आज के इस अवसर पर पाञ्चजन्य की अद्वितीय परंपरा की बात करना आवश्यक है। इसका उद्भव भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ा है। लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व, द्वारका के समीप असुर जन्मेजय का अंत करके महाराज रेवत द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को दो अमूल्य वस्तुएं प्रदान की गईं, एक सुदर्शन चक्र, और दूसरा, दिव्य पाञ्चजन्य शंख। नगर, राज्य और देश की रक्षा में भगवान श्रीकृष्ण ने ये दोनों जीवनपर्यंत अपने पास रखे। यदि दाएं हाथ में सुदर्शन चक्र और बाएं में पाञ्चजन्य रहे, तो भगवान का विराट व्यक्तित्व और उनकी धर्मनिष्ठ भंगिमा प्रतिपादित होती है। पाञ्चजन्य केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि उस पांच हजार पुरानी परंपरा का जीता-जागता प्रतीक है। इसका उद्देश्य धर्म का उद्घोष, सामाजिक चेतना का विस्तार, सत्य-संवाद की पूर्ति और राष्ट्र-निर्माण के उदात्त संकल्प का संवहन है।
जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध करके अपना विराट स्वरूप प्रकट किया था, तब समाज की चेतना और मार्गदर्शन को पाञ्चजन्य द्वारा ही उद्घोषित किया गया था। आज इसी परंपरा को जीवंत रखते हुए ‘पाञ्चजन्य’ ने वैचारिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ी है। पाञ्चजन्य की भूमिका समय, सत्ता, परिस्थिति कोई भी हो, सदा धर्म के मार्ग पर अडिग रही है। विचार, निष्ठा और समाज हित की उत्कृष्टता के साथ इसने देश में ऐसी छवि बनाई है कि पत्रकारिता के तमाम आकर्षक जालों में भी विचारधारा की अमरता बनी रहे। डिजिटल युग में भी पाञ्चजन्य की पहचान और उसका स्वरूप नित्य नूतन और अभिनव बना हुआ है। यह सच है, व्यवस्था बदलती है, सरकारें आती-जाती हैं, किंतु पाञ्चजन्य अपनी भूमिका में बदलाव नहीं लाता।
शासन और समाज का संतुलन
आज जब शासन, सत्ता और उसके आधार पर स्थापित व्यवस्थाओं के दायरे भी निर्धारित हैं, ऐसे समय में योग्य मार्ग निकालना अनिवार्य है। यह आसान नहीं, लेकिन पाञ्चजन्य को न केवल विचारों के बल पर बल्कि अपनी व्यवस्थाओं की मजबूती पर विश्वास है। जब मध्य प्रदेश का नाम आता है, तो गर्व से कहा जा सकता है कि कार्यकर्ता के दृष्टिकोण से अपनी सत्ता का उद्देश्य केवल सत्ता चलाना नहीं है, बल्कि सत्ता के द्वारा समाज-जन की व्यवस्था, सुख-साधन, विकास और न्याय का संवहन है।
हमारी सरकार ने प्राकृतिक संपदाओं का न्यायपूर्ण वितरण किया है। जल, जंगल, ज़मीन पर भगवान की दी गई संपदा का बंटवारा हम सदा भाईचारे और परस्पर सहयोग की भावना से करते हैं। बीते दो दशकों से राजस्थान के साथ कई योजनाओं-पर्वती, कालीसन, चंबल जल योजनाओं के बंटवारे को लेकर कई सारे विवाद रहे, लेकिन हमने यह समझा कि राजस्थान में जल की आवश्यकता अधिक है, और हमारे मध्य प्रदेश में 250 से अधिक नदियां बहती हैं। यह प्रदेश नदियों का मायका कहलाता है। तो फिर यदि थोड़ा अधिक जल राजस्थान को दे दिया जाए तो दिक्कत क्या है? हमने यह समझा और ऐसा किया भी। यह भाईचारे का विस्तार है।
हमारे इन विचारों को मान्यता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दी। उनका आशीर्वाद इस नीति को प्रामाणिकता, ऊर्जा और व्यापकता देता है। जब राष्ट्रीय मंच से इस प्रकार की सोच की तारीफ होती है, तो यह संदेश पूरे देश को जाता है कि दलीय राजनीति में भी राज्य-राज्य में वैमनस्य नहीं, वरन् परस्पर भाईचारा और सौहार्द सराहना चाहिए। यही तो केन-बेतवा, ताप्ती मैया, मंदाकिनी जैसी योजनाओं का आधार बना। चित्रकूट, नर्मदा, सोन, तवा-ये जल योजनाएं केवल परियोजनाएं नहीं, यह साझा संकल्प, साझी विरासत का पुनरुत्थान है।
संस्कृति और शिक्षा में नवाचार
हमने सत्ता और शासन के दायरे में संस्कृति के विचार को भी सींचा है। जैसे, विश्वविद्यालयों में ‘वाइस चांसलर’ की जगह अब ‘कुलगुरु’ कहा जाता है। नाम का यह बदलाव केवल भाषाई नवाचार नहीं, इसने उच्च शिक्षा में गुरु-शिष्य परंपरा की पुनर्स्थापना की है। यह गरिमा केवल शब्दों में नहीं, अनुभूति में भी है। क्या हम गुरु पूर्णिमा का उत्सव स्कूलों तक सीमित रखें, या उच्च शिक्षा में भी मनाएं, इस पर भी हमने पहल की। सारे पर्व, रक्षाबंधन, गुरु पूर्णिमा, मकर संक्रांति, गीता जयंती, यह सब सरकार के कैलेंडर का हिस्सा बने। गीता जयंती की बात करें तो हमने सम्पूर्ण प्रदेश में गीता भवन के निर्माण हेतु स्थानीय समूहों की भागीदारी सुनिश्चित की। भगवान श्रीकृष्ण का सांदीपनी आश्रम में आगमन और वहां की 64 कलाएं, 14 विद्याएं, सारे वेद-विद्यार्थी जीवन के आदर्श और शिक्षा की महत्ता का संदेश देते हैं। यही शिक्षा, यही संस्कृति आज प्रदेश की सरकारी योजनाओं का आधार है।
ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार करते हुए प्रदेश सरकार ने 32 लाख किसानों के लिए सौर पंप योजना शुरू की। नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से किसानों को आत्मनिर्भर बनाया गया है। अब वे बिजली विभाग पर निर्भर नहीं, अपने लिए ऊर्जा स्वयं पैदा कर सकते हैं। 18,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी इसी भाव के साथ राज्य के बजट में निर्धारित की गई है। देश का नया विकास मॉडल मध्य प्रदेश में ऊर्जा आत्मनिर्भरता से प्रेरित है।

रोजगार और उद्योग
रोजगार उन्मुख विकास नीति बनाई गई, कृषि, उद्योग, एमएसएमई, लघु कुटीर उद्योग, रेडीमेड वस्त्रों तक। नारी सशक्तिकरण के तहत महिलाओं को घर-घर उत्पादन में जोड़ने की व्यवस्था की गई, ताकि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र बन सकें। पहले योजना थी कि हर बहन को 1,000–3,000 रुपए मिलें, पर अब सरकार ने लक्ष्य रखा कि प्रति बहन 5,000 रुपए तक मासिक सहायता मिले, ताकि उनकी आय 10–20 हजार तक पहुंच सके। कपास, धागा, वस्त्र प्रदेश में बनता है, तो रेडीमेड वस्त्र उद्योग भी यहीं क्यों न लगे?
रोजगार आधारित उद्योग होगा, तो सरकार सब्सिडी देगी, कर्मचारियों की आय बढ़ेगी। मशीन आधारित काम तो सारी दुनिया में है, पर हम मानव संसाधन आधारित उत्पादन को प्रोत्साहित करते हैं। यह शासन पद्धति यूरोप से हटकर भारतीय मूल्यों पर आधारित है। हमने दलहन, तुवर दाल पर टैक्स कम किया गया, महाराष्ट्र से आने वाली अरहर दाल पर स्थानीय इकाइयों की बंदी रोकने के लिए टैक्स नीति संशोधित हुई। पोषण और स्वास्थ्य के लिए दलहन प्रोत्साहित किया गया।
भावांतर स्कीम का नवाचार भी मध्य प्रदेश में पहले हुआ अब पूरे देश में अपनाया गया। इससे किसान को एमएसपी पर उत्पाद बेचने की मजबूरी नहीं रही, मॉडल रेट पर भी अपनी उपज बेच सकता है। सोयाबीन के लिए लगभग 13–20 रुपए प्रतिकिलो किसानों को अतिरिक्त दिए गए। यदि सारा माल एमएसपी पर खरीदते, तो 2,000 करोड़ का भाड़ा देना पड़ता, लेकिन अब वह बजट बचकर विकास पर खर्च हो रहा है। सरकार की भावना है कि जनता के कल्याण के लिए एक-एक रुपया बचाना और विकास पर लगाना। भारत सरकार ने इस योजना को केस स्टडी मानकर पांच राज्यों से अधिकारी अध्ययन के लिए भेजे।

डाॅ. मोहन यादव को सम्मानित करते हुए पाञ्चजन्य के सम्पादक हितेश शंकर। (बाएं से) रा.स्व.संघ के मध्य क्षेत्र के सहकार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध एवं मध्य भारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडे
निवेश और आधुनिक योजनाएं
निवेश संवर्धन में भी प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। पहले ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट केवल इंदौर तक सीमित थी, अब राजधानी भोपाल सहित प्रदेश के छोटे-छोटे संभाग तक इसका विस्तार हुआ। प्रधानमंत्री जी की उपस्थिति में 30 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव हुए। आज 8 लाख करोड़ के वास्तविक निवेश धरातल पर उतार दिए गए। भूमि पूजन और लोकार्पण कर लगभग 6 लाख करोड़ की परियोजनाओं पर कार्य चालू हुआ। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से आग्रह किया जा रहा है कि एक साथ दो-ढाई लाख करोड़ के भूमि पूजन कार्यक्रम आयोजित करें। राज्य की निवेश वृद्धि दर 24 प्रतिशत है, और लक्ष्य है अगले पांच वर्षों में बजट को दोगुना करना।
हर विभाग को नवाचार और परिणाम आधारित लक्ष्य दिए गए हैं। सबसे बड़ा नवाचार मेडिकल कॉलेज मॉडल है, अब मेडिकल कॉलेजों में खुद के अस्पताल बनाने की जरूरत नहीं, राज्य के चल रहे अस्पताल निजी मेडिकल कॉलेजों के साथ पीपीपी मॉडल में जोड़ दिए गए। इससे भवन निर्माण, डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, मरीज को तत्काल मिल जाता है। बैतूल, धार, छिंदवाड़ा, शिवपुरी आदि जिलों में यह प्रयोग सफल रहा है। चिकित्सा, कृषि, बीएससी एग्रीकल्चर अब हर विश्वविद्यालय में शुरू किया गया है।
कपास आधारित उद्योग की बात आए तो हमारे प्रदेश में आदिवासी अंचल के 13 जिलों के बेहतरीन कपास पैदा होता है।कांग्रेस ने यहां हमारे जितने कॉटन आधारित बड़ी-बड़ी मील थीं, सारी बंद कर दी। अब हमारा कपास तमिलनाडु जा रहा है। तमिलनाडु में धागा बन रहा है। धागे से कपड़ा बन रहा है। कपड़े से रेडीमेड गारमेंट्स के लिए और घर-घर बड़े पैमाने पर काम हो रहा है, लेकिन हमारा कपास हमारे यहां कोई काम का नहीं। हमने इसे बदलने की सोची। पूरे देश में सात पीएम मित्र पार्क बनाए जाने हैं। इस योजना की घोषणा सात वर्ष पहले की गई थी, इसी वर्ष मोदी ने धार के पास पहले ‘पीएम मित्र पार्क का भूमि पूजन किया। यह पार्क धार जिले के भैंसोल गांव में पीएम मित्र योजना के अंतर्गत स्थापित किया जा रहा है। इसमें स्थापित वस्त्र निर्माण केंद्र विश्वस्तरीय सुविधाओं से सुसज्जित होंगे। इससे स्थानीय कपास उत्पादकों को अधिक लाभ मिलेगा इससे लगभग 3 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा।
शहरीकरण में भोपाल, उज्जैन, इंदौर, देवास जैसे शहरों का मास्टर प्लान विकसित किया गया है। शहरी व्यवस्थाओं में नगर निगम, टाउनशिप मॉडल, सड़क विस्तार, आवासीय-व्यावसायिक वर्गीकरण की लंबी अवधि की योजनाएं चलाई गई हैं। एकांत क्षेत्र में आवासीय, व्यावसायिक, औद्योगिक प्लॉट का संस्थान तैयार किया गया। भोपाल, उज्जैन, इंदौर, देवास, धार समेत कई स्थान यह विकास योजनाओं के केंद्र बने हैं। भोपाल का बड़ा तालाब आज डल झील की तर्ज पर पर्यटन स्थल बनाया जा रहा है-शिकारे चलाने, सांस्कृतिक कार्यक्रम, आयोजनों का स्थल। राजधानी अब केवल भौतिक नहीं, सांस्कृतिक पहचान के साथ जुड़ी जाएगी। राजधानी के मुख्य प्रवेश द्वार सात बनाए जाएंगे, राजा भोज, विक्रमादित्य, भगवान कृष्ण, भगवान राम, चित्रकूट, प्रत्येक का अलग-अलग द्वार होगा, जो सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनेगा।
वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण संतुलन, नर्मदा के किनारे मगरमच्छ पुनर्वास ममता का प्रतीक बना है। चीता परियोजना, टाइगर रिजर्व, ओंकारेश्वर सेंचुरी, यह सब देश की पर्यावरण नीति में उदाहरण बन रहे हैं। सामाजिक डर, भय और संशय को निडरता और निर्भीकता में बदलना हमारी व्यवस्था की पहचान है।
पाञ्चजन्य केवल पत्रिका नहीं, बल्कि एक प्रचंड वैचारिक आंदोलन है। यह धर्मनिष्ठ, विचारगर्भित, राष्ट्रभक्ति की पावन भूमि है। मैं सम्पूर्ण पाञ्चजन्य परिवार को हार्दिक बधाई देता हूं, जो इस विराट विरासत को आज भी जीवंत रखे हुए हैं। मेरा विश्वास है कि यह शंखनाद निरंतर चलता रहेगा, समाज में सत्य, धर्म, चेतना और कर्तव्य की परंपरा स्थापित करता रहेगा।

















