अटल जी को स्पष्ट रूप से समर्थन दिया और उन्हें ‘राष्ट्रीय नेतृत्व का स्वाभाविक चेहरा’ माना। जब 1980 में अटल जी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने तो अपना अलग वैचारिक आधार बनाया, जो संघ की पारंपरिक विचारधारा से थोड़ा अलग था। हालांकि संघ के कुछ वरिष्ठ स्वयंसेवक इससे असहमत थे, किंतु श्री बालासाहब देवरस जी ने अटल जी को प्रयोग की छूट दी। उन्होंने कहा था, “हर संगठन को समय के साथ कुछ प्रयोग करने होते हैं। यदि नेता ईमानदार और राष्ट्रहितैषी हो, तो उसे अवसर मिलना चाहिए।”
यह अटल जी पर उनके गहरे विश्वास को दर्शाता है। बालासाहब ने एक बार कहा था, “हमारा अटल एक दिन अवश्य भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।” अटल जी की राजनीति ‘कट्टरता’ की बजाय संवाद और सहमति पर आधारित थी। बालासाहब बखूबी समझते थे कि देश में विविधताएं हैं और यदि संघ की विचारधारा को राजनीतिक रूप में स्वीकार्यता दिलानी है, तो अटल जी जैसे नेताओं की भूमिका अहम रहेगी। बालासाहब की सोच में लचीलापन था और वे संघ को एक बंद दायरे में नहीं रखना चाहते थे।

बालासाहब का अटल जी अत्यंत सम्मान करते थे और उन्हें ‘द्रष्टा’ के रूप में देखते थे। जब भी कोई वैचारिक या रणनीतिक उलझन होती, वे बालासाहब से परामर्श लेते थे। एक बार अटल जी ने कहा था, “बालासाहब विचारों के तपस्वी थे और उनसे संवाद हमेशा स्पष्टता और संतुलन देता था।” बालासाहब देवरस संघ-भाजपा संबंधों को एक दूरी और सहयोग के सिद्धांत पर रखते थे। उन्होंने अटल जी को हमेशा स्वतंत्रता दी कि वे राजनीति की जमीन के अनुसार निर्णय लें, बशर्ते वे राष्ट्रहित और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े हों। यही कारण था कि अटल जी जैसे उदार और मध्यमार्गी नेता संघ के व्यापक समर्थन से प्रधानमंत्री बन सके।
बालासाहब देवरस और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंध विचारधारा और व्यवहार के बीच सहज संतुलन का प्रमाण हैं। जहां एक ओर बालासाहब संघ की सैद्धांतिक नींव को मजबूत कर रहे थे, वहीं अटल जी उसी नींव पर राजनीति की लोकतांत्रिक इमारत खड़ी कर रहे थे। यही कारण था कि संगठन और राजनीतिक नेतृत्व के बीच परस्पर सम्मान, धैर्य और दीर्घदृष्टि रहते हुए विचारधारा और राजनीति एक-दूसरे के पूरक बन सके।
शैली भिन्न, लक्ष्य एक
अटल बिहारी वाजपेयी और रा.स्व. संघ के पांचवें सरसंघचालक श्री कुप्. सी. सुदर्शन के बीच का संबंध आदर्शवादी विचारधारा और राजनीतिक व्यवहार कुशलता के संतुलन का एक जटिल, परंतु अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। दोनों सत्ता और संगठन के महत्व पर सार्वजनिक तौर पर अलग-अलग राय रखते थे। जहां अटल जी का झुकाव सुशासन के लिए गठबंधन धर्म, संवेदना, विवेक, उदारता और मजबूत संसदीय लोकतंत्र की ओर था, वहीं सुदर्शन जी वैचारिक रूप से सख्त, वैज्ञानिक सोच वाले, अनुशासन प्रिय, स्पष्टवादी, संगठनकर्ता और मूलभूत बदलावों के पक्षधर थे। दोनों के बीच संबंधों में सम्मान, संवाद और टकराव-तीनों तत्व मौजूद थे। अटल जी ने संघ के नैतिक और सांस्कृतिक आदर्शों को अपने तरीके से आत्मसात किया था।

2000 में जब सुदर्शन जी संघ के सरसंघचालक बने, उस समय अटल जी विभिन्न विचारधारा वाले दलों की मिली-जुली सरकार के प्रधानमंत्री थे। दोनों का उद्देश्य एक था-राष्ट्रहित और भारत की सांस्कृतिक पुनर्रचना, लेकिन मार्ग और शैली में भिन्नता थी। सुदर्शन जी का मानना था कि भाजपा जब सत्ता में है, तो उसे संघ की विचारधारा को पूरी ताकत से लागू करना चाहिए, जैसे समान नागरिक संहिता, राम मंदिर, अनुच्छेद-370 की समाप्ति आदि। वहीं, अटल जी गठबंधन धर्म के अनुसार बहुलतावादी रचना को ध्यान में रखते हुए लचीले और व्यावहारिक फैसले लेना उचित मानते थे। इसलिए कुछ लोग अटल जी को ‘बहुत उदार’ या ‘संघ के अनुसार नहीं चलने वाला’ मानने लगे थे, पर सत्ता में रहते उन्होंने संघ के प्रति मर्यादा और सम्मान बनाए रखा।
लोकतांत्रिक शासन, गठबंधन की मर्यादा और राष्ट्रीय आम सहमति उनकी प्राथमिकता थी, जबकि सुदर्शन जी की प्राथमिकता थी-वैचारिक निष्ठा, हिंदुत्व आधारित नीतियां और संगठन का मार्गदर्शन। इसलिए जब अटल जी की गठबंधन सरकार ने हिंदुत्व की कुछ मांगों को समयानुकूल नहीं बताया तो सुदर्शन जी थोड़े रुष्ट हुए। इसके बावजूद दोनों के बीच वैयक्तिक कटुता कभी नहीं आई। दोनों ने एक-दूसरे के योगदान को कभी अस्वीकार नहीं किया, बल्कि समय ने उनके मतभेदों को एक वैचारिक मंथन की प्रक्रिया का हिस्सा बनाया। ऐसे में उन दिनों संघ नेतृत्व ने सामूहिक रूप से राजनीतिक क्षेत्र में कार्यरत वरिष्ठ स्वयंसेवकों के साथ लगातार संवाद स्थापित किया और मिलकर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।
उस समय विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता एवं राष्ट्र के लिए समर्पण की भावना को जाग्रत रखना और सुशासन के लिए कुशल नेतृत्व प्रदान करना दोनों ही महत्वपूर्ण थे। इसलिए कुछ विषयों पर उभरते मतभेदों के बीच राष्ट्र हित में आम सहमति बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। एक परिवार के नाते आपसी संवाद व संयम से समस्याओं के संतोषजनक समाधान को संभव बनाने, इसके निमित्त संघ नेतृत्व व केंद्रीय भाजपा नेताओं के बीच समन्वय एवं संवाद की प्रक्रिया को स्थाई रूप देने में संघ के तत्कालीन सहसरकार्यवाह श्री मदनदास ने कुशलतापूर्वक समन्वयक की भूमिका निभाई।

93 वर्ष की आयु में युगपुरुष ‘भारत रत्न’ अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन-लीला 16 अगस्त, 2018 को समाप्त हुई। भारत के राजनीतिक क्षितिज का एक अद्वितीय नक्षत्र लुप्त हो गया और अपने पीछे देश की राजनीति में एक ऐसी रिक्तिता छोड़ गया, जो कभी पूरी नहीं हो सकती। यह नक्षत्र आज भी एक ध्रुव तारा बन अंतरिक्ष में विद्यमान है और हम सबको प्रेरणा दे रहा है और आगे भी देता रहेगा।
अटल जी स्वतंत्र भारत में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली की जड़ों को सींचने वाली स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी पीढ़ी में से एक थे। उन्होंने अपने आदर्शों, ओजस्वी वाणी, साहित्यिक विरासत एवं व्यवहार कुशलता से लगभग पांच पीढ़ियों को प्रेरित किया। उन्हें जीवन भर जनता का भरपूर स्नेह एवं सम्मान प्राप्त हुआ। फिर भी राजनीति और मीडिया क्षेत्र से जुड़े कुछ लोगों ने अटल जी की विरासत को भाजपा और रा.स्व.संघ से अलग कर उनकी अलग छवि गढ़ने का कुप्रयास किया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अमित शाह, राजनाथ सिंह और कई अन्य नेताओं ने उनकी अंतिम यात्रा में कई किलोमीटर पैदल चलकर अपने दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि दी और दुनिया को संदेश दिखाया कि अटल जी की आत्मा कहां बसती है।
अशोक टंडन की पुस्तक ‘अटल संस्मरण’ के एक अध्याय
‘अटल जी और संघ’ के संपादित अंश

















