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मूल में लाैटने का संकेत

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय का एक संदेश यह है कि जो लोग अपनी मूल संस्कृति को छोड़ चुके हैं, उन्हें फिर से वापस लाने का प्रयास तेज होना चाहिए

Written byलक्ष्मण सिंह मरकामलक्ष्मण सिंह मरकाम
Dec 15, 2025, 10:45 am IST
inभारत, मत अभिमत

आजादी के बाद जनजातियों के विकास को तो प्राथमिकता दी गई, लेकिन उनकी संस्कृति, रीति-रिवाज, परंपराओं को नेपथ्य में डाल दिया गया। बेरियर एल्विन जैसे कई अंग्रेजीदां लोग भारत सरकार के सलाहकार नियुक्त हुए। इन लोगों ने जनजातीय क्षेत्रों को पाश्चात्य विचारधारा के अनुसार विकसित करने का प्रयास किया। अब असली जनजाति कौन है? वे, जिन्होंने अपने रीति-रिवाज, धर्म, परंपरा को त्यागकर कन्वर्जन कर लिया है अथवा वे, जो आज भी अपने पूर्वजों के रीति-रिवाज, संस्कृति और परंपराओं को मानते हुए अपना विकास कर रहे हैं?

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कन्वर्ट हो चुके जनजाति समाज के लोग शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न हो गए हैं। यह बात भी सही है कि जनजाति समाज को नौकरी और शिक्षा में जो आरक्षण मिलता है, उसके अधिकांश हिस्सों पर कन्वर्ट हो चुके लोगों ने ही कब्जा किया है। जिन लोगों को आरक्षण और अन्य सरकारी सुविधाओं की जरूरत है, उन्हें किसी न किसी कारणवश अवसर प्राप्त नहीं हो रहे हैं। पद्मश्री डॉ. जे.के. बजाज ने अपनी एक रपट में इन बातों को बहुत प्रमुखता से लिखा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के वर्ग-एक, वर्ग-दो के महत्वपूर्ण पदों पर कन्वर्ट हो चुके जनजाति ही काबिज हैं।

यह सर्वविदित है कि जनजाति समाज के लोग सूर्यपूजक, नागपूजक अथवा शिवपूजक हैं। इसके विपरीत सैमेटिक पंथों में इस प्रकार की पूजा की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद जो लोग ईसाइयत या अन्य पंथ अपना चुके हैं, वे अपने को जनजाति ही मानते हैं और हर सरकारी सुविधा ले रहे हैं। इसलिए इन दिनों यह मांग की जा रही है कि जो लोग अपने मूल धर्म और संस्कृति को त्याग चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिलना चाहिए। आज के परिवेश में अनुच्छेद-342 में संशोधन करना आसान नहीं है, लेकिन इसका रास्ता भी यही है। बता दें कि अनुच्छेद 341 में प्रावधान है कि अनुसूचित जाति के जो लोग विदेशी मत अपना लेते हैं, उन्हें अनुसूचित जाति की सुविधाएं नहीं मिलती हैं।इसलिए यह मांग की जा रही है कि अनुच्छेद 342 में भी यह प्रावधान किया जाए कि जनजाति समाज के जो लोग विदेशी मत को स्वीकार कर लेते हैं, उन्हें जनजाति न माना जाए। लेकिन इस तरह की बात सुनते ही कुछ लोग इसके विरोध में देश-विदेश में सक्रिय हो जाते हैं। इसलिए ‘डी-लिस्टिंग’ को जमीनी स्तर पर लाने के लिए हमें दो चरण में कार्य करने की आवश्यकता है। पहला चरण है कि अनुसूचित जनजातियों के मूल अधिकारों में संशोधन किए बिना उनके सामुदायिक अधिकारों में संशोधन की बात की जाए। दूसरा चरण है कि उनकी पैत्तृक संपत्ति एवं मूल अधिकारों की प्राप्ति में बदलाव किया जाए। इसके अलावा एक रास्ता यह भी हो सकता है कि उन्हें मूल संस्कृति की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया जाए। ऐसे लोगों को जब लगेगा कि कन्वर्ट होने से उन्हें जनजाति दर्जे का लाभ नहीं मिलेगा, तो वे फिर से वापस आ सकते हैं।

सामुदायिक लाभों में दो प्रमुख लाभ हैं। इनमें एक है, राजनीतिक आरक्षण। इसे हम अनुच्छेद-340 के तहत लाभ कह सकते हैं। इसके अंतर्गत पंचायत से लेकर संसद तक में अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं। ‘पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट’ में संशोधन किया जा सकता है, क्योंकि शुरुआत में यह केवल 10 वर्ष के लिए था। इसे 10-10 वर्ष के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। राजनीतिक आरक्षण में लोकुर समिति का उल्लेख किया जा सकता है। इसके तहत इस बात को स्थापित किया गया है कि अनुसूचित जनजाति समाज सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से पिछड़ा है। वहीं दूसरी ओर जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े नहीं हैं।

अगर कन्वर्ट हो चुके जनजाति लोगों को राजनीतिक आरक्षण से वंचित कर दिया जाए तो मूल अधिकारों में छेड़छाड़ करने से बचा जा सकता है। इससे यह संदेश जाएगा कि किसी भी कन्वर्ट हुए व्यक्ति को मूल संस्कृति से जुड़े लोगों का प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है। इसका लाभ मूल जनजातियों को ही मिलेगा। अभी होता यह है कि कन्वर्ट हुए जो लोग जनजातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे मूल जनजातियों की आवाज को दबा देते हैं। (अभिलेखागार- संपादित)

Topics: इलाहाबाद उच्च न्यायालयसंस्कृतिरीति-रिवाजपाञ्चजन्य विशेषलक्ष्मण सिंह मरकामकन्वर्टराजनीतिक आरक्षण
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