पाकिस्तान में हिन्दू दमन बाकायदा जारी है। दिखावे की कार्रवाइयों और फर्जी बयानों का मुलम्मा चढ़ाकर जिन्ना के देश की इस्लामवादी सरकार ने मजहबी उन्मादियों को हिन्दू विरोधी हरकतों की खुली छूट दी हुई है। इस संबंध में एक और मामला सामने आया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना उस सिंध प्रांत में घटी है जहां आएदिन मजहबी उन्मादी हिन्दू लड़कियों को अगवा कर रहे हैं और उन्हें कन्वर्ट करके मुसलमानों से ब्याह रहे हैं। सिंध में हिंदू समुदाय की ठीकठाक संख्या है लेकिन इतनी नहीं कि वहां का प्रशासन उनके दुख—दर्द को समझे। वे वहां उस देश में ‘अल्पसंख्यक’ हैं। इसलिए कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हिंदू लड़कियों को तो खास निशाने पर रखा जाता है। उन्हें रोजमर्रा जिंदगी में तिरस्कार झेलना पड़ता है। इतना ही नहीं, अब तो उनका पढ़ना—लिखना भी दूभर कर देने के षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। एक सरकारी स्कूल में उन पर दबाव बनाया गया है कि वे पढ़ना तभी जारी रख पाएंगी जब मुसलमान बन जाएंगी।
यह सीधे—सीधे मजहबी दबाव और उत्पीड़न का मामला है। सिंध के मीरपुर सकरो में एक सरकारी हाई स्कूल है, जहां कुछ हिन्दू बच्चियां पढ़ने जाया करती हैं। वहां की यह एक घटना प्रकाश में आई है। वहां की हिंदू छात्राओं पर दबाव डाला जा रहा है कि वे इस्लाम अपना लें और बेखटके पढ़ाई जारी रखें। इसके लिए बाकायदा उन पर मानसिक दबाव बनाया जा रहा है। इसमें स्कूल के कुछ शिक्षक ही नहीं, साथ पढ़ने वाली मुस्लिम छात्राएं भी हैं। वे हिन्दू बच्चियों पर दबाव बनाती हैं कि पूजा-पाठ छोड़कर कलमा पढ़ोगी, इस्लाम अपनाओगी तो स्कूल में उनके लिए हर सुविधा रहेगी, उनसे बेहतर व्यवहार होगा। स्थानीय हिन्दू इस्लामवादियों की इस नई हरकत से सकते में हैं और अपनी बच्चियों की कुशलक्षेम को लेकर चिंतित रहने लगे हैं।

कई छात्राओं के माता-पिता ने इस उत्पीड़न की शिकायत स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग से की है, लेकिन उनकी वहां कोई सुनवाई नहीं हुई। स्कूल के अफसर इस मामले को दबाने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे लोगों पर भी कोई ठोस कार्रवाई अभी तक देखने में नहीं आई है। इससे साफ है कि सरकारी शिक्षा संस्थान भी इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव में चल रहे हैं।
सिंध में बदहाल हिंदू
जिन्ना के देश में सिंध वह प्रांत है जहां देश के अन्य इलाकों की तुलना में हिंदुओं की अच्छी-खासी संख्या है। यहां रहने वाला हिंदू समुदाय खेती के साथ ही छोटे-मोटे कारोबार में जुटा है। इसके बावजूद, स्थानीय मुस्लिम समाज उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक मानकर उनसे बुरा व्यवहार करता है। उन्हें हर जगह भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उनकी जमीन पर अवैध कब्जे किए जाते हैं। समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है, उनके मंदिरों का अपमान किया जाता है, उन्हें दूषित किया जाता है। कभी हिन्दू मंदिर में कोई तीज-त्योहार मनाने लगते हैं तो उसमें अड़ंगे डाले जात हैं। ये सब घटनाएं वहां के हिन्दुओं के लिए आम हो चली हैं। उनकी कोई सुनवाई भी नहीं होती, न कोई मुुस्लिम नेता उनकी आवाज उठाता है, न पुलिस उन्हें सुरक्षा देती है। हिन्दू महिलाओं और लड़कियों को तो दमन के निशाने पर रखना जैसे मजहबी उन्मादियों का पसंदीदा शगल हो गया है।
इस्लामवादी दबाव और जुल्म
सिंध में एक अरसे से इस्लामी कट्टरपंथी समूह गैर-मुस्लिमों, विशेषकर हिंदुओं और ईसाई समुदायों पर अत्याचार करते आ रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यकों को इस्लाम अपनाने का दबाव डालना और उनकी धार्मिक पहचान खत्म करना होता है। कितनी ही हिन्दू लड़कियों को दिनदहाड़े अगवा करके उनका मुस्लिमों से निकाह पढ़ाया जा चुका है। इसमें वहां के मौलवियों, उन्मादी तत्वों और पुलिस की मिलीभगत रहती है। अदालतें भी हिन्दुओं की आह नहीं सुनतीं। हिन्दुओं का मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न होता रहता है। सरकारी स्तर पर हिन्दुओं को कोई कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती।
बेशक, सिंध के हिंदू समुदाय के लिए यह घटना एक चेतावनी जैसी है कि उनके बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार संकट में हैं। इसके साथ ही सिंध में जो भी चल रहा है वह पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे की गंभीर चुनौती को भी दर्शाता है।

















