पाकिस्तान पिछले कई दिनों से अफगानिस्तान की तालिबान हुकूमत पर बेवजह हेकड़ी दिखाता आ रहा था। उसे लगता था कि अफगानिस्तान से सटे बार्डर बंद करने पर तालिबान हाथ जोड़े उसके सामने आ खड़े होंगे। वे चिरौरी करेंगे कि बार्डर खोल दो जिससे उनका माल पाकिस्तान के रास्ते जा सके। लेकिन अफगानिस्तान ने ऐसा पैंतरा चला है कि प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और फौजी जनरल असीम मुनीर सकते में आ गए हैं। तालिबान ने जिन्ना के देश को पटखनी देते हुए तोरखम छोड़ चाबहार का रास्ता पकड़ लिया है यानी कारोबार के लिए पाकिस्तान के आसरे अब वह नहीं रहना चाहता है।
तालिबान का यह एक ऐसा निर्णय है जो दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और व्यापार में आ रहे अवरोधों को देखते हुए लिया गया है। पाकिस्तान ने बार-बार अपने बॉर्डर को बंद करके अफगानिस्तान को ब्लैकमेल करने की कोशिश की, ताकि उसके कारोबार में अड़चनें आएं और तालिबान हुकूमत अपनी आर्थिक सुरक्षा और स्थिरता के लिए पाकिस्तान के सहारे आ टिके। तब पाकिस्तान चाहता था कि उसे अपने हुक्म पर चलाए। लेकिन तालिबान ने तो राह ही बदल दी। जिन्ना के देश के नेताओं की बचकानी धमकियों में आने के बजाय अफगानिस्तान ने आर्थिक क्षेत्र में गति बनाए रखने और कारोबारी विकल्पों का रास्ता खोलने की दिशा में एक गजब का फैसला लिया है।
परंपरागत निर्भरता और बॉर्डर की भूमिका
पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक संबंध परंपरा से चले आ रहे हैं। विशेष रूप से, तोरखम और चमन सीमाएं इस दृष्टि से महत्वपूर्ण गेटवे बन रहे हैं। इन दोनों सीमाओं से होकर ही करीब 40 फीसदी अफगान व्यापार होता था। ये दोनों सीमाएं न सिर्फ माल लाने—ले जाने के लिए खास थे, बल्कि लोगों की आवाजाही के लिए भी अहम मार्ग थे। अफगान अर्थव्यवस्था के लिए पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण हब रहा है, जहां से कई जरूरी वस्तुऔर और ऊर्जा की आपूर्ति होती थी।
लेकिन 2024 के अंत से लेकर 2025 के दौरान अधिकांश समय, इन सीमाओं पर कड़ी पाबंदियां और बंदिशें लागू रही हैं। पाकिस्तान ने सुरक्षा कारणों और राजनयिक दबाव के तहत बॉर्डर क्रॉसिंग को बंद कर दिया, जिससे अफगानिस्तान को आर्थिक रूप से कुछ नुकसान झेलना पड़ा। पाकिस्तान यही चाहता था कि कारोबार में नुकसान को देखते हुए अफगानिस्तान उसकी ब्लैकमेल की चाल में फंस जाएगा।
लेकिन पाकिस्तान के बॉर्डर बंद करने और व्यापार स्थगित करने के इन कदमों को अफगानिस्तान पहचान गया और जिन्ना के देश के छुपे एजेंडे की भनक भी पा गया। पाकिस्तान का ये कदम छुपे रूप में दबाव, राजनीतिक व सुरक्षा मामलों से जुड़ी मुश्किलों को बढ़ाता जा रहा था। तालिबान ने पाकिस्तान की इस रणनीति को अफगानी हुकूमत को आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर कमजोर करने के प्रयास के रूप में देखा।

इस स्थिति में, अफगानिस्तान ने अपने व्यापारिक नेटवर्क के विस्तार के लिए, नए मार्गों और साझीदारों की तलाश करने के लिए तथा पाकिस्तान के आसरे कम रहने की रणनीति पर कदम बढ़ाए हैं। तालिबान ने पड़ोसी देशों, जैसे ईरान, ताजिकिस्तान और चीन के साथ अपने कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया है।
पाकिस्तान पर निर्भरता कम करने के लिए अफगानिस्तान ने नए कारोबारी मार्गों और कनेक्टिविटी की परियोजनाएं अपनाई हैं। दिलचस्प बात है कि ईरान के चाबहार पोर्ट को अफगानिस्तान के लिए एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग बनाया गया है। यह पोर्ट दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच कम किराये और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने का एक प्रमुख केंद्र बन रहा है।
इसके अलावा, ताजिकिस्तान के साथ सीमा पार कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट, विशेष आर्थिक क्षेत्र और ट्रांजिट सुविधाओं पर जोर दिया जा रहा है। चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत अफगानिस्तान को नए आर्थिक और लॉजिस्टिक जुड़ाव मिल रहे हैं, जो पाकिस्तान के जरिए व्यापार की निर्भरता को कम कर रहे हैं।
कारोबार में कमी और आर्थिक प्रभाव
तोरखम और चमन बॉर्डर क्रॉसिंग के लंबे समय तक बंद रहने से कारोबार में लगभग 40 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। यह चीज खासकर उन अफगान व्यवसायों के लिए चुनौतीपूर्ण रही जो पाकिस्तान की बाजार और आपूर्ति चेन पर निर्भर थे। माल की आवाजाही में रुकावट से कीमतों में बढ़ोतरी हुई और कई छोटे व मध्यम उद्योगों की गतिविधियां प्रभावित हुईं। सरकारी डेटा के अनुसार, अफगानिस्तान के औपचारिक व्यापार में भारी गिरावट आई है, जिससे रोजगार पर भी असर पड़ा है। इससे अफगान अर्थव्यवस्था की स्थिरता पर दबाव पड़ा और विकास दर धीमी हो गई।
राजनीतिक और भविष्य की चुनौतियां
दोनों देशों के बीच ये आर्थिक तनाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। यह क्षेत्रीय सुरक्षा, राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को भी प्रभावित करता है। तालिबान सरकार के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने पड़ोसियों के साथ बेहतर संबंध स्थापित करके व्यापारिक स्थिरता और आर्थिक विकास सुनिश्चित करे। पाकिस्तान को भी उसने दो टूक शब्दों में कहा है कि वह भारत से दोस्ती करे या न करे, इसमें पाकिस्तान को चिंता करने की जरूरत नहीं है।
अफगानिस्तान ने पाकिस्तान पर अपनी व्यापार निर्भरता कम करने की जो पहल की है, वह आवश्यक और दूरदर्शी कदम बताया जा रहा है। यह अफगानिस्तान की आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। बॉर्डर क्रॉसिंग के बंद होने से उत्पन्न दबाव ने अफगानिस्तान को वैकल्पिक कारोबारी रास्ते खोजने की प्रेरणा दी। हालांकि इसके कारण आर्थिक चुनौतियां बनी हैं, लेकिन यह कदम क्षेत्रीय आर्थिक परिदृश्य को एक नया रूप देने में सहायक हो सकता है। इस एक कदम से तालिबान ने जिन्ना के देश के नेताओं की बोलती बंद कर दी है।

















