“ॐ”, ठाकुर रोशन सिंह के जीवन का मूल मन्त्र था, वे इसका जाप करते रहते थे। उन्होंने वेद, उपनिषद और गीता का गहन अध्ययन किया था। उनके हाथ में गीता हर समय रहती थी, इसलिए फांसी के दिन बुलावा आने पर, हाथ में गीता लिए मुस्कुराते हुए चल पड़े थे। 19 दिसंबर 1927 स्वच्छ कपड़े पहने और मूंछों को ताव देकर हाथ में गीता लिए ठाकुर रोशन सिंह फांसी के तख्ते पर पहुंचे।
ॐ की ध्वनि जेल के बाहर खड़े जन समूह को सुनाई देने लगी। मन्त्र समाप्त ही हुआ था, तभी दो बार वन्दे मातरम् स्पष्ट सुनाई दिया तीसरी बार वन्दे मातरम् की आधी आवाज आई और भारत माता के इस महान सपूत ने स्वाधीनता के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
शाहजहाँपुर में हुआ जन्म
क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 22 जनवरी, 1892 को शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) में गांव ‘नवादा’में हुआ था। माता का नाम कौशल्या देवी और पिता का नाम ठाकुर जंगी सिंह था। ठाकुर रोशन सिंह का परिवार ‘आर्य समाजी था। वे पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। जब गांधीजी ने ‘असहयोग आन्दोलन शुरू किया, तब रोशन सिंह ने शाहजहांपुर और बरेली जिले के ग्रामीण क्षेत्र में अद्भुत योगदान दिया था, यहीं पुलिस के अत्याचार के विरुद्ध गोली चला दी थी। परिणामस्वरूप 2 वर्ष की सजा हुई थी।
ईश्वर पर अगाध श्रद्धा
हिन्दू धर्म, आर्य संस्कृति, भारतीय स्वाधीनता और क्रान्ति के विषय में ठाकुर रोशन सिंह सदैव पढ़ते व सुनते रहते थे। ईश्वर पर उनकी अगाध श्रद्धा थी। संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी इन सभी भाषाओं को सीखने का प्रयत्न करते रहते थे। स्वस्थ, सबल शरीर के भीतर स्थिर उनका हृदय और मस्तिष्क भी उतना ही सबल और विशाल था। वह 1920 में असहयोग आन्दोलन से पूरी तरह प्रभावित हो गए थे और जेल भी गए परंतु गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के कारण, निराश हो गए थे। इसके बाद ही वह क्रांतिकारी हो गए।
काकोरी मामले में मुखबिर बनाने की कोशिश
9 अगस्त, 1925 को लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन के निकट काकोरी अनुष्ठान में सरकारी खजाना हस्तगत किया गया था, जिसमें ठाकुर रोशन सिंह की विशेष भूमिका थी। वह रामप्रसाद बिस्मिल के साथ रहकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बिगुल फूंका। काकोरी अनुष्ठान के आरोप में वे 26 सितम्बर, 1925 को गिरफ़्तार किये गए थे। जेल जीवन में पुलिस ने उन्हें मुखबिर बनाने के लिए बहुत कोशिश की, लेकिन वे डिगे नहीं। चट्टान की तरह अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहे।
मुझे फांसी हो जाये तो कोई दु:ख नहीं
‘काकोरी अनुष्ठान ‘के सन्दर्भ में रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की तरह ठाकुर रोशन सिंह को भी फांसी की सजा दी गई थी। अदालत से बाहर निकलने पर उन्होंने साथियों से कहा था हमने तो जिंदगी का आनंद खूब ले लिया है, मुझे फांसी हो जाये तो कोई दु:ख नहीं है, लेकिन तुम्हारे लिए मुझे अफसोस हो रहा है, क्योंकि तुमने तो अभी जीवन का कुछ भी नहीं देखा।
मलाका जेल में फांसी देने का फरमान
उसी रात रोशन सिंह लखनऊ से ट्रेन द्वारा इलाहाबाद जेल भेजे गए। उसी ट्रेन से काकोरी अनुष्ठान के दो अन्य सेनानी विष्णु शरण दुबलिस और मन्मथनाथ गुप्त भी इलाहाबाद जा रहे थे। उन्हें नैनी जेल में कारावास की सज़ा दी गई थी। डिब्बे के दूसरे यात्रियों को जब पता चला की ये तीनों क्रन्तिकारी और ‘काकोरी अनुष्ठान “के वीर हैं,तो उन्होंने श्रद्धा-पूर्वक इन लोगों के लिए अपनी-अपनी सीटें ख़ाली करके आराम से बैठने का अनुरोध किया।
नैनी जेल से लिखा पत्र
रोशन सिंह ने 13 दिसम्बर, 1927 को इलाहाबाद की नैनी जेल की काल कोठरी से अपने मित्र को पत्र लिखा-
” इस सप्ताह के भीतर ही फांसी होगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि आप मेरे लिए रंज हरगिज न करें। मेरी मौत खुशी का कारण होगी। दुनिया में पैदा होकर मरना जरूर है। दुनिया में बदफैली करके अपने को बदनाम न करें और मरते वक्त ईश्वर को याद रखें, यही दो बातें होनी चाहिए। ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह दोनों बातें हैं। इसलिए मेरी मौत किसी प्रकार से अफसोस के लायक नहीं है। दो साल से बाल-बच्चों से अलग रहा हूँ। इस बीच ईश्वर भजन का खूब मौका मिला। इससे मेरा मोह छूट गया और कोई वासना बाकी न रही। मेरा पूरा विश्वास है कि दुनिया की कष्ट भरी यात्रा समाप्त करके मैं अब आराम की ज़िंदगी जीने के लिए जा रहा हूँ। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो आदमी धर्म युद्ध में प्राण देता है, उसकी वही गति होती है, जो जंगल में रहकर तपस्या करने वाले महात्मा मुनियों की…। ”
पत्र समाप्त करने के पश्चात उसके अंत में ठाकुर रोशन सिंह ने अपना शेर भी लिखा-
“जि़ंदगी जिंदा-दिली को जान ऐ रोशन!
वरना कितने मरे और पैदा होते जाते हैं।
आख़िरी नमस्ते।आपका-रोशन
पहरेदार हुआ चकित
फांसी से पहले की एक रात ठाकुर रोशन सिंह कुछ घंटे सोए, फिर देर रात से ही ईश्वर भजन करते रहे। प्रात:काल कुछ देर ‘गीता पाठ में लगाया, फिर पहरेदार से कहा- ‘चलो। वह हैरत से देखने लगा कि यह कोई आदमी है या देवता। उन्होंने अपनी काल कोठरी को प्रणाम किया और ‘गीता हाथ में लेकर निर्विकार भाव से फांसी घर की ओर चल दिए। फांसी के फंदे को चूमा, वेद मंत्र का जाप किया फिर जोर से तीन बार ‘वंदे मातरम का उद्घोष करते हुए वे 19 दिसम्बर, 1927 को फंदे से झूल गए। उस समय वे इतने निर्विकार थे, जैसे कोई योगी सहज भाव से अपनी साधना कर रहा हो।
अमर बलिदानी को अंतिम प्रणाम
इलाहाबाद में नैनी स्थित मलाका जेल के फाटक पर हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष, युवा और वृद्ध, रोशन सिंह के अंतिम दर्शन करने और उनकी अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए खड़े थे। जैसे ही उनका शव जेल कर्मचारी बाहर लाए, वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने नारा लगाया रोशन सिंह अमर रहें।
भारी जुलूस के साथ शवयात्रा निकली और गंगा-यमुना के संगम तट पर जाकर रुकी, जहाँ वैदिक रीति से उनका अंतिम संस्कार किया गया।

















