लाचित बरफुकन: वह महानायक जिसने अपनी ‘हेंगडैंग’ शमशीर से औरंगजेब को भयभीत किया और सरायघाट युद्ध जीता
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लाचित बरफुकन: वह महानायक जिसने अपनी ‘हेंगडैंग’ शमशीर से औरंगजेब को भयभीत किया और सरायघाट युद्ध जीता

छोलुंग सुकफा अहोम साम्राज्य के संस्थापक थे। 16वीं सदी के आते-आते अहोमो ने एक विशाल राज्य की स्थापना की और वे धीरे-धीरे आग्नेय अस्त्रों और उच्चस्तरीय तोपों के निर्माण में माहिर हो गए।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 24, 2025, 05:15 pm IST
inभारत

छोलुंग सुकफा अहोम साम्राज्य के संस्थापक थे। 16वीं सदी के आते-आते अहोमो ने एक विशाल राज्य की स्थापना की और वे धीरे-धीरे आग्नेय अस्त्रों और उच्चस्तरीय तोपों के निर्माण में माहिर हो गए। लाचित बरफुकन का जन्म अहोम राज्य में 24 नवंबर 1622 को चेराई देव (चराइदेव, असम) में हुआ। मुगल बादशाह जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल के दौरान अहोम – मुगल युद्ध में असम के सेनापति सुकुति के वे सबसे छोटे पुत्र थे।

लाचित को जिम्मेदारी और समर्पण का भाव पिता से मिला। उन्होंने हिन्दू दंड नीतिके तहत जाना कि आपातकाल में कुलीन परिवारों के साथ-साथ न्यायधीश और पुजारी को भी शस्त्र उठाना पड़ता है। लाचित ने अपने जीवन की शुरुआत प्रधानमंत्री के निजी सचिव के रूप में की। बाद में घोरा -बरुआ या घोड़ो के अधीक्षक एवं डोलाकाशरिया बरुआ (अंगरक्षक -प्रमुख) के रूप में कार्य किया और फिर बरपुखान (बरफुकन) अर्थात सेनापति बने।

‘बरफुकन’ लाचित का नाम नहीं, बल्कि उनकी पदवी थी। जो अहोम सेना का एक पद था , एक देका दस सैनिकों का, बोरा बीस सैनिकों का, सेंकिया सौ सैनिकों का, हजारिका एक हजार सैनिकों का और राजखोवा तीन हजार सैनिकों का जत्था होता था। इस प्रकार बरपुखान(बरफुकन) छह हजार सैनिकों का संचालन करता था। लाचित इन सभी के प्रमुख थे।

औरगंजेब को भयभीत किया

लाचित बरफुकन ने औरंगजेब को भयभीत करके रखा था। गुप्तचरों ने औरंगजेब से कहा ‘हमने उसे आज तक नहीं देखा, परंतु बहुत से लोगों ने हमसे कहा कि उन्हें हेंगडैंग की सुनहरी चमक दिखी है।’ इस पर औरंगजेब ने लाल आंखे लिए क्रोध में पूछा कि अब ये हेंगडैंग क्या है? जवाब मिला- बादशाह ये एक तलवार यानी शमशीर का नाम है। लाचित यही शमशीर लेकर हमारी सेना पर मौत के फरिश्ते की तरह टूट पड़ता है।

बात सन् 1663 की है। अहोम राजा चक्रध्वज सिंह ने मुगलों के साथ हुई घीलाझरियाघाट की संधि की शर्तों को मानने से इंकार कर दिया। लाचित को सेना तैयार रखने को कहा। लाचित ने सर्वप्रथम गुवाहाटी नगर पर अधिकार किया। दिसंबर 1667 में औरंगजेब ने सेनापति रामसिंह को भेजा। लाचित ने गुवाहाटी नगर एवं आसपास के क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और चारों तरफ किलेबंदी कर सेना को नियुक्त कर दिया। औरंगजेब द्वारा भेजी गई सेना में करीब छह हजार सैनिक थे। बंगाल से 30,000 पैदल सैनिक, 18000 घुड़सवार और 15000 तीरंदाज अतिरिक्त प्राप्त हो गए। लाचित को पता था कि खुले युद्ध में मुगलों से जीत पाना कठिन है, क्योंकि उनके पास अच्छी घुड़सेना थी। लेकिन राजा चक्रध्वज सिंह ने आवेश में आकर मैदानी युद्ध का आदेश दे दिया। इस प्रकार 1669 के अलाबोई के इस मैदानी युद्ध में अहोम सेना की हार हुई और लाचित के दस हजार से ज्यादा सैनिकों को प्राणों की आहुति देनी पड़ी। दुर्भाग्य से 1670 में राजा चक्रध्वज सिंह का देहांत हो गया और उदयादित्य सिंह नए राजा बने।

मुगलों को अपनी योजना से दी मात

लाचित इस बात को जानते थे कि मुगल नौसेना की लड़ाई में कमजोर है और इस बात का उन्होंने फायदा उठाया। गुवाहाटी में अँधबारुली नमक त्रिकोणीय क्षेत्र की पहचान की जो निलांचल पहाड़ी और ईटाखुली पहाड़ी को जोड़ता था। इसके उत्तरी तट पर अश्वक्रान्ता पहाड़ी थी। इस स्थान को उन्होंने रणनीतिक रूप से सबसे बेहतर पाया और धीरे-धीरे औरंगजेब की सेना को उसी स्थान पर लाने की चाल चली। लाचित ने अपनी इस योजना को बड़ी सजगता से लागू किया।

सरायघाट का युद्ध

1671 में राम सिंह के नेतृत्व में औरंगजेब की सेना गुवाहाटी की ओर बढ़ी लेकिन सड़क मार्ग पर किलेबंदी होने के कारण उसे नदी मार्ग का सहारा लेना पड़ा। नदी मार्ग से मुग़ल सेना लाचित द्वारा निर्धारित अँधबारुली पहुंची। मुगलों की विशाल सेना देखकर अहोम सेना पीछे हटने लगी , ऐसे समय लाचित ने नाव पर सवार होकर अपने सैनिकों को ललकारा और मातृभूमि की रक्षा करने को कहा। उनका यह बोधवाक्य–लाचित जियाइ थका माने गुवाहाटी एरा नाही (अर्थात् जब तक लाचित जीवित है, उससे गुवाहटी कोई नहीं छीन सकता), उनकी निर्भीकता, वीरता और कुशल नेतृत्व क्षमता का परिचय देता है। घायल और अत्यंत अस्वस्थ लाचित ने अपने सैनिकों में जोश भरने के लिए कहा था, “जब मेरे देश पर आक्रमणकारियों का खतरा बना हुआ है, जब मेरे सैनिक उनसे लड़ते हुए अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं, तब मैं महज बीमार होने के कारण कैसे अपने शरीर को आराम देने की सोच सकता हूं।

अहोम सेना ने वापस लड़ने का निश्चय किया ।सरायघाट के युद्ध में शानदार रणनीति का प्रयोग किया युद्ध के दौरान ही बनाया गया नौका -पुल छोटे किले की तरह काम आया। अहोम की बच्छारिना (जो अपने आकार में मुगलों की नाव से छोटी थी) अत्यंत तीव्र और घातक सिद्ध हुई। इन सभी आधुनिक युक्तियों ने लाचित बरपुखान की अहोम सेना को मुगल सेना से अधिक सबल और प्रभावी बना दिया। दो दिशाओं से हुए प्रहार से मुगल सेना में हड़कंप मच गया और शाम तक उसके तीन अमीर और चार हजार सैनिक मारे गए।मुगलो को पराजित मानस नदी तक खदेड़ दिया।

तेज बुखार के बावजूद लड़ा युद्ध

स्वयं रामसिंह ने भी कहा ‘असमिया सैनिक नाव चलने , खाई खोदने और बन्दूक एवं तोप चलाने में माहिर थे, ऐसे प्रतिभावान लोग मैंने कहीं नहीं देखे।’ सरायघाट में तेज बुखार होने के बावजूद लाचित ने अहोम सेना को विजय दिलाई, लेकिन 1672 में जोरहाट के होलंगापार में उनकी मृत्यु हो गई।

शिलालेख में लिखी वीरता

गुवाहाटी में पाए गए एक पत्थर के स्तंभ पर संस्कृत में निम्नलिखित शिलालेख है, “बरबरुआ के पुत्र, नामजानी (निचले असम) के बोरफुकन ने मुसलमानों पर विजय प्राप्त करने के बाद 1667 में गौरव के साथ जीवन जिया, जो विभिन्न युद्ध हथियारों, हाथियों, घोड़ों और सेनापतियों से सुसज्जित थे। बरफुकन अपने पराक्रम में तेजोमय चमकता है; और हाथियों, घोड़ों और सैनिकों का सेनापति है। वह धैर्य, आत्म-सम्मान, वीरता और निर्णय की गहराई और गंभीरता के सर्वोच्च रूप का सागर या पात्र है।

महानायक के सम्मान में दिया जाता है स्वर्ण पदक

लाचित ने उत्तर-पूर्व भारत में वही स्वातंत्र्य-ज्वाला जलाई जो मुगल आक्रांताओं के विरुद्ध पश्चिम भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज ने, पंजाब में गुरु गोविंद सिंह और राजपूताना में महाराणा प्रताप ने जलाई थी। अब इस महानायक के सम्मान में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को लाचित बरफुकन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाता है। यह पहली बार 1999 में जनरल एपी मलिक द्वारा की गई घोषणा के बाद शुरू किया गया था, जिसमें कहा गया था कि यह पदक रक्षा कर्मियों को बरफुकन की वीरता और बलिदान का अनुकरण करने के लिए प्रेरित करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहोम साम्राज्य के सेनापति लाचित बरफुकन को भारत की “आत्मनिर्भर सेना का प्रतीक” कहा। उनकी 125 फीट प्रतिमा का गुवाहटी में अनावरण भी प्रधानमंत्री मोदी ने किया।

Topics: अहोम साम्राज्यअहोम सेनापतिकौन थे लचित बरफुकनलचित बरफुकन की शौर्य गाथामुगलों से युद्धलाचित बरफुकनऔरंगजेबपाञ्चजन्य विशेष
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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