दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए GRAP-4 लागू होने के बाद से अब तक 10 हजार से ज्यादा वाहनों का उत्सर्जन टेस्ट फेल हो चुका है। वहीं, “नो PUC, नो फ्यूल” नियम आने के बाद करीब 2 लाख वाहनों को PUC सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं। पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने बताया कि सरकार सभी PUC सेंटर्स को हाई-कैपेसिटी उपकरणों से अपग्रेड कर रही है, ताकि देरी कम हो और टेस्टिंग सटीक हो। साथ ही, सर्टिफिकेशन में पारदर्शिता के लिए थर्ड-पार्टी इंस्पेक्शन शुरू किया जाएगा। मंत्री के मुताबिक, ये आंकड़े दिखाते हैं कि नियम सख्ती से लागू हो रहे हैं और नतीजे आ रहे हैं।
मौजूदा उत्सर्जन टेस्टिंग और GRAP-4 की स्थिति
अभी वाहनों की ऑन-रोड जांच काफी कमजोर है। ये सिर्फ आइडल स्टेट में CO और हाइड्रोकार्बन (HC) की टेस्टिंग पर आधारित है। पेट्रोल वाहनों के लिए लैम्ब्डा टेस्ट और डीजल के लिए स्मोक डेंसिटी टेस्ट होता है। DTU के रिसर्चर्स ने पहले एक AQI जैसा PUC सिस्टम सुझाया था, जिसमें वाहन की माइलेज को भी शामिल किया जाए। पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजीव कुमार मिश्रा कहते हैं कि टेस्टिंग में फास्ट आइडल कंडीशन (2500 RPM पर) और मास उत्सर्जन टेस्टिंग शामिल होनी चाहिए। अभी PUC सिर्फ इंजन आइडल रहते CO और HC पर दिया जाता है। NO2, PM2.5 और VOC जैसे उत्सर्जन फास्ट आइडल में नापे तो जाते हैं, लेकिन सर्टिफिकेट में गिने नहीं जाते। मिश्रा के अनुसार, पुराने वाहनों को फेज आउट करने या PUC देने का फैसला उम्र के बजाय माइलेज, मेंटेनेंस रिकॉर्ड और परफॉर्मेंस पर होना चाहिए। BS-6 के बाद से कोई नए स्टैंडर्ड नहीं हैं, और हर वाहन अपनी बिल्ट टाइप के हिसाब से टेस्ट होता है।
प्रदूषण के स्रोत और असर
CSE की स्टडी के मुताबिक, वाहन दिल्ली के प्रदूषण के बड़े स्रोतों में से एक हैं और इनका सीधा असर इंसानी सेहत पर पड़ता है। PUC चेक से बहुत ज्यादा प्रदूषित करने वाले वाहन सड़क से हट तो सकते हैं, लेकिन PM2.5 और दूसरे टॉक्सिक गैसों का मुद्दा बाकी रह जाता है। CSE की एयर पॉल्यूशन प्रोग्राम मैनेजर शंभवी शुक्ला बताती हैं कि सोर्स अपोर्टमेंटमेंट और उत्सर्जन इन्वेंटरी स्टडीज से पता चलता है कि वाहन पार्टिकुलेट एमिशन के दूसरे सबसे बड़े योगदानकर्ता हैं। ये उत्सर्जन सांस की ऊंचाई पर होते हैं, इसलिए ज्यादा खतरनाक। वो रिमोट सेंसिंग जैसे अपडेटेड सिस्टम की सलाह देती हैं।
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उत्सर्जन टेस्टिंग में कमियां और समस्याएं
PUC सिस्टम में एक बड़ी समस्या सेंटर्स खुद हैं। 2017 में CSE और EPCA ने दिल्ली-NCR के PUC सिस्टम का ऑडिट किया था। इसमें पता चला कि कई जगहों पर टेलपाइप में प्रोब डाले बिना ही सर्टिफिकेट जारी हो जाते थे। NCR में कुछ सेंटर्स में तो सिर्फ प्रिंटर था, मॉनिटर भी नहीं। अलग-अलग सेंटर्स से एक ही वाहन के अलग रिजल्ट आते थे। PUC स्टाफ के लिए ITI सर्टिफिकेट जरूरी है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा था।

















