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अटल बिहारी वाजपेयी : विपक्ष में रहते हुए भी राष्ट्र प्रथम

अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व, कवि हृदय, पोखरण-2, लाहौर बस यात्रा और लोकतंत्र पर उनका अमर दृष्टिकोण- पढ़ें पूरा विश्लेषण

Written byShivam DixitShivam Dixit — edited by Shivam Dixit
Dec 19, 2025, 04:15 pm IST
in भारत, विश्लेषण

पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में से थे जिनके लिए दलहित से ऊपर देशहित था। उन्होंने विपक्ष में रहते हुए भी कभी दलहित को देशहित से ऊपर नहीं रखा। उन्होंने सरकार की आलोचना तो की मगर देशहित पर कभी कोई आंच नहीं आने दिया।

अटल जी कहते थे – “लोकतंत्र में विरोध भी राष्ट्रसेवा का ही एक रूप है।”

राजनीति और सुशासन में अटल जी की भूमिका

अटल जी ने 23 पार्टियों वाली एनडीए गठबंधन का सफलतापूर्वक संचालन किया। उन्होंने अपने समय कई ऐतिहासिक फैसले लिए।

स्वर्णिम चतुर्भुज योजना – इस योजना के अन्तर्गत देश के 4 महानगरों कोलकाता, मुंबई, दिल्ली और चेन्नई को राजमार्ग के माध्यम से जोड़ना था।

पोखरण-II – मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में पहला सफल परमाणु परीक्षण हुआ।

टेलीकॉम नीति – डिजिटल विभाजन को कम करने के लिए 1999 में इसको लाया गया था।

सर्व शिक्षा अभियान – इसके माध्यम से 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने कि बात कही गई थी।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना – ग्रामीण कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए दिसंबर 2000 में इस योजना की शुरूआत की गई।

कूटनीति और वैश्विक दृष्टि में अटल जी

अटल जी की कूटनीति संवाद और शांति पर आधारित रहती थी। उन्होंने शांति स्थापित करने के लिए पाकिस्तान जैसे देशों से भी संबंध बनाने के प्रयास किए।

लाहौर बस यात्रा – कारगिल युद्ध के पहले अटल जी ने “दिल्ली-लाहौर बस यात्रा” की शुरूआत की।

भारत–रूस संबंध- 2000 में रूस के राष्ट्राध्यक्ष ‘पुतिन’ भारत आए और “भारत-रूस सामरिक साझेदारी घोषणा” पर हस्ताक्षर हुए, जिसके बाद से दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच वार्षिक शिखर सम्मेलन एक नियमित प्रक्रिया बन गई।

अमेरिका के साथ रणनीतिक संवाद- जब 1998 में अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगाए तो अटल जी ने धैर्य एवं कुशल नेतृत्वकर्ता का परिचय देते हुए अमेरिका के साथ स्पष्ट संवाद को चुना। इसके बाद 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा हुई।

परमाणु नीति का वैश्विक असर- भारत के परमाणु राष्ट्र बनने के बाद भारत पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए। मगर अटल जी ने स्वस्थ संवाद का मार्ग चुना और विभिन्न देशों से लगातार बातें जारी रखी।

अटल – कवि और संवेदनशील राजनेता

अटल जी के कविताओं और राजनीति में अटूट गठजोड़ था। वे पाञ्चजन्य साप्ताहिक के संस्थापक भी थे। उनके हर वक्तव्य में प्रेम, करूणा और मानवता दिखती थी। वहीं उनकी कविता एक राजनीतिक दस्तावेज थे।

उनकी कुछ कविताओं के प्रसिद्ध अंश- गीत नया गाता हूँ (नई शुरुआत की उम्मीद) :

“हार नहीं मानूँगा,

रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ

गीत नया गाता हूँ।”

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन (व्यापक राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति)

“होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है कर लूं जग को गुलाम?

मैंने तो सदा सिखाया करना अपने मन को गुलाम।

गोपाल-राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किए?

कब दुनिया को हिन्दू करने घर-घर में नरसंहार किए.?”

अटल जी की कविताएं रानीति की घटनाओं को प्रत्यक्ष तौर पर प्रदर्शित करती थी-

दूध में दरार पड़ गई : विभाजन की त्रासदी को व्यक्त करती है,

न दैन्यं न पलायनम् : आपातकाल के दौरान जेल में लिखी गई, जो संघर्ष और अडिगता को दर्शाता है।

अटल जी अक्सर संस्कृतनिष्ट हिन्दी का प्रयोग करते थे। उनका व्यंग भी इतना मीठा होता था कि विपक्ष भी खुद को मुस्कुराने से रोक नहीं सकते थे।

दुर्लभ किस्से और अनसुनी बातें

अस्सी के दशक में अटल जी उत्तर प्रदेश में एक पदयात्रा पर थे। तब उनके मित्र ने पूछा- “वाजपेयी, ये पदयात्रा कब तक चलेगी?”

जवाब मिला- “जब तक पद नहीं मिलता, यात्रा चलती रहेगी।”

अपने पिता के साथ थे क्लासमेट : अटल जी और उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी कानपुर के डीएवी कॉलेज में एलएलबी की पढ़ाई के दौरान क्लासमेट थे।

कॉलेज लव स्टोरी : ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में अटल जी राजकुमारी कौल से मिले। दोनों के बीच प्रेम हुआ, लेकिन राजकुमारी की शादी हो गई।

अटल जी के विपक्ष के नेताओं से भी काफी अच्छे संबंध थे-

1957 में अटल जी जब पहली बार सांसद बने, तो उनके भाषणों से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था- “यह लड़का एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा”

इंदिरा गांधी ने 1977 में संयुक्त राष्ट्र में दिए गए उनके हिंदी भाषण की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की।

1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के समय कश्मीर मुद्दे पर जिनेवा में विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

अटल जी के भाषण को संसद की धरोहर माना जाता है। उनकी बातों को विरोधी भी बड़ी गंभीरता से सुनते थे।

1996 में 13 दिन की सरकार गिरने पर अविश्वास प्रस्ताव के जवाब में कहा- “सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए, देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।”

पोखरण-2 के बाद संसद में गरजते हुए उन्होंने कहा था— “हम किसी पर आक्रमण नहीं करेंगे, लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार रखने से पीछे भी नहीं हटेंगे।”

युवा भारत के लिए अटल जी की प्रेरणा

अटल जी कहा करते थे कि “राजनीति सत्ता का नहीं, सेवा का माध्यम है।” अटल जी स्वयं युवावस्था में संघर्ष करते हुए राजनीत में आए थे, काफी लंबे समय विपक्ष में रहे। अटल जी केवल अतीत की नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की एक प्रासांगिक विचारधारा है। अटल जी कि ये कविता “कदम मिलाकर चलना होगा” युवाओं को नेतृत्वकर्ता के रूप में उभारने के लिए प्रासांगिक है। जबकि “गीत नया गाता हूँ” युवाओं को धैर्य रखने की सीख देता है।

उनके द्वारा विश्व की धमकियों को दरकिनार करते हुए परमाणु परीक्षण करना ये बताता है कि किस प्रकार अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए किसी की भी परवाह नहीं करनी चाहिए।

Topics: NDA governmentअटल बिहारी वाजपेयीatal bihari vajpayeeBJP leaderPokhran-2indian politicsAtal ji poemsIndian diplomacyIndian Democracy
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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