गत 9 और 10 दिसंबर को नई दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद् की केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक आयोजित हुई। इसमें देश भर से आए विभिन्न पंथों के 225 वरिष्ठ संतों ने भाग लिया। अंतिम दिन विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने कहा कि बैठक में तमिलनाडु उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी. आर. स्वामीनाथन पर हिंदू-हित का निर्णय देने पर डी. एम. के. और शिवसेना उद्धव गुट के सहयोग से उन्हें हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाने के प्रस्ताव की चर्चा हुई, जबकि किसी न्यायाधीश के निर्णय के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। पर महाभियोग लाना तो न्यायपालिका पर अनुचित दबाव बनाने का प्रयत्न है।
इसकी निंदा की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के संविधान में मजहबी अल्पसंख्यकों को कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं। यह आश्चर्य की बात है कि संविधान में मजहबी अल्पसंख्यक की कोई परिभाषा नहीं दी गई है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 में केंद्र सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी मत को अल्पसंख्यक घोषित कर दे। केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल का सुनिश्चित मत है कि मजहबी अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित किया जाए। इसमें यह भी विचार करना होगा कि क्या कोई पंथ ऐसा है जिसके मतावलम्बियों को मजहब के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव सहन करना पड़ा हो।
इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि क्या किसी मत के अनुयायी बाकी समाज से किसी भी क्षेत्र में पिछड़ गए हैं! उन्होंने कहा कि यह तो मानना पड़ेगा कि भारत में किसी भी काल में मुस्लिम और ईसाई मत को मानने वाले लोगों को मजहब के आधार पर कभी कोई उत्पीड़न या भेदभाव सहन नहीं करना पड़ा। वह बाकी समाज से पीछे नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार मुसलमानों की आबादी 14 प्रतिशत से ज्यादा थी। कहा जा रहा है कि अभी यह आबादी 18 से 20 प्रतिशत तक हो गई है। भारत एक पंथनिरपेक्ष देश है। हमारा संविधान मजहब के आधार पर किसी भी भेदभाव को अस्वीकार करता है। क्या ऐसे में भारत में मजहब के आधार पर अल्पसंख्यक बनाए रखना उचित होगा?

















