चंडीगढ़ और संविधान का 131वां संशोधन : बिना जानकारी के कुछ भी बोल रहे पंजाब के नेता, जानिए चंडीगढ़ का पूरा सच
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चंडीगढ़ और संविधान का 131वां संशोधन : बिना जानकारी के कुछ भी बोल रहे पंजाब के नेता, जानिए चंडीगढ़ का पूरा सच

चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के तहत लाने की चर्चा पर पंजाब की सियासत गरमा गई है। केंद्र ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव सिर्फ विचाराधीन है और पंजाब-हरियाणा के अधिकारों में कोई बदलाव नहीं होगा।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Shivam Dixit
Nov 23, 2025, 10:30 pm IST
inभारत, पंजाब, हरियाणा

पंजाब-हरियाणा की संयुक्त राजधानी केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के तहत लाने के मुद्दे पर पंजाब के नेता विशेषकर आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के नेता जिस तरह की ब्यानबाजी कर रहे हैं उससे स्पष्ट है वे बिना जानकारी के ब्यानबाजी कर रहे हैं।

फिलहाल इस मुद्दे पर केंद्र सरकार द्वारा चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत लाने पर विचार करने की अफवाहों पर पंजाब में बढ़ते राजनीतिक विरोध के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया। पीआईबी द्वारा गृह मंत्रालय की ओर से ‘एक्स’ पर साझा की गई एक आधिकारिक पोस्ट में, सरकार ने कहा कि चंडीगढ़ के लिए केंद्रीय कानून बनाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव केवल विचाराधीन है और इस पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य चंडीगढ़ की वर्तमान शासन व्यवस्था को बदलना या पंजाब अथवा हरियाणा के साथ उसके पारंपरिक संबंधों को प्रभावित करना नहीं है। बयान में कहा गया, यह प्रस्ताव विशेष रूप से केंद्र सरकार द्वारा केंद्र शासित प्रदेश के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया को सुगम बनाने के संबंध में है और यह अभी भी केंद्र सरकार के उच्च स्तर पर विचाराधीन है।

पहले के एक संसदीय बुलेटिन के अनुसार, इस प्रस्ताव में चंडीगढ़ को विधानसभा रहित अन्य केंद्र शासित प्रदेशों जैसे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, और पुडुचेरी (उस समय जब इसकी विधानसभा भंग हो) के समान श्रेणी में लाने की मांग की गई थी। इस कदम से पूरे पंजाब में कड़ा विरोध हुआ, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार पर चंडीगढ़ पर पंजाब के लंबे समय से चले आ रहे दावे को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया।

ज्ञात रहे कि 1966 में जब भाषा के आधार पर पंजाब का विभाजन हुआ और हरियाणा आस्तित्व में आया तब चंडीगढ़ को पंजाब व हरियाणा दोनों की संयुक्त राजधानी के रूप में कार्य करने के लिए अस्थाई रूप से केेंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। सामान्यता केंद्र प्रशासित प्रदेश में केंद्र द्वारा उपराज्यपाल की नियुक्ति होती है, लेकिन चंडीगढ़ को धारा-240 के दायरें में लाया गया, जिसमें चंडीगढ़ को स्वतंत्र प्रशासक तो मिलेगा लेकिन उपराज्यपाल का दर्जा मिले यह सुनिश्चित नहीं था।  अब चर्चा यह है कि चंडीगढ़ को पंजाब राज्यपाल के दायरे से बाहर लाने के लिए केंद्र सरकार 1 दिसंबर को संसद के शुरू होने वाली शीतकालीन सत्र में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक लाने जा रही है। इसके तहत चंडीगढ़ का अलग प्रशासक नियुक्त किया जा सकेगा।

फिलहाल पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ के प्रशासक होते हैं। अब यहां अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तरह स्वतंत्र प्रशासक एलजी स्तर का नियुक्त किया जा सकता है। इस विधेयक का मकसद चंडीगढ़ को अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा नगर हवेली और दमन व दीव और पुडुचेरी (जब वहां की विधानसभा भंग या निलंबित हो) जैसे बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों की तरह संविधान के अनुच्छेद 240 के दायरे में लाना है।

संसद में पेश होने वाले इस संशोधन विधेयक के बाद पंजाब में सियासी हंगामा शुरू हो गया। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी समेत कांग्रेस व शिअद के नेताओं ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। पंजाब के सीएम भगवंत मान ने भी इस पर कड़ा विरोध जताया है। इस संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे नेताओं का कहना है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद चंडीगढ़ पर पंजाब का प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण खत्म हो जाएगा।

नेताओं का आरोप है कि ऐसा कर चंडीगढ़ को हरियाणा को सौंपने के लिए रास्ता बनाया जा रहा है। अभी यूटी चंडीगढ़ में कर्मचारी अनुपात हरियाणा का 40 प्रतिशत जबकि पंजाब का 60 प्रतिशत है। दोनों राज्यों से ये कर्मचारी व अधिकारी यूटी में डेपुटेशन पर भेजे जाते हैं। इन नेताओं का कहना है कि चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के दायरे में लाने से पंजाब की शक्तियां कम हो जाएंगी।

बता दें कि पंजाब रिऑर्गेनाइजेशन एक्ट 1966 के तहत हरियाणा और पंजाब की संयुक्त राजधानी घोषित किया गया था और चंडीगढ़ को प्रशासित करने के लिए केंद्र के अधीन किया गया था। भारत के संविधान के अनुच्छेद 239 के तहत सभी यूनियन टेरिटरी की तरह चंडीगढ़ का अंतिम अधिकार भारत के राष्ट्रपति के पास ही है।

राष्ट्रपति एक प्रशासक के माध्यम से कार्य करते हैं जिनको इस पद के लिए चंडीगढ़ में नियुक्त किया जाता है। 1 जून, 1984 से पंजाब के गवर्नर ही चंडीगढ़ के प्रशासक के तौर पर कार्य करते हैं। प्रस्तावित संविधान संशोधन से चंडीगढ़ में केंद्र का सीधे तौर पर दखल होगा। उन अधिकारों को हासिल करने के बाद केंद्र सरकार किस तरह के आदेश जारी करती है, उसके अनुसार ही आने वाले समय में चंडीगढ़ में पंजाब की भूमिका का नए सिरे से निर्धारण होगा।

वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया यह फैसला राजनीतिक विवाद का कारण तो बन गया है। पंजाब की सियासत तेज हो गई है, लेकिन चंडीगढ़ के चुने वर्तनाम व पूर्व किसी भी सांसद की 131वें संशोधन विधेयक को लेकर चुप्पी दर्शाती है कि चंडीगढ़ वासियों की भलाई और चंडीगढ़ का विकास इसी 131वें संशोधन में दिखाई दे रहा है।

फिलहाल केंद्र सरकार ने स्पष्टीकरण जारी करके कह दिया है कि न केवल इस संघोधन को लेकर फैलाई जा रही अफवाहें तथ्यों से परे है बल्कि अभी यह मुद्दे केवल विचाराधीन है, इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

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