यह उस समय की बात है जब पंजाब आतंकवाद के सबसे भयावह दौर से गुजर रहा था। खालिस्तानी आतंकवादी छिप-छिपकर बाहर निकलते, निर्दोष लोगों की हत्याएं करते, बम विस्फोट करते और फिर सीमा पार सुरक्षित लौट जाते। निर्दोष हिन्दुओं की हत्या आम हो चुकी थी। पुलिस असहाय थी, सरकारें विफल और मीडिया बंटा हुआ था।
जब आतंकियों ने बटाला को बंधक बना लिया
1980 का दशक पंजाब के इतिहास का सबसे डरावना अध्याय माना जाता है। 6 मार्च 1986 को बटाला शहर के सभी 16 प्रवेश मार्गों पर आतंकियों ने नाकेबंदी कर दी। शहर पूरी तरह बंधक बन गया। 18 दिनों तक कर्फ्यू रहा। दूध, सब्जी, राशन, दवाइयां सब खत्म होने लगीं। बच्चे दूध के लिए तरसने लगे और मरीज इलाज के बिना तड़पते रहे।
आतंकियों की लूट और प्रशासन की विफलता
नाकाबंदी के दौरान आतंकवादी लूटपाट पर उतर आए। 14 कारखाने, 34 दुकानें, 20 बंदूकें लूटी गईं और 18 लाख रुपये से अधिक की संपत्ति नष्ट कर दी गई। पंजाब सरकार और कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह असफल साबित हुआ। शांति समिति, मंत्री और स्थानीय नेता भी नाकेबंदी नहीं खुलवा सके।
जब अटल बिहारी वाजपेयी को बुलाया गया
ऐसे संकट के समय में पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का नाम उम्मीद बनकर सामने आया। उस समय वे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। वरिष्ठ पत्रकार विजय चोपड़ा और भाजपा नेताओं के प्रयासों से अटल जी को हालात की गंभीरता बताई गई। परिस्थिति बेहद जोखिमभरी थी, फिर भी उन्होंने बटाला जाने का निर्णय लिया।
आतंकियों के गढ़ से होकर बटाला पहुंचे अटल जी
अमृतसर से बटाला जाने के दो रास्ते थे। एक सुरक्षित और दूसरा मेहता चौक—जो भिंडरांवाला के समर्थकों और आतंकियों का गढ़ माना जाता था। सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनी के बावजूद अटल जी ने कहा कि वे उसी रास्ते से जाएंगे जहां आतंकियों का डेरा है। 25 मार्च 1986 को जान हथेली पर रखकर वे मेहता चौक से होते हुए बटाला पहुंचे।
बटाला में अटल जी की ललकार
किला मंडी बटाला में अटल बिहारी वाजपेयी ने विशाल जनसभा को संबोधित किया। हजारों लोग उन्हें सुनने पहुंचे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि किराए की बंदूकों से भारत डरने वाला नहीं। उनकी उपस्थिति ने लोगों का मनोबल बढ़ाया और आतंकियों को साफ संदेश दिया कि देश झुकने वाला नहीं है।
नाकेबंदी टूटी, पंजाब ने राहत की सांस ली
अटल जी ने सभी पक्षों से संवाद किया। परिणामस्वरूप आतंकियों की नाकेबंदी समाप्त हुई। बटाला ही नहीं, बल्कि पूरे पंजाब ने राहत की सांस ली। यह केवल एक राजनीतिक दौरा नहीं था, बल्कि साहसिक राष्ट्रवादी नेतृत्व का प्रतीक था।
कवि हृदय से निकली पीड़ा
पंजाब की पीड़ा ने अटल जी के कवि हृदय को झकझोर दिया। उसी वेदना से ये पंक्तियां निकलीं—
दूध में दरार पड़ गई
खून क्यों सफेद हो गया ?
भेद में अभेद खो गया।
बण्ट गये शहीद, गीत कट गए।
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
खेतों में बारूदी गन्ध।
टूट गये नानक के छन्द
सतलुज सहम उठी।
व्यथित सी बितस्ता है।
वसन्त से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।
अपनी ही छाया से बैर।
गले लगने लगे हैं गैर।
खुदकुशी का रास्ता।
तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।
उनकी कविता पंजाब त्रासदी, राष्ट्र विभाजन की पीड़ा और आंतरिक टूटन की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
पंजाब आज भी अटल जी को नमन करता है
आज भी पंजाब के लोग बटाला की उस घटना को याद कर अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। वह एक नेता नहीं, बल्कि संकट के समय खड़ा होने वाला राष्ट्रपुरुष था—जिसने आतंक के अंधेरे में उम्मीद का दीप जलाया।
सौजन्य – पाञ्चजन्य आर्काइव्स

















