गुरु तेग बहादुर की रचनाएं सरल, सशक्त और प्रभावशाली हैं, जो सीधे पाठक के हृदय से जुड़ती हैं। उन्होंने पांचवें गुरु अर्जनदेव द्वारा संकलित ‘आदिग्रंथ’ का संपादन कर उसे पूरा किया। गुरु तेग बहादुर की रचनाएं मानवता और आत्मिक उच्चता का संदेश देती हैं, जिनमें ‘माया’ से उबरकर ‘नाम’ से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है। उनकी वाणी में संसार की मायावी प्रवृत्तियों— लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार- को ‘माया’ कहा गया है, जबकि परमात्मा से जुड़ने और सांसारिक बंधनों से मुक्त होने की भावना को ‘नाम’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वे व्याप्त मानवीय संकटों के बारे में समझाते हैं कि संसार की सुख-सुविधाओं और संबंधों का दास बनने से व्यक्ति संकुचित एवं अधूरा हो जाता है। उनकी रचनाओं में यह संदेश निहित है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर ईश्वर के नाम से जुड़कर आत्मिक शांति और पूर्णता प्राप्त करना है। उनकी वाणी में त्याग, साहस, धैर्य और सेवा जैसे गुणों का विशेष स्थान है, जो आज भी मानव जीवन के प्रेरणा स्रोत हैं।
गुरु महाराज का साहित्य जीवन को सार्थक बनाने और आत्मिक शांति प्राप्त करने का एक प्रबल माध्यम है। उनके काल में समाज अपने वृहत्तर जीवन-आदर्शों के भूलकर कंचन और कामिनी की अराधना में ही डूबा हुआ था। व्यक्ति की ऐसी मानसिकता को चित्रित करते हुए उन्होंने कहा-
कहउ कहा अपनी अधमाई।
उरझिओ कनक कामिनी के रस नह कीरति प्रेम गाई।
जग झूठे कउ साचु जानि कै ता सिउ रुच उपजाई।।
दीन बंध सिमरिओ नहीं कबहूं होतु जु संगि सहाई।
मगन रहिओ माइआ मै निस दिनि छुटी न मन की काई॥
कहि नानक अब नाहि अनत गति बिनु हरि की सरनाई।।
गुरु महाराज अपनी रचनाओं में माया के प्रपंच और उससे मुक्ति का प्रमाण देते हैं। वे बताते हैं कि माया के प्रपंच में फंसा हुआ व्यक्ति सोचता है कि ‘मैं अपनी अधमता का वर्णन किस तरह करूं। मैं सोने और स्त्री में ही उलझकर रह गया हूं, संसार की झूठी चीजों को ही सच मान बैठा हूं, इसलिए उन्हीं में रुचि रही है। चूंकि रात-दिन माया में ही मग्न रहता हूं, इसलिए मन-अज्ञान की काई दूर नहीं होती। मुझे चाहिए क्या? दीनबंधु का स्मरण करूं। बिना उसकी शरण में गए मेरी गति नहीं है।’
गुरु महाराज हमें अपने मोह-बंधन से ऊपर उठकर ईश्वर-नाम के व्यापक धरातल पर पहुंचने की प्रेरणा देते हैं। उनका कहना है कि असली ईश्वर बाहर नहीं, हमारे भीतर है, जैसे पुष्प में सुगंध और दर्पण में छाया होती है। इसलिए पहले अपने आप को पहचानना आवश्यक है, क्योंकि अपने आप को बिना पहचाने भ्रम दूर नहीं हो सकता। यह शिक्षा उनकी सभी रचनाओं का सार है जो मनुष्य को आंतरिक आत्म-बोध और मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है।
उन्होंने जिस ईश्वर के गुणों की ओर संकेत किया है, वे हैं सहनशीलता, दया, क्षमा, और विनम्रता। वे कहते थे कि एक सज्जन व्यक्ति वह होता है, जो जाने या अनजाने में किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाता। उनका मानना था कि वैसे भी छोटे-छोटे कार्यों से ही महान कार्य बनते हैं तथा हार और जीत आपकी सोच पर निर्भर करती है। उनके अनुसार, वह ईश्वर जो हमसे जुड़ा है, वह हमारे अंदर है और हमें उसे पहचान कर, अपने मन में दया, प्रेम और करुणा का भाव पालना चाहिए।
पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ।
कहु नानक तिह जानिए सदा बसतु तुम साथ।
अर्थात् ईश्वर पतितों का उद्धारक है, भय का नाश करने वाला और अनाथों का नाथ है। वह सदा हमारे साथ रहता है।
उस समय मुगल शासक हिंदुओं का जबरन कन्वर्जन कर रहे थे। लोग डरे-सहमे और स्वयं को अनाथ महसूस कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने कहा, ईश्वर का स्मरण भय मुक्त करता है। गुरु नानक ने ‘जपुजी’ में ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुण को ‘निरभउ’ (निर्भय) बताया था। इसलिए उसका साथ किभी भी व्यक्ति को निर्भय बनाता है। गुरु महाराज ने कहा-

भै नासन दुरमति हरन कलि मैं हरि को नाम।
निस दिन जो नानक भजै सफल होहि तिह काम।।
अर्थात् कलियुग में हरि का नाम भय का नाश करता है, दुरमति को नष्ट करता है। जो इसे याद रखता है, उसके सभी काम सफल हो जाते हैं। साथ ही, वह कहते हैं-
मद माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै।
करि परपंचु जगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ।।
अर्थात् जो व्यक्ति माया के मोह में अंधा होकर पागल हो गया है, वह परमात्मा की स्तुति नहीं करता। ऐसा व्यक्ति केवल छल-कपट करके दुनिया को धोखा देता है और अपने स्वार्थ के लिए अनैतिक कार्य करता है। अपनी रचनाओं में गुरु महाराज उस समाज की आलोचना करते हैं, जहां व्यक्ति अपनी सुख-साधना में लिप्त होकर उच्चतर दायित्वों को भूल चुका था। वे बताते हैं कि माया के जाल में फंसा मन वेद-पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथ तो सुनता था, पर जीवन में उनका पालन नहीं करता। यानी

वेद-पुरान साध मग सुनि करि।
निमष न हरि गुन गावै।।
दुरलभ देह पाई मानस की बिरथा जनमु सिरावै।।
वे अपने शिष्य को चेतावनी देते हैं कि ऐसे मनुष्य दुर्लभ मानवजाति के लिए प्राप्त दुर्लभता की तरह होते हैं, जो अपने सत्य मार्ग से भटक गए हैं। वे समाज में व्याप्त अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और धार्मिक कुप्रथाओं की भी कटु आलोचना करते हैं। उनके अनुसार, सत्य की ओर लौटने के लिए मनुष्य को अपनी माया से मुक्त होकर सच्चे ईश्वर के साथ आत्मीयता स्थापित करनी चाहिए। उनका संदेश आज भी समानता, न्याय और आध्यात्मिक जागृति का आधार है।
गुरु तेग बहादुर ने संसार की नश्वरता पर विशेष बल दिया। उनका उद्देश्य यह समझाना था कि उच्च आदर्शों के बिना सांसारिक सुख-भोग व्यर्थ है। उन्होंने सत्ता के अहंकार में डूबे शासकों को याद दिलाया कि राम और रावण जैसे शक्तिशाली भी इस संसार में नहीं रहे। यह संसार और इसकी उपलब्धियां स्वप्नवत अस्थिर हैं और पृथ्वी का राज रेत की दीवार के समान है। अतः अभिमान निरर्थक है। दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो सांसारिक मोह और लालसाओं में इतने डूबे हैं कि जीवन बचाने और इच्छाएं प्राप्त करने के लिए अपमान सहते हैं, अपना स्वाभिमान भूल जाते हैं। ऐसे लोगों में आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान जगाने के लिए उन्हें छोटे मोहों से मुक्त करके यह समझाना आवश्यक है कि यह भौतिक शरीर मिथ्या है, जबकि आत्मा ही वास्तविक सत्य है। सिख गुरु संसार त्यागने का उपदेश नहीं देते। वे सांसारिक दायित्वों का पालन करते हुए जीवन जीने का आग्रह करते हैं। उनके अनुसार, संसार मिथ्या तब होता है, जब व्यक्ति माया में लिप्त होकर अपने व्यापक कर्तव्यों को भूल जाता है। उनके पितामह गुरु अर्जन देव ने उद्यम करने, धन कमाने और ईश्वर से जुड़ने का संदेश दिया, जिसमें कर्मठता और अध्यात्म का समन्वय है।
गुरु तेग बहादुर का उद्देश्य व्यक्ति को उस मानसिक स्तर पर लाना था, जहां वह अपने लक्ष्य के लिए निःसंकोच सर्वोच्च बलिदान कर सके और हंसते हुए मृत्यु का भी वरण कर सके। यह स्थिति तब आती है जब व्यक्ति दुख-सुख, भय, लोभ, मोह, मान-अपमान और क्रोध जैसे सांसारिक द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है, सोने को मिट्टी के समान मानता है और उसके हृदय में माया की जगह ब्रह्म का वास होता है। ऐसा साधक मृत्यु से नहीं डरता, क्योंकि वह जानता है कि यह अटल है। गुरु तेग बहादुर जीवन की क्षणभंगुरता को स्वीकार करते हुए लोगों को सत्य और उच्च आदर्शों की ओर उन्मुख होने का आह्वान करते थे। वे बार-बार ईश्वरीय शक्ति, जो व्यक्ति के अपने अंदर की ही शक्ति है, पर भरोसा रखने, उसे उत्पन्न करने का आग्रह करते थे। जीवन में एक स्थिति ऐसी आती है, जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका बल छूट गया है, उस पर अनेक बंधन पड़ गए हैं और उसके सम्मुख कोई उपाय नहीं रह गया है। अपने एक दोहे में वे इसी तरह की मनःस्थिति को उभारते हैं-
बलु छुटकिउ बंधन परें कछु न होत उपाइ।
कहु नानक अब ओट हरि गजि जिउ होहु सहाइ।।
फिर इस मनःस्थिति का समाधान करते हुए कहते हैं-
बल होआ बंधन छुटे सम किछु होत उपाइ।
नानक सब किछु तुमरै हाथ मै तुम ही होत सहाइ।।
एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब व्यक्ति को सभी संगी-साथी बेसहारा छोड़कर चले जाते हैं-
संग सखा सभ तजि गए कोऊ न निबहिओ साथ।
कहु नानक इह बिपत मै टेक एक रघुनाथ।।
ऐसी स्थिति में वे साधक को आश्वासन देते हुए कहते हैं-
नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंद।
कहु नानक इह जगत में किन जपिओ गुरमंत।।
गुरु महाराज का उपदेश था कि निर्भय पद प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग मन में ‘माया’ के स्थान पर ‘राम नाम’ को धारण करना है, जिससे संकट मिटते हैं और ईश्वर का दर्शन होता है। ऐसा निर्भय साधक न किसी को भयभीत करता है और न स्वयं भयभीत होता है। इस प्रकार, गुरु तेग बहादुर के जीवन आदर्शों ने समाज को सामाजिकता और ईश्वरीय सत्ता का समन्वय सिखाकर नई दिशा दी।
(स्रोत : डॉ. महीप सिंह की पुस्तक ‘लोकप्रिय संत भक्त कवि गुरु तेग बहादुर’)

















