‘आयुर्वेद के प्रति उत्सुकता बढ़ी’
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‘आयुर्वेद के प्रति उत्सुकता बढ़ी’

‘स्वास्थ्य’ सत्र में डॉ. प्रवीण कुमार रेड्डी ने अपने विचार रखे

Written byपाञ्चजन्यपाञ्चजन्य
Nov 25, 2025, 02:46 pm IST
inविश्लेषण, पाञ्चजन्य इवेंट
डॉ. प्रवीण कुमार रेड्डी से बातचीत करते हुए अनुराग पुनेठा

डॉ. प्रवीण कुमार रेड्डी से बातचीत करते हुए अनुराग पुनेठा

भारतीय परंपरा में आयुर्वेद को वेद का दर्जा दिया गया है। मैं स्वयं मॉडर्न मेडिसिन से आता हूं और एलोपैथी में हम लक्षणों के आधार पर उपचार शुरू करते हैं और शल्य चिकित्सा तक जाते हैं। इसमें जांच पर अधिक निर्भरता रहती है। वहीं कोविड के दौरान सभी लोगों ने अपनी भारतीय परंपरा की तरफ ध्यान दिया, चाहे वह काढ़ा हो या अन्य पारंपरिक चीजें, सबको प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना गया। जबकि एलोपैथी में ऐसा कोई कुछ नहीं होता।

आयुर्वेद एक जीवन परंपरा है, जीवन शैली है, और व्यक्ति को कैसे 100 साल तक स्वस्थ रहना चाहिए-इसका जीवन रहस्य आयुर्वेद में छुपा है। एलोपैथी पिछले 40–100 वर्ष में विकसित हुई है और इसमें शोध अच्छे हुए हैं, इसमें नकारात्मक चीजें नहीं हैं। मगर दोनों को मिलाकर चलना चाहिए, बेस्ट ऑफ द ईस्ट और बेस्ट ऑफ द वेस्ट। ऐसे ही शोध हमें आयुर्वेद पर भी करने चाहिए। पिछले 400-500 या 2000 साल का जो ज्ञान हमने खो दिया, उस पर शोध की आवश्यकता है।

आयुर्वेदिक परिप्रेक्ष्य पंच तत्वों पर आधारित है और उनसे जुड़े तीन दोष वात, पित्त, कफ इसकी मूल अवधारणा हैं। जब ये तीनों संतुलित नहीं रहते, तब वैद्य परीक्षण करता है और फिर इलाज तय करता है। आयुर्वेद में नाड़ी परीक्षण का महत्व बहुत अधिक है। बिना कुछ कहे वैद्य नाड़ी देखकर ही आपको जान लेता है और इलाज की सलाह देता है। आयुर्वेदिक ज्ञान और परंपरा को मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। इसमें शोध को पुनर्जीवित करना होगा और भारतीय परंपरा के इस वैज्ञानिक आधार को पुनः स्थापित करना होगा। हालांकि एलोपैथी को नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। उसके अपने पैमाने हैं।

जांच हो, शल्य चिकित्सा हो, अंग प्रत्यारोपण हो, बहुत सी ऐसे आधुनिक चीजें आई हैं, जिनकी कल्पना भी कुछ दशक पहले नहीं थी। इसलिए उसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन आजादी से पहले 200 साल की गुलामी और जो भारतीय पद्धति से हटकर विदेशी दर्शन, शिक्षा और स्वास्थ्य में लाया गया, उसने हमारी जीवन पद्धति को प्रभावित किया। धीरे-धीरे यह हमारे मस्तिष्क में, डीएनए तक बैठ गया कि यदि कोई जड़ी-बूटी लेता है या वैद्य के पास जाता है, तो उसे नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। यह धारणा अब बदल रही है।

आचार्य सुश्रुत को ‘फादर ऑफ सर्जरी’ कहा गया है। आयुर्वेदिक विज्ञान में जो सर्जरी थी, हम उस विज्ञान से वंचित हो गए हैं। उदाहरण के लिए, गणेश जी का जो स्वरूप है, वह अंगप्रत्यारोपण का उदाहरण है, आज तक दुनिया ‘शीश प्रत्यारोपण’ की कल्पना ही कर पा रही है। टेस्ट ट्यूब बेबी का जिक्र करें, महाभारत में 100 बच्चे पैदा हुए, वह तकनीक उस समय थी। ऐसी तकनीक के हस्तांतरित होने में जो समयांतर हुआ और शिक्षा पद्धति में जो हमने खोया,उस पर शोध करने की आवश्यकता है।

उन्होंने बताया कि एलोपैथी चिकित्सा एडवांस होने और शोध के कारण आगे बढ़ी है। हालांकि आयुर्वेदिक चिकित्सा में भी पिछले 10 वर्षों में अच्छी प्रगति हुई है। एम्स दिल्ली में 2017 में ‘सेंटर फॉर इंटीग्रेटिव मेडिसिन एंड रिसर्च’ शुरू हुआ। पिछले सात वर्ष में 40,000 से अधिक मरीज शुरूआती तौर पर पर पंजीकृत हुए और बहुत से शोध पत्र प्रकाशित हुए।

सरकार इस दिशा में आगे कदम बढ़ा रही है। जहां जांच के बाद शल्य चिकित्सा की जरूरत हो, वहां एलोपैथी का सहारा लिया जा सकता है। एम्स सहित कई संस्थानों में आयुष और योग विज्ञान पर व्यापक अनुसंधान हो रहा है। आने वाले एक-दो दशक में आयुर्वेद मुख्यधारा में होगा।

Topics: आचार्य सुश्रुतडॉ. प्रवीण कुमार रेड्डीआयुर्वेद मुख्यधाराआयुर्वेदभारतीय परंपरासुशासन संवादमॉडर्न मेडिसिन
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