‘अंतर सांस्कृतिक संवाद से आएगा साैहार्द’
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‘अंतर सांस्कृतिक संवाद से आएगा साैहार्द’

‘दुनिया में हम लोग रह भले ही अलग अलग देशों में रहे हैं, लेकिन एक बड़े धरातल पर हम एक ही वृहत परिवार के अंग हैं, सब आपस में जुड़े हैं, पराया कोई नहीं। सबकी उत्पत्ति का मूल एक है।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Dec 22, 2025, 04:21 pm IST
inसंघ @100, दिल्ली
सेमिनार को संबोधित करते श्री सुनील अंबेकर मंच पर है (बाएं से) प्रो. मजहर आसिफ और प्रो. सचिन चतुर्वेदी

सेमिनार को संबोधित करते श्री सुनील अंबेकर मंच पर है (बाएं से) प्रो. मजहर आसिफ और प्रो. सचिन चतुर्वेदी

‘‘दुनिया में हम लोग रह भले ही अलग अलग देशों में रहे हैं, लेकिन एक बड़े धरातल पर हम एक ही वृहत परिवार के अंग हैं, सब आपस में जुड़े हैं, पराया कोई नहीं। सबकी उत्पत्ति का मूल एक है। अगर हम सब अंतरमन में यह धारणा गहन कर लें तो दुनिया से समस्याएं विदा हो जाएं। न संघर्ष, युद्ध हों, न वैचारिक भेदाभेद हों, न मन में मालिन्य आए और न दूसरे को नीचा दिखाने का किसी में भाव हो।’ यह कहना था रा.स्व.संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री सुनील अंबेकर का। श्री अंबेकर गत 16 दिसम्बर को नई दिल्ली के डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केन्द्र में ‘वसुधैव कुटुम्बकम: सभ्यतागत संवाद’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस सेमिनार का आयोजन सेंटर फॉर स्टडीज इन इंटरनेशनल रिलेशन्स, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और एमएकेएआईएस (कोलकाता) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था।

सत्र की अध्यक्षता कर रहे श्री अंबेकर ने आगे कहा कि विश्व भर का मानव समाज एक है और आपस में जुड़ा हुआ है। यही भारत का विचार है। सभ्यताएं तो हजारों वर्ष से सतत चली आ रही हैं। इनके बीच मतभेद, विवाद के बिंदु हो सकते हैं जो संवाद से सुलझाए जा सकते हैं। हम आपसी समझ और जानकारियों को साझा करके एक दूसरे के हित की चिंता कर सकते हैं। जैसे आज पर्यावरण को लेकर चिंता है, मानव जीवन पर संकट है। ऐसे में पश्चिम से उलट, भारत का दोहन नहीं, संरक्षण का विचार ही रास्ता दिखा सकता है। हमें प्रकृति के अकूत दोहन का नहीं, उससे उतना ही लेना सीखना होगा जितना आवश्यक है। इस समस्या का यही एक निदान है। हमें प्रकृति के साथ तादात्म्य बनाकर चलना होगा। उन्होंने कहा कि अगर देश अपनी नीतियां इस एकसूत्रता यानी जुड़ाव के विचार को ध्यान में रखकर बनाएं तो विश्व में शांति और सौहार्द होगा।

सत्र में मुख्य वक्ता के नाते नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि विश्व का एक नया अनुक्रम बनाना होगा जो नकारात्मक नहीं सकारात्मक सोच के साथ बनेगा। उन्होंने रॉबर्ट कॉक्स के सिद्धांत ‘समावेश का विचार’ को विश्व को सौहार्दपूर्ण बनाने के लिए अति आवश्यक बताया। प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि आज सभ्यतागत संवाद की बहुत अधिक आवश्यकता है। भारत ‘ब्रिक्स’ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन का अध्यक्ष है तो क्यों न ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच एक संवाद हो! हर एक को अपना अस्तित्व बनाए रखने का अधिकार है। नालंदा विश्वविद्यालय इसीलिए बहुलता का प्रचार-प्रसार करता है।

सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जामिया मिल्ल्यिा इस्लामिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.मजहर आसिफ ने कहा कि अल्लामा इकबाल ने बंटवारे से पूर्व राष्ट्रीय भाव के साथ भारत की दिव्यता और विश्व में सर्वोच्चता का वर्णन किया था, उस देश के वासी के नाते हम भारतीयों को गर्व होना चाहिए। प्राचीन काल के इतिहासविद्, चाहे वह इब्न बतूता हो या अल बरूनी, भी भारत की महिमा का गान करते हैं।

उन्होंने कहा कि अब्राह्मिक मत, जैसे ईसाई और इस्लाम के ग्रंथ क्रमश: बाइबिल और कुरान कहते हैं कि दुनिया में जो है वह सब इंसान के दोहन के लिए है। इसके विपरीत सनातन विचार है कि सृष्टि में सब बराबर हैं। कुरान, बाइबिल ने पूरी सृष्टि की चिंता करने की बात कहीं नहीं की है, लेकिन सनातन संस्कृति ‘सर्वे भवंतु सुखिन:…’ की बात करती है। इसलिए हमें इस सनातन विचार वाले देश का गौरवगान करना ही चाहिए। हमें दुनियाभर की संस्कृतियों के साथ संवाद करना चाहिए। इस सेमिनार का यही उद्देश्य है।

‘सभ्यतागत संवाद’ सेमिनार के संबंध में जेएनयू के प्रो. अश्विनी महापात्रा ने कहा कि ज्ञान के वर्धन और संचयन के लिए अंतर सांस्कृतिक संवाद बहुत आवश्यक है। भारत का विचार वसुधैव कुटुम्बकम का है इसलिए विश्व के सब लोग एक कुटुम्ब के सदस्य हैं इसलिए आपस में मिल-बैठकर संवाद करना आवश्यक है। सेमिनार की भूमिका जामिया के प्रो. राजीव नयन ने रखी और कार्यक्रम के अंत में जामिया के ही प्रो.विवेक कुमार मिश्र ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस संवाद में भाग लेने अनेक देशों से आए प्रतिनिधि भी सत्र में उपस्थिति थे।

संवाद में आए विदेशी प्रतिनिधि

शाहिदा खलिलोवा (ताजिकिस्तान), दारसकेदर ताए मेंजिस्ट (इथियोपिया), चिनिबेक उलु दास्तान (किर्गिस्तान), प्रो. लोरा येरेकेशेवा (कजाकिस्तान), प्रो. अकबोता झोल्डास्बेकोवा (कजाकिस्तान), डॉ. अजीज खूदेबेरदिएव (उज्बेकिस्तान), डॉ. पैट्रिक मुथेंगी मालुकी (नैरोबी), डॉ. सुहरोब बुरानोव (उज्बेकिस्तान), डॉ. बिन्ह दांग थाई (विएतनाम), प्रो. इव्गेनी काब्लुकोव (किर्गिस्तान), खिन माउंग जॉ (म्यांमार), डॉ. करमा ताशी चोएद्रोन (मलेशिया), सैइदजोदा हालिम (ताजिकिस्तान), न्योमन इन्दाह कुसुमा देवी (थाईलैंड) और गुलचेखरा इसामुखामेदोवा (उज्बेकिस्तान )।

Topics: प्रो.मजहर आसिफदिव्यता और विश्वसुनील अंबेकर‘सर्वे भवंतु सुखिन:’सनातन संस्कृतिवसुधैव कुटुम्बकमप्रो. सचिन चतुर्वेदीजामिया मिल्ल्यिा इस्लामियाप्रो. अश्विनी महापात्रा
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