भारत के गौरवशाली इतिहास परंपरा में भील जनजाति का अद्भुत स्थान है। ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों के आलोक में सतयुग में महादेव – बड़ा देव के पुत्र निषाद, जो तीर कमान विद्या में निपुण थे, भील जनजाति के आदि पुरुष के रूप में शिरोधार्य हैं। त्रेता में भगवान श्री राम के साथ निषादराज गुह और द्वापर युग में धनुर्धर अर्जुन की परीक्षा के लिए महादेव किरात भील के रूप में अवतरित हुए थे। वर्तमान युग के हर कालखंड में और स्वातंत्र्यसमर में भील जनजाति का अति विशिष्ट योगदान है। प्राचीन काल में सिकंदर को शिवी जनपद के भीलों ने पराजित किया था, मध्यकाल में महाराणा प्रताप के साथ राणा पूंजा भील ने अकबर के विरुद्ध भयंकर संग्राम किया था और मेवाड़ से खदेड़ दिया था।
इसी महान् परंपरा में महारथी टंट्या भील अंग्रेजी शासन को ध्वस्त करने के लिए 12 वर्ष तक लगातार 24 युद्ध लड़े और अपराजेय रहे। उन्हें षड्यंत्र कर गिरफ्तार किया गया था। टंट्या भील महिला सशक्तिकरण के संरक्षक थे, इसलिए उन्हें टंट्या मामा के नाम से भी जाना जाता है। विश्व के इतिहास में ऐसा बहुरंगी महारथी मिलना दुर्लभ है।
टंट्या मामा गरीबों के मसीहा थे, इसलिए उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है। कतिपय पश्चिमी लेखक और अंग्रेज अधिकारी उन्हें भारत के रॉबिनहुड के नाम से रेखांकित करते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर बलिदानी महारथी टंट्या भील की कर्मभूमि मध्य भारत मध्य प्रांत एवं मुंबई प्रेसिडेंसी के क्षेत्र थे, जहाँ उन्होंने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद किया था।
महारथी टंट्या का जन्म पूर्वी निमाड़ (खंडवा जिले) के पंधाना तहसील के बड़दा (बडाडा)गांव में 1840 में हुआ था, वनवासी संगठनों का मानना है कि तिथि 26 जनवरी थी। टंट्या के पिता का नाम श्रीयुत भाऊ सिंह था और उनकी पत्नी का नाम कागज बाई था। टंट्या शब्द का अर्थ विभिन्न इतिहासकारों ने प्रकारांतर से अलग-अलग बताया है परंतु वास्तव में टंट्या का शाब्दिक अर्थ है” संघर्ष” और इसी नाम को आगे जाकर महारथी टंट्या ने सार्थक किया।
टंट्या भील से टंट्या मामा बने
बाल्यकाल से ही महारथी टंट्या कुशाग्र बुद्धि के थे। तीर-कमान, लाठी और गोफन में प्रशिक्षण प्राप्त कर महारत हासिल कर ली थी। दावा या फलिया उनका मुख्य हथियार था और उन्होंने बंदूक चलाना भी सीख लिया था। उनका संबंध 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से भी है,जिसमें वे तात्या टोपे के साथ रहे और उन्हीं से गुरिल्ला युद्ध पद्धति में महारत हासिल की थी। बाल्यकाल में ही में ही उनके पिता ने आमजा माता के समक्ष महारथी टंट्या को शपथ दिलाई थी कि वह बेटियों बहुओं और बहनों की सदैव रक्षा करेंगे। टंट्या ने 300 निर्धन कन्याओं का विवाह कराया और महिलाओं के उत्थान के लिए अनेक कार्य किए, इसलिए उन्हें टंट्या मामा कहा जाता है।
टंट्या भील के संघर्ष की गाथा
टंट्या के पिता की जल्दी मृत्यु हो गई। सारी जिम्मेदारी उन पर आ गई। फसल ठीक से न आने के कारण वे 4 साल का लगान जमा नहीं कर सके, इसलिए उन्हें मालगुजार ने बेदखल कर दिया। इस मामले को लेकर वह अपने पिता के मित्र शिवा पाटिल के पास गए क्योंकि वह जमीन शिवा पाटिल और भाऊ सिंह दोनों ने मिलकर खरीदी थी। शिवा पाटिल ने जमीन पर अधिकार देने से मना कर दिया। महारथी टंट्या ने अंग्रेजी अदालत में मुकदमा दायर किया परंतु अंग्रेजी न्याय व्यवस्था ने झूठे साक्ष्यों के आधार पर टंट्या का प्रकरण समाप्त कर दिया। न्याय न मिलने से उनके पास संग्राम के अलावा कोई अन्य मार्ग नहीं बचा था, इसलिए एकदिन उन्होंने अपने साथियों के साथ शिवा के सभी आदमियों पर हमला बोल दिया और अपनी भूमि को कब्जे से मुक्त कराया। इसी समय अंग्रेज सरकार द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल की कठोर सजा मिली, जहां उन्होंने कैदियों पर अंग्रेजों के अत्याचार को देखा और उनके मन में स्वतंत्रता संग्राम की इच्छा बलवती हुई।

अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ा स्वतंत्रता संग्राम
1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और 1858 में भारत का शासन ब्रिटिश क्रॉउन के अधीन आ गया। इसके उपरांत ब्रिटिश सरकार का अत्याचार बढ़ गया। ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर मालगुजार और साहूकारों ने भी जनसाधारण का शोषण करना आरंभ किया। इस पर टंट्या ने वनवासियों और पीड़ितों को एकत्रित कर अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया। 1876 से टंट्या भील का ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विधिवत् स्वतंत्रता संग्राम का शुभारंभ हुआ, 20 नवंबर 1878 को उन्हें धोखे से पकड़कर खंडवा जेल में डाल दिया गया परंतु 24 नवंबर 1878 को रात में वह अपने साथियों के साथ दीवार लांघकर कर मुक्त हो गए। इसके बाद उन्होंने संगठन को मजबूत किया, जिसमें जिसमें बिजानिया भील, दौलिया, मोडिया और हिरिया जैसे साथी मिले और टंट्या ने ब्रिटिश सरकार के समानांतर 1700 गांव में सरकार चलाना आरंभ कर दी।
टंट्या पुलिस नाम से विशेष दस्ता
टंट्या ने एक विशेष दस्ता “टंट्या पुलिस” के नाम से गठित किया और साथ ही चलित न्यायालय बनाए जिसमें न्याय किया जाता था। महारथी टंट्या का 12 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम रहा है, जिसमें अंतिम 7 वर्ष बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ब्रिटिश सरकार को स्पेशल टास्क फोर्स, टंट्या भील पुलिस गठित करनी पड़ी थी। इस स्पेशल टास्क फोर्स के कमांडर एस. ब्रुक की एक हमले में वेश बदलकर महारथी टंट्या ने नाक काट दी थी।

टंट्या के राज में कोई भूखा नहीं रहा
महारथी टंट्या ने ब्रिटिश सरकार से 24 बार संघर्ष किया और वह विजयी रहे। इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार के खजाने और जमीदारों तथा माल गुजारों से सभी निर्धन वर्गों के लिए 400 बार धनराशि हस्तगत कर उन्हें वितरित की। अकाल के समय भी उन्होंने किसी को भूख से मरने नहीं दिया इसके उन्होंने कई बार अंग्रेजी सरकार द्वारा रेल से भेजे जा रहे अनाज को हस्तगत किया। यह बात प्रचलित हो गई थी कि महारथी टंट्या के राज में कोई भूखा नहीं सो सकेगा। सन् 1880 के बाद मध्य प्रांत, मध्य भारत और मुंबई प्रेसिडेंसी के क्षेत्रों में टंट्या चमत्कारिक स्वरूप के रूप में स्थापित हो गए थे। इसलिए उन्हें को भगवान का दर्जा दिया जाने लगा था, और अब महारथी टंट्या जननायक बन गए थे।
धोखे से पकड़े गए
तांतिया भील – हिस्ट्री ऑफ एम. पी. पुलिस के पृष्ठ क्रमांक 101 एवं 103 के हवाले से एक बार टंट्या और बिजानिया को गिरफ्तार करके जबलपुर सेंट्रल जेल लाया गया परंतु दोनों फिर से भाग निकले। दुर्भाग्य से बिजानिया, दौलिया मोडिया और हिरिया पकड़े गए और उन्हें फांसी दे दी गई। इससे टंट्या का संगठन कमजोर हो गया फिर भी ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी। ब्रिटिश सरकार ने टंट्या को पकड़ने के लिए उनकी मुंहबोली बहन के पति गणपत सिंह का सहयोग लिया और 11 अगस्त 1889 को रक्षा बंधन के दिन सुनियोजित षड्यंत्र के चलते जब राखी बंधवाने के लिए टंट्या अपनी बहन के यहां पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पहले खंडवा जेल में रखा गया फिर जबलपुर सेंट्रल जेल (वर्तमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस केन्द्रीय जेल) में स्थानांतरित कर दिया गया।
भारत का रॉबिनहुड कहा गया
जबलपुर के सत्र न्यायालय में महारथी टंट्या पर विभिन्न आपराधिक मामलों के साथ देशद्रोह का मुकदमा प्रारंभ हुआ। जब टंट्या को जबलपुर लाया गया तो हजारों लोग उनके दर्शन के लिए एकत्रित हुए थे,इसलिए आगे चलकर सेंट्रल जेल क्षेत्र में कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई थी। टंट्या भील को 19 अक्टूबर 1889 में फांसी की सजा सुनाई गई। संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क टाइम्स समाचार पत्र में 10 नवंबर 1889 को टंट्या भील की गिरफ्तारी पर एक खबर प्रकाशित की गई, जिसमें उन्हें भारत के रॉबिनहुड के रूप में रेखांकित किया गया था। फांसी की सजा के विरुद्ध मर्सी पिटिशन दाखिल की गई परंतु 25 नवंबर 1889 को मर्सी पिटीशन खारिज कर दी गई और 4 दिसंबर 1889 को महारथी टंट्या को नेताजी सुभाष चंद्र बोस केंद्रीय जेल में फांसी दे दी गई।
आज भी इस स्थान पर रुकती है ट्रेन
फांसी के बाद उनके मृत शरीर को पातालपानी के कालाकुंड रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया ताकि ब्रिटिश सरकार की दहशत बनी रहे। टंट्या का पार्थिव शरीर तो नष्ट हो गया परंतु वह अमर हो गए। टंट्या मामा का मंदिर भी बनवाया गया। यह प्रचलित है कि आज भी पातालपानी से जो भी रेल निकलती है वह थोड़ा रुकती है और टंट्या मामा(भगवान् टंट्या के रुप में) को सलामी दी जाती है
















