महान् क्रांतिकारी महाकवि भारथियार सुब्रह्मण्य भारती,एक महान् राष्ट्रवादी तमिल कवि, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी,दक्षिण में वंदे मातरम गीत के पुरोधा,समाज सुधारक और उत्कृष्ट पत्रकार थे। प्राचीन काल में महर्षि अगस्त्य ने उत्तर भारत से दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति का प्रकाश फैलाया, तमिलकम के मदुरै में प्रथम संगम कराया – मध्य युग में महान् संत रामानंद भक्ति को दक्षिण भारत से उत्तर भारत लाए- आधुनिक काल में महाकवि सुब्रह्मण्य भारती उत्तर भारत व दक्षिण भारत के मध्य भाषाई एकता के सेतु बने।यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि ऐंसे महान् राष्ट्रीय एकता के प्रतीक को इतिहास में एक कवि बताकर इतिश्री कर ली परंतु उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व को विस्मृत कर दिया गया।
सुब्रमण्य भारथियार का जन्म 11 दिसंबर 1882 को तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के एट्टायपुरम नामक गाँव में हुआ था और उनका बचपन का नाम सुब्बैया था। उनके पिता का नाम चिन्नास्वामी अय्यर और माता का नाम लक्ष्मी अम्मल था।
सात वर्ष की आयु में सुब्बैया ने तमिल में कविताएँ लिखना शुरु कर दिया था। ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने इस प्रकार लिखा कि विद्वान भी उनके ज्ञान और कौशल की प्रशंसा करने लगे। ग्यारहवें वर्ष में सुब्बैया ने महसूस किया कि उन्हें अपनी योग्यता प्रमाणित करनी है। उन्होंने विद्वानों की सभा में उपस्थित प्रतिष्ठित व्यक्तियों को चुनौती दी कि वे बिना किसी पूर्व सूचना या तैयारी के किसी भी विषय पर उनसे वाद-विवाद करें। सन् 1893 में यह प्रतियोगिता एट्टायपुरम दरबार के एक विशेष सत्र में आयोजित की गई, जिसमें स्वयं राजा (शासक) उपस्थित थे। विषय “शिक्षा” चुना गया था । सुब्बैया ने कुशलतापूर्वक वाद-विवाद जीत लिया। यह सुब्बैया के जीवन का एक यादगार क्षण था। तदुपरान्त एट्टयापुरम महाराज की सभा में बालक सुब्बैया से विद्वान सभा ने तमिल साहित्य और व्याकरण पर अनेक प्रश्न पूछे जिसके उत्तर सुब्बैया ने अपनी विलक्षण प्रतिभा और तर्क से दिये। राजा और विद्वान सभा के अध्यक्ष ‘विरुदैशिवज्ञान योगी’ ने सुब्बैया की प्रतिभा से प्रसन्न होकर उसे ‘भारती’ की उपाधि प्रदान की। सुब्बैया की आयु इस समय मात्र ग्यारह साल थी। उस दिन से सुब्बैया सुब्रह्मण्य भारती के नाम से जाना जाने लगा। बाद में राष्ट्रवादियों और विश्व भर के लाखों तमिल प्रेमियों द्वारा उन्हें आदरपूर्वक “भारथियार” कहा गया।
जून सन् 1897 में,भारती का विवाह लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में हुई और उनका नाम चेल्लमल(चेल्लमा )था। भारती वाराणसी के लिए रवाना हुए, जिसे काशी और बनारस के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने अगले दो वर्ष अपनी मौसी कुप्पम्मल और उनके पति कृष्णशिवन के साथ वहाँ बिताए। संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान शीघ्र ही प्राप्त कर लेने के बाद, उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में अच्छे अंकों के साथ सफलता प्राप्त की। बनारस में रहने से भारती के व्यक्तित्व में जबरदस्त परिवर्तन आया। बाहरी रुप से, उन्होंने मूंछें और सिख पगड़ी रख ली और उनके जीवन में एक अलग ही आत्मविश्वास आ गया था।
उल्लेखनीय है कि सुब्रमण्य भारती के साथ तमिल साहित्य में एक नए युग की शुरुआत हुई। उनकी अधिकांश रचनाएँ देशभक्ति,भक्ति और रहस्यवादी विषयों पर लघु गीतात्मक प्रस्तुति के रुप में वर्गीकृत की गई हैं। भारती मूलतः एक गीतात्मक कवि थे।उनकी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ: ‘कण पाणु’ ( कृष्ण के लिये गीत -सन् 1917), ‘पांचाली सपथम’ (पांचाली का व्रत-1912), ‘कुयिल पाउ’ कुयिल का गीत-1912), ‘पुड़िया रूस’ और ‘ज्ञानारथम’ (ज्ञान का रथ)आदि हैं।उनकी कई अंग्रेज़ी कृतियों को ‘अग्नि’ और अन्य कविताओं तथा अनुवादों एवं निबंधों व अन्य गद्य अंशों (सन् 1937) में एकत्र किया गया था।
भारती को देशभक्ति से भरपूर उनकी अनेक कविताओं के कारण राष्ट्रीय कवि माना जाता है, जिनके माध्यम से उन्होंने लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने और देश की मुक्ति के लिए सक्रिय रूप से काम करने के लिए प्रेरित किया। अपने देश पर गर्व करने के अलावा, उन्होंने एक स्वतंत्र भारत के अपने दृष्टिकोण को भी स्पष्ट किया। उन्होंने 1908 में देशभक्ति से ओत -प्रोत “सुदेशा गीथंगल” और जन्मभूमि का प्रकाशन किया, दोनों रचनाएँ सिस्टर निवेदिता को समर्पित की हैं।
काशी में ही उन्हें राष्ट्रीय चेतना की शिक्षा मिली, जो आगे चलकर उनके काव्य का मुख्य स्वर बन गयी। काशी में उनका सम्पर्क भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा निर्मित ‘हरिश्चन्द्र मण्डल’ से रहा।
काशी में उन्होंने कुछ समय एक विद्यालय में अध्यापन कार्य किया। तीन गैर-भारतीय विदेशी भाषाओं सहित लगभग 32 भाषाओं में पारंगत होने के बावजूद, उनका प्राथमिक लगाव तमिल से था। तमिल साहित्य पर भारती का प्रभाव असाधारण है, क्योंकि उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को व्यापक रूप से संबोधित किया।
अपनी युवावस्था के आरंभ में भारती के वी.ओ. चिदंबरम, सुब्रमण्य शिव, मंदायम तिरुमलचारियार और श्रीनिवासचारी जैसे राष्ट्रवादी तमिल नेताओं से गहरे संबंध थे। इन नेताओं के साथ वे ब्रिटिश शासन के कारण देश के सामने आने वाली समस्याओं पर चर्चा करते थे। भारती भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में भाग लेते थे और लोकमान्य तिलक,बिपिन चंद्र पाल, और वी.वी.एस.अय्यर जैसे उग्र भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं के साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श करते थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के काशी अधिवेशन (सन् 1905) और सूरत अधिवेशन (सन् 1907) में उनकी भागीदारी रही।
परन्तु काशी अधिवेशन सुब्रमण्य भारती के लिए युगान्तकारी रहा। सन् 1905 में काशी में हुए ‘कांग्रेस अधिवेशन’ में सुप्रसिद्ध कवयित्री एवं गायिका सरला देवी चौधुरानी ने जब बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का ‘वन्दे मातरम्’ गीत गाया, तब भारती भी उस अधिवेशन में गए हुए थे। तभी से बंकिम चन्द्र का ‘वन्दे मातरम्’ गीत, भारती का प्रिय गान और जीवन प्राण बन गया था। मद्रास लौटकर भारती ने इस गीत का तमिल में पद्यानुवाद किया, जो आगे चलकर तमिलनाडु के घर-घर में गूँज उठा और दक्षिण भारत में अखंड भारत का मंत्र बना।महाकवि सुब्रह्मण्य के लिए यह गीत उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया था। वे उत्तर-दक्षिण भारत के साहित्यिक सेतु थे।
राष्ट्रीय चेतना के लिए भारती ने ‘वंदे मातरम’ को एक मंत्र के रूप में स्वीकार किया था। भारती ने ‘वंदे मातरम’ का तमिल में अनुवाद प्रस्तुत किया इसके अतिरिक्त वंदे मातरम नाम से अन्य कविताएँ भी लिखी। ‘वंदे मातरम’ क्रांतिकारी आंदोलन के लिए भावनात्मक महत्व रखता था।
भारती ‘वंदे मातरम’ को बाल रवि का पर्याय मानते हैं,जो कि समस्त अंधकार को मिटा देता है। भारती इस नारे का प्रभाव जानते थे, क्योंकि बीसवीं सदी के आरंभ में अंग्रेजों को तिलमिलाने के लिए यह नारा लगाना ही बहुत था।
भारती अपनी कविता ‘वंदे मातरम् – 1’ भारत के संपूर्ण जनता से वंदे मातरम गाने का आह्वान करते हैं। भारती महसूस करते हैं, कि भारतीय जनता की दासता का कारण उनकी आपसी फूट तथा ऊँच-नीच की भावना है। इसी का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने अपना राज्य स्थापित किया है। भारती संपूर्ण जनता को आपसी भेद भुलाकर स्वतंत्रता की ओर बढ़ने की सलाह देते हैं। ‘वंदे मातरम्-2’ कविता में भारती भारतीय जनता के तेजस्वी गुणों को मुखर करते हुए,उनसे ‘वंदे मातरम’ गाने को कहते हैं। वस्तुतः वंदे मातरम पर भारती का जोर इसलिए था, कि इस गान में भारतीयों को आपस में जोड़ने की अद्भुत शक्ति थी, साथ ही अंग्रेजी शासन को तिलमिलाने का गुण भी था। इसी कारण से भारती इसे भारत के स्व के गीत की संज्ञा देते हैं। भारती ने इसके दो तमिल अनुवाद प्रस्तुत किए।
महाकवि भारती,राष्ट्रत्व बोध के आलोक में समधर्म समुदाय की कल्पना करते हुए लिखते हैं—
“काक्कै कुरुवी एंगल जाति
कडलुम् मलैयुम् एंगल कूट्टम्”
अर्थात् – “कौआ, चिड़िया हमारी जाति,समुद्र पर्वत भी हमारे साथी”
कवि कहते हैं कि संसार के हर वस्तु के साथ हमारी एकता है, वही हमारी शक्ति है।
महाकवि भारती,जाति व्यवस्था के भी विरोधी थे। उन्होंने घोषणा की थी,कि केवल दो ही जातियाँ हैं – पुरुष और स्त्री, इससे अधिक कुछ नहीं है।उन्होंने अनेक दलितों को जनेऊ धारण कराया था। दलितों के मंदिर प्रवेश का समर्थन किया। अपने सभी सुधारों के लिए उन्हें अपने पड़ोसियों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन भारती इस बात को लेकर बहुत दृढ़ थे कि जब तक भारतीय भारत माता की संतान के रूप में एकजुट नहीं होंगे, तब तक उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती। वे महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और महिला मुक्ति में विश्वास रखते थे। उन्होंने बाल विवाह और दहेज प्रथा का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया।
एक कवि, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक के रूप में भारती ने न केवल तमिल समाज पर बल्कि पूरे मानव समाज पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने जो उपदेश दिया, उसका स्वयं भी पालन किया और यहीं उनकी महानता प्रकट होती है।
महाकवि भारती ने अपना पत्रकारिता जीवन नवंबर 1904 में “स्वदेशमित्रन” से शुरू किया। उन्होंने मई 1906 में “इंडिया” पत्रिका की शुरुआत की, तथा क्रांतिकारी उत्साह के साथ तमिल पत्रकारिता की शुरुआत की। अपने उग्र रुख को व्यक्त करने के लिए, “इंडिया” को लाल कागज पर छापा गया और इसमें पहला तमिल राजनीतिक कार्टून दिखाया गया। सन् 1908 में महान् क्रान्तिकारी भारती के विरुद्ध बरतानिया सरकार ने गिरफ़्तारी वारंट जारी कर दिया।
गिरफ्तारी से बचने के लिए भारती 1908 में पांडिचेरी चले गये, जो उस समय फ्रांसीसी क्षेत्र था। अपने पांडिचेरी निर्वासन के दौरान, उन्होंने अरबिंदो और लाजपत राय जैसे उग्रवादी स्वतंत्रता नेताओं के साथ संपर्क बनाए रखा।भारती ने पांडिचेरी के तमिल युवकों को राष्ट्रवाद की ओर प्रेरित किया, जिससे ब्रिटिश आक्रोश और अधिक बढ़ गया।
नवंबर 1918 में ब्रिटिश भारत में पुनः प्रवेश करने पर गिरफ्तार होने के बाद भी उन्होंने जेल में स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद पर लिखना जारी रखा।
स्वाधीनता संग्राम की यात्रा में उन्होंने कोलकाता जाकर बम बनाना और पिस्तौल चलाना सीखा साथ ही गुरिल्ला युद्ध का भी प्रशिक्षण लिया। गाँधी जी से भी उनका संपर्क हुआ और 1920 के असहयोग आन्दोलन में भी सहभागी हुए। स्वराज्य, स्वभाषा तथा स्वदेशी के प्रबल समर्थक इस राष्ट्र प्रेमी कवि का 12 सितम्बर, 1921 को मद्रास में देहावसान हुआ।
अब वर्तमान की आवश्यकता है कि महान् क्रांतिकारी महाकवि सुब्रह्मण्य भारती के कृतित्व और व्यक्तित्व को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। फिर आप देखना कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत का भेद बताने वाले राष्ट्रविरोधी तत्वों का सर्वनाश हो जाएगा।
महाकवि भारती की ये रचना भारत के लिए सदैव मार्गदर्शी रहेगी,
“भारद देसमेंद्रु पेयर सोल्लुवार-मिडिप्
भयंगोल्लुवार तुयर्प्पगै वेल्लुवार
भारदप् पोर वेन्द्र कण्णनरुलाल-तुयर
भार मरुवाल सेल्व भारमुरुवाल”
अर्थात् – भारत देश नाम हमारा, हमसे पंगा जो भी लेंगे भयभीत होकर भाग जाएँगे, कुरुक्षेत्र के विजेता श्री कृष्ण की कृपा से भारत माता पीड़ा मुक्त होगी समृद्धि के पथ पर अग्रसर होगी।















