सावरकर जी ने सागरास गीत की रचना दिसंबर में नहीं बल्कि जुलाई-अगस्त में की थी। “10 दिसंबर को अंडमान में सावरकर जी की 116वीं जयंती के मौके पर, सरसंघचालक श्री मोहनजी भागवत और गृह मंत्री श्री अमितजी शाह के हाथों वीर सावरकर की मूर्ति का अनावरण किया जाएगा।” यह खुशखबरी सभी राष्ट्रीय पत्रिकाओं में छपी थी। इसे पढ़कर खुशी होना स्वाभाविक है। यह समाचार अभिनंदनीय है लेकिन यहां एक तकनीकी गलती दोहराई जा रही है। वह है, सावरकर जी के ‘सागरास’ गीत के रचना समय को लेकर ।
सावरकर जी के एक चरित्रकार विक्रम संपत अपनी पुस्तक ‘सावरकरः एक भूले-बिसरे अतीत गूँज’ में पृ 182 पर लिखतें है कि, “10 दिसंबर 1909 को वह अपने मित्र निरंजन पाल के साथ ब्राइटेन के समुद्री तट पर बैठे थे । … भावप्रवणता के उस आवेग ने एक शाश्वत गीत के रूप में आकार लिया जिसने उस समय से अनेक लोगों को भावातिरेक किया है- ने मजसी ने परत मातृभूमिला सागरा, प्राण तळमळला ।”
सावरकर जी की मूल संहिता में कहीं पर भी 10 दिसंबर का कोई उल्लेख नहीं है । संपत जी ने शायद पं हृदयनाथ मंगेशकर जी की 2009 की मुलाकात का आधार लिया हो, जिसमें पंडितजी ने उक्त गीत की रचना की तिथि 10 दिसंबर का उल्लेख किया था । प्रस्तुत लेखक ने 14 दिसंबर 2009 को तरुण भारत में इस पर लिखा भी था, की यह रचना काल बराबर नहीं है। तथा देशदूत के शब्दगंध (2009) तथा सकाळ के सप्तरंग में (2021) में इस गीत का रसग्रहण भी किया था ।
सावरकर जी के जीवनकाल में प्रकाशित हुईं कृतियां
वस्तुतः सावरकर जी के पहले चरित्रकार शि ल करंदीकरने गीत का रचनाकाल जुलाई का अंतिम सप्ताह या अगस्त का पहला सप्ताह ही दिया है । हालांकि धनंजय कीर ने (पृ66) रचनाकाल का कोई उल्लेख नहीं किया, लेकिन उनका लेखन भी जुलाई अगस्त को दर्शाता है । ध्यान रहे, दोनों चरित्रकारों को सावरकर जी भलीभांति जानते थे तथा उनकी कृतियां सावरकर जी के जीवनकाल में ही प्रकाशित हो चुकी थीं । क्रांतिकारियों पर सघन साहित्य की निर्मिति करने वाले वि श्री जोशी क्रांतिकललोळ पुस्तक में 284 पृष्ठ पर स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि, “29 जुलाई को ताजगी पाने के लिए सावरकर लंदन की दक्षिण की ओर स्थित ब्राइटेन को गये थे । वहां पर वे लगभग 10-12 दिन थे । … उसी दौरान उन्होंने सागरास इस दिव्य कविता की रचना की ।”
मदनलाल ढींगरा के प्रेरणापुरुण वीर सावरकर
यह वह दौर था जब मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली का वध किया था । और उन्हीं के प्रेरणापुरुष के नाते सावरकर जी को देखा जा रहा था । सावरकर जी को लंदन छोड़ना पड़ा था । सावरकर गहरे संकट से घिरे थे। इसी दौरान उन्होंने सागरास यह गीत लिखा था। स्वयं सावरकर जी इस गीत के रचनाकाल के संदर्भ में 14 नवम्बर 1953 को ज्ञानमंदिर में दिये गये अपने व्याख्यान में कहते हैं, ‘’ दस्तुरखुद लंदन में मदनलाल ने कर्जन वायली इस अंग्रेज सेवक को मारने के कारण वहां पर खलबली मच गयी थी । उस के पीछे मेरा हाथ है, ऐसा जानकर मुझे लंदन में रहने हेतु कोई जगह मिलना मुश्किल हो गया था । जिनके पास मैं रहता था, वे बिपिनचंद्र पाल भी मुझे उनके पास रखने को तैय्यार नहीं थे । …उस वकत निवास की खोज में मैं विश्रांति हेतु ब्रायटन गया था । वहां पर सागरतट पर घूमते समय मैंने यह कविता लिखी ।’’ (समग्र सावरकर साहित्य खंड 9 पृ 61)
उदास भावावस्था में भी क्रांतिकार्य का पछतावा नहीं
इन सभी प्रमाणों से पता चलता है कि, सावरकरजी ने ‘सागरा प्राण तळमळला ।’ यह उत्कट गीत जुलाई के अंतिम दिनों या अगस्त के आरंभ में रचा था । हालांकि, लेखक का मानना है कि यह गीत कब जन्मा यह प्रश्न जितना महत्व रखता है, उससे कई गुणा महत्व गीत के भाव का है । फिर भी ऐतिहासिक तथ्यों को ठीक करना आवश्यक रहता है । जिससे गीत लिखते समय की कवि की भावदशा व पार्श्वभूमि का पता चले। यह भी पता चले कि उदास व असुरक्षित भावावस्था में भी सावरकरजी के मन में देशकार्य व क्रांतिकार्य को लेकर थोड़ा भी पछतावा नहीं था । अपितु उनकी उदास, हताश मनोदशा भी उत्कटता से देशप्रेम ही दर्शाती है । यह भी सिद्ध हो तथा ऐतिहासिक तथ्य भी बरकरार रहे ।












