ब्रिटेन में एक नई बहस छिड़ी हुई है। किसी की ब्रिटिश नागरिकता छीन लेने की ताकत देने वाले प्रावधानों को लेकर इन दिनों आम चर्चा है कि जो पाकिस्तानी आपराधिक कृत्यों, यौन अपराधों, बलात्कार आदि में लिप्त हैं उनको जल्दी ही ब्रिटेन से बाहर खदेड़ दिया जाएगा। इन सुगबुगाहटों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। वहां के दो एनजीओ ‘रिप्रीव’ तथा ‘रन्नीमेड ट्रस्ट’ ने मिलकर एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें सचेत किया गया है कि ब्रिटेन की गृह मंत्री शबाना महमूद के पास ऐसी गुप्त ताकत है कि वे चाहें तो बड़ी संख्या में मुसलमानों की ब्रिटिश नागरिकता छीन सकती हैं और उन्हें उनके मूल देश वापस लौटा सकती हैं। रिपोर्ट बताती है कि विशेष रूप से ऐसे मुस्लिम नागरिकों पर तलवार लटक गई है जो विदेशी मूल के माता-पिता से जन्मे हैं। साफ है कि इसमें पाकिस्तानी मूल के अनेक ब्रिटिश नागरिक भी शामिल हैं, जिनकी संख्या लाखों में है। यह मुद्दा ब्रिटेन की नस्लीय और पांथिक राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
दोनों एनजीओ की यह साझी रिपोर्ट ‘स्ट्रिपिंग ब्रिटिशनेस’ के शीर्षक से जारी की गई है। यह ब्रिटेन की नागरिकता एवं इमिग्रेशन एक्ट 2022 की धारा 40ए पर केंद्रित है। इस धारा के तहत गृह मंत्री को बिना कोई नोटिस जारी किए किसी भी ब्रिटिश नागरिक की नागरिकता को रद्द कर देने की ताकत मिली हुई है। इसमें शर्त यह है कि निशाने पर आया व्यक्ति ‘ब्रिटिश हितों के लिए खतरा’ माना गया हो।

रिपोर्ट आगे कहती है कि ये शक्तियां सार्वजनिक रूप से सबके सामने नहीं हैं, क्योंकि इस संबंध में निर्णय की अपील प्रक्रिया भी गोपनीय ही रखी जाती है। दोनों संगठनों का दावा है कि इससे प्रभावित होने वाले लाखों लोग, जिनमें ज्यादातर दक्षिण एशियाई मुसलमान होंगे, अपने मूल देशों में लौटाए जा सकते हैं, भले ही उनकी पैदाइश ब्रिटेन की हो।
ब्रिटेन में रह रहा पाकिस्तानी समुदाय सबसे बड़े दक्षिण एशियाई समूहों में से एक है। 2021 की जनगणना के अनुसार, ब्रिटेन में लगभग 15 लाख लोग पाकिस्तानी मूल के थे, जिनमें से करीब 13 लाख ब्रिटिश नागरिक हैं। इनमें से अधिकांश दूसरी या तीसरे पीढ़ी के हैं, यानी उनके माता-पिता या दादा-दादी पाकिस्तान से आए थे। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि ऐसे कम से कम 5-6 लाख पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश नागरिकों, जिनके माता-पिता विदेशी थे, पर नागरिकता खोने का खतरा मंडरा रहा है। जैसे, अगर कोई व्यक्ति ब्रिटेन में पैदा हुआ है, लेकिन उसके माता-पिता पाकिस्तानी नागरिक हैं, तो गृह मंत्री उसे ‘विदेशी’ मानकर उसकी नागरिकता निरस्त कर सकती है।
रिप्रीव की रिपोर्ट में अनेक उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे ये ‘शक्तियां’ पहले से अमल में ली जा रही हैं। 2010 से अब तक, 200 से अधिक मामलों में इस प्रकार नागरिकता छीनी जा चुकी है। प्रभावितों में ज्यादातर मुस्लिम थे। एक मामले में, ब्रिटेन में जन्मे एक व्यक्ति की नागरिकता इसलिए छीन ली गई थी, क्योंकि उसके पिता सोमाली थे। रिपोर्ट सावधान करती है कि शबाना महमूद, जो खुद पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश मुस्लिम हैं, के नेतृत्व में ये शक्तियां और मजबूत हो सकती हैं, खासकर यदि उनका ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर दुरुपयोग न हों। रन्नीमेड ट्रस्ट ने इसे ‘संस्थागत नस्लवाद’ का एक रूप कहा है।
ये ‘शक्तियां’ ब्रिटिश साम्राज्यवादी काल से चली आ रही हैं, लेकिन 2002 के ब्रिटिश नागरिकता अधिनियम ने इन्हें मजबूती दी है। 2014 में तत्कालीन गृह मंत्री थेरेसा मे ने ‘आतंकवाद’ के नाम पर इनका विस्तार किया था। अब धारा 40ए के तहत किसी की नागरिकता तभी बहाल हो सकती है जब व्यक्ति साबित करे कि वह ‘ब्रिटिश हितों’ के खिलाफ नहीं है, जो कि एक असंभव सा काम माना जाता है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे यूरोपीय मानवाधिकार संधि का उल्लंघन बताया है।
रिपोर्ट में दिए गए कुछ आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जैसे, ब्रिटेन की कुल आबादी में मुसलमान 6.5 प्रतिशत (लगभग 40 लाख) है। इनमें 50 प्रतिशत से अधिक दक्षिण एशियाई मूल (पाकिस्तानी, बांग्लादेशी) हैं। विदेशी माता-पिता वाले ब्रिटेन में जन्मे मुसलमानों की संख्या 10-15 लाख के आसपास बताई गई है। नागरिकता रद्द होने के 90 प्रतिशत मामले मुस्लिमों पर केंद्रित।
इस रिपोर्ट को देखते हुए कई संगठनों ने सरकार से मांग की है कि ये ‘शक्तियां’ खत्म की जाएं। लेबर पार्टी की सरकार ने हालांकि अभी कोई साफ प्रतिक्रिया नहीं दी है। उधर विपक्षी कंजर्वेटिव्स ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का हवाला देकर इन ‘शक्तियों’ का समर्थन किया है। ब्रिटेन की मुस्लिम काउंसिल ने इसके विरुद्ध प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

















