पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की 26 साल की सुनाली खातून भारत की नागरिक हैं। बावजूद इसके, गलती से उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उन्हें वापस भारत लाया गया। सुनाली अपने 8 साल के बेटे के साथ शुक्रवार को भारत लौटीं। उन्हें बांग्लादेश की जेल में कुल 103 दिन बिताने पड़े।
सुनाली और उनके बेटे को उत्तर बंगाल के मालदा सीमा के रास्ते भारत लाया गया। फिलहाल, चार अन्य निर्वासित लोग अभी भी बांग्लादेश में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें भी वापस लाने का आदेश दिया है, लेकिन अभी उनकी वापसी की तारीख तय नहीं हुई है। एक अधिकारी ने बताया कि सुनाली गर्भावस्था के अंतिम चरण में हैं। उन्हें शाम लगभग सात बजे उप-उच्चायुक्त स्तर के अधिकारी के पास सौंपा गया। इसके बाद दोनों को बीएसएफ शिविर, मेहदीपुर ले जाया गया और फिर उनकी मेडिकल जांच के लिए मालदा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल लाया गया। डॉक्टर यदि उन्हें यात्रा के लिए फिट पाएंगे, तो उन्हें शनिवार को उनके घर, बीरभूम जिले के मुरारई में पैकर गांव के दोरजी पारा इलाके में पहुंचा दिया जाएगा।
सुनाली को 18 जून को दिल्ली के काटजू नगर थाना पुलिस ने हिरासत में लिया था। उन्हें रोहिणी सेक्टर 26 की बंगाली बस्ती से गिरफ्तार किया गया। उन्हें बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया। बाद में, सुनाली, उनके पति दानिश और बेटे को विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय के आदेश पर बांग्लादेश भेज दिया गया। उस समय बीरभूम के एक अन्य परिवार को भी बांग्लादेश भेजा गया। उस परिवार में स्वीटी बीबी और उनके दो बेटे, कुर्बान शेख (16 साल) और इमाम दीवान (6 साल) शामिल थे। सुनाली समेत सभी छह लोगों को 20 अगस्त से बांग्लादेश के चपई नवाबगंज सुधार गृह में रखा गया। उन्हें वहां कथित रूप से ‘घुसपैठियों’ के रूप में हिरासत में रखा गया। हालांकि, एक न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 1 दिसंबर को हर एक व्यक्ति को 5,000 टका के मुचलके पर जमानत दे दी। सुनाली और उनके बेटे की वापसी उनके परिवार और गांव के लिए राहत की खबर है।















