कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और विभिन्न प्रांतीय नेताओं ने फिर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध की मांग उठाई है, जबकि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने वाला संगठन बताया है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राज्य सरकारों ने स्वयंसेवकों के खिलाफ पुलिस मामले भी दर्ज किए हैं, विशेषकर, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में। संघ के विरुद्ध यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब संघ ने अपने शताब्दी कायर्क्रमों में संपूर्ण राष्ट्र और समाज को एक सूत्र में पिरोने का संकल्प लिया है। यह संकल्प उन राजनीतिक दलों को नागवार गुजरा है, जिनकी राजनीति का आधार हिंदुओं में जाति, पंथ, क्षेत्र और भाषा के नाम पर विभेद पैदा करना और मिशनरियों का तथा मुस्लिम तुष्टीकरण का रहा है, जिसमें कांग्रेस सबसे प्रमुख है।
कर्नाटक में संघ के पथ संचलन पर प्रतिबंध लगाया गया, जबकि केरल और तमिलनाडु में स्वयंसेवकों पर मामले दर्ज किए गए। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार द्वारा पथ संचलन को प्रतिबंधित करने के फैसले को संघ की ओर से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। लेकिन कांग्रेस सरकार यह नहीं बता पाई कि पथ संचलन पर प्रतिबंध लगाने का आधार क्या है, तो न्यायालय ने उसके आदेश पर रोक लगा दी। उधर, तमिलनाडु में 2 अक्तूबर को 39 और 4 अक्तूबर को 47 स्वयंसेवकों को बिना अनुमति संघ शताब्दी समारोह आयोजित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इसी तरह, गत सितंबर में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की थीम पर केरल में स्वयंसेवकों ने ‘पुष्प कालीन’ सजाकर उसमें भगवा ध्वज बनाया था। किंतु राष्ट्र गौरव स्मृति में की गई यह सजावट केरल सरकार को रास नहीं आई और उसने 27 स्वयंसेवकों पर मामला दर्ज करवा दिया। ये तो कुछ ही घटनाएं हैं, जो मीडिया में सुर्खियां बनीं।
कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने बार-बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। स्वयंसेवकों को पुलिस मामलों में फंसाने की घटनाएं लगातार होती रही हैं। इन प्रतिबंधों या मांगों का आधार संघ की गतिविधियां नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव और असफलताओं से ध्यान भटकाना है। कई राज्यों में, जैसे मध्यप्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, बिहार, महाराष्ट्र में भी ऐसी मांगें उठी हैं। जिनका कहीं कोई तार्किक आधार नहीं हैं।

संघ विरोध का इतिहास
संघ के विरुद्ध वे सभी शक्तियां एकजुट हैं, जो भारत के सांस्कृतिक और सनातन स्वरूप को खत्म कर इसे अपने रंग में ढालने का कुचक्र रचती रहती हैं। स्वतंत्रता से पहले ईसाई मिशनरियों और मुस्लिम लीग संघ के विरोधी थे, जिनसे कांग्रेस का सद्भाव रहा है। कई बार तो कांग्रेस इनकी भाषा बोलती नजर आई है। मल्लिकार्जुन खड़गे ने आज संघ पर प्रतिबंध की मांग उठाई है, लेकिन सच यह है कि वे पिछले वर्ष एक सभा में कह चुके हैं कि ‘यदि भाजपा जीती तो सनातन धर्म मजबूत होगा।’
यह उनकी मानसिकता को स्पष्ट करता है। संघ ने न तो कभी किसी मत-मजहब का विरोध किया है, न हिंसा की है और न ही यह जाति-पंथ में भेदभाव करता है। संघ समाज और राष्ट्र पर संकट के समय सेवा कार्य के लिए तत्पर रहता है। उल्टे केरल, पश्चित बंगाल, कर्नाटक, कश्मीर आदि राज्यों में स्वयंसेवकों पर हमले होते रहते हैं। फिर भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दल संघ पर साम्प्रदायिकता और विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाते हैं। खुद कांग्रेस का इतिहास ही विभाजन और मजहबी आधार पर पक्षपात से अटा पड़ा है।
पंथनिरपेक्षता का ढोंग करने वाली कांग्रेस ने मजहब के आधार देश के टुकड़े किए, मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए संविधान में संशोधन कर कानून बनाए। संघ ने तो सदैव एक देश, एक कानून की बात की है। वास्तव में, संघ विरोध के पीछे कांग्रेस की दो मंशाएं है-पहला, अपनी असफलताओं व विभाजनकारी सोच से जनता का ध्यान बंटाना और दूसी मुस्लिम तुष्टीकरण। कांग्रेस के शासनकाल में संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं, जिसका फायदा हर बार देश और सनातन विरोधी शक्तियों ने उठाया।
पहली बार फरवरी 1948 में गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था। तब देश में कट्टरपंथी हिंसा चरम पर थी। अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग के ‘डायरेक्ट एक्शन’ से जो हिंसा शुरू हुई, वह थमी नहीं थी। विभाजन के समय पेशावर, लाहौर से लेकर कराची तक हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे थे। उन्हें भारतीय सीमा तक सुरक्षित लाना बड़ी चुनौती थी। तत्कालीन सरकार उनकी सुरक्षा व व्यवस्था करने में विफल रही। ऐसे समय में रा.स्व.संघ ने सेवा कार्य संभाला और इसमें कई स्वयंसेवक बलिदान हुए। इसी बीच, गांधीजी की हत्या ने देश को झकझोर दिया। सुरक्षा की जिम्मेदारी होते हुए भी नेहरू सरकार उस घटना को रोक नहीं पाई।
हत्या के बाद सरकार ने संघ पर आरोप लगाकर प्रतिबंध लगाया, जिससे नेहरू सरकार की असफलताओं से ध्यान हट गया। बाद में कपूर आयोग की रिपोर्ट में संघ को निर्दोष पाया गया। इस प्रतिबंध ने संघ के संघर्ष को और दृढ़ किया, यद्यपि इससे शरणार्थियों की सेवा प्रभावित हुई। संघ पर दूसरा प्रतिबंध 1975 में आपातकाल के दौरान लगाया गया, जब इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। उस समय भी देश में असंतोष फैला हुआ था। त्यागपत्र देने के बजाय उन्होंने आपातकाल घोषित किया और संघ पर पाबंदी लगा दी। तीसरा प्रतिबंध 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने के बाद कांग्रेस सरकार ने ही लगाया। अल्पमत और विवादों से घिरी सरकार ने तुष्टीकरण नीति की आलोचना से बचने के लिए संघ पर प्रतिबंध लगाया था।
इसलिए संघ निशाने पर
आज भी कांग्रेस द्वारा रा.स्व.संघ पर प्रतिबंध लगाने की मांग और उसके विरुद्ध अभियान ऐसे समय में चलाया जा रहा है, जब देश और विदेश की कुछ शक्तियां भारत में तनाव और टकराव फैलाने का प्रयास कर रही हैं। ये तत्व भारत की विकास गति रोकने और उसकी सांस्कृतिक पहचान को घायल करने के उद्देश्य से सक्रिय हैं। विदेशी फंडिंग से प्रेरित कुछ एनजीओ और कट्टरपंथी समूह सामाजिक व साम्प्रदायिक मुद्दों को भड़का रहे हैं। इसे कांवड़ यात्रा से लेकर दशहरे तक हिंदू त्योहारों पर ‘सर तन से जुदा’, ‘आई लव मोहम्मद’ जैसे नारों से समझा जा सकता है। वहीं, कांग्रेस समर्थित संगठन व्यक्तिगत अपराधों को जाति और वर्ग से जोड़कर समाज को बांटने के कुचक्र में जुटे हुए हैं। इन परिस्थितियों को पहचानकर रा.स्व.संघ ने नागरिक कर्तव्य, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, स्वदेशी और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर केंद्रित ‘पंच परिवर्तन’ अभियान आरंभ किया है, जो समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास है।
भारत में कट्टरपंथियों द्वारा फैलाए जा रहे असंतोष से मुक्ति तभी संभव है, जब समाज जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र आदि भेदों से ऊपर उठकर एकजुट हो। संघ ने यही लक्ष्य अपनाया है। स्वदेशी, नागरिक कर्त्तव्यों की चेतना और सामाजिक समरसता के माध्यम से संघ भारत विरोधी शक्तियों के कुचक्र को विफल करने का प्रयास कर रहा है। अपने शताब्दी समारोह के अंतर्गत संघ इस एकता को मूर्त रूप देने में लगा है, जिसमें विभिन्न वर्गों का सहयोग मिल रहा है। अनेक स्थानों पर मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की भी सहभागिता हुई। गत अगस्त माह में दिल्ली के संवाद समागम और नागपुर के स्थापना दिवस समारोह ने इस सामाजिक समरसता को बल दिया। इसी के कुछ समय बाद दक्षिण भारत की राज्य सरकारों ने संघ की गतिविधियों पर अंकुश लगाना शुरू किया और कांग्रेस ने प्रतिबंध की मांग उठाई।
कांग्रेस को संघ से आपत्ति इसलिए भी है, क्योंकि स्वतंत्रता से पहले उसके आंदोलनों में सहयोग करने के बावजूद संघ की स्वतंत्र राष्ट्र निर्माण की दृष्टि उसके राजनीतिक हितों से अलग रही। कांग्रेस नेताओं ने राष्ट्रीय एकता से अधिक सेकुलरवाद को प्राथमिकता दी, जिससे वे सनातन संस्कृति और संघ की विचारधारा के विरोध में खड़े दिखे। आज जब संघ सामाजिक समरसता का अभियान चला रहा है, तब कांग्रेस ने फिर से इसके विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है। सनातन के सशक्त होने पर मल्लिकार्जुन खड़गे का चिंतित होना, संघ पर प्रतिबंध की मांग करना या सनातन धर्म की तुलना डेंगू-मलेरिया से करने वाले तत्वों के समर्थन में खड़े होना, यह सब कांग्रेस के इतिहास से जुड़े हैं।

















