भारतीय क्रिकेट टीम से जुड़ा संकट, जो चर्चा का केंद्र रहा है, कम होने का कोई संकेत नहीं दे रहा है। गर्दन की चोट से जूझ रहे भारतीय कप्तान शुभमन गिल शनिवार से गुवाहाटी में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ शुरू हो रहे दूसरे टेस्ट मैच में नहीं खेल पाएंगे। बल्लेबाजों के खराब प्रदर्शन और टीम के रणनीतिकारों के अजीब फैसलों के कारण भारतीय टीम गंभीर संकट में फंसती दिख रही है। हालांकि शुभमन की कमी को पूरा करने में साई सुदर्शन, देवदत्त पडिकल और नीतिश रेड्डी जैसे जुझारू बल्लेबाज काफी हद तक सक्षम हैं। लेकिन भारतीय चयनकर्ता, प्रशिक्षक और टीम प्रबंधन की रणनीति और उनके बीच तालमेल के अभाव ने भारतीय क्रिकेट को संकट की स्थिति में डाल दिया है।
विशेषकर टेस्ट मुकाबलों में कुछ हद तक टीम के प्रशिक्षक गौतम गंभीर की आक्रामक रणनीति, तो काफी हद तक भारतीय खिलाड़ियों का बिखरा-बिखरा सा प्रदर्शन टीम को एक कदम आगे और दो कदम पीछे चला रहा है। गौतम गंभीर के प्रशिक्षक बनने के बाद आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि सफेद गेंदों से खेले जाने वाले सीमित ओवरों के मुकाबलों में तो भारतीय टीम का प्रदर्शन शानदार रहा है। लेकिन टेस्ट मैचों में टर्निंग विकेट पर खेलने की रणनीति (या जिद) बल्लेबाजों के लिए घातक साबित हुई है। इस स्थिति में एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों भारतीय टीम अपने घरेलू मैदानों पर विदेशी टीमों के आगे धराशायी होती जा रही है ?
म्यूजिकल चेयर का खेल चरम पर
एक समय भारतीय टीम घरेलू विकेट पर मजबूत बल्लेबाजी क्रम के लिए जानी जाती थी। टीम का सबसे मजबूत पक्ष बल्लेबाजी होती थी। बल्लेबाजी के अलावा स्पिनरों का दबदबा लंबे समय तक चला। भारत को घरेलू विकेटों पर हराना आसान नहीं होता था। लेकिन अब बदतर होते विकेटों पर न तो बल्लेबाज चल पा रहे हैं और न ही स्पिनर कारगर साबित हो पा रहे हैं। पिछले दिनों इडेन गार्डन पर खेले गए पहले टेस्ट मैच में दक्षिण अफ्रीका ने जिस तरह से तीन दिनों के अंदर भारत को मात दी, उससे भारतीय विकेट के गिरते स्तर पर तमाम सवाल उठने लगे हैं। जसप्रीत बुमराह, कुलदीप यादव, मोहम्मद सिराज, रविन्द्र जडेजा और अक्षर पटेल ने अपनी प्रतिभा के दम पर गेंदबाजी की कमान बखूबी संभाली है। लेकिन भारतीय बल्लेबाजों ने लगातार निराशाजनक प्रदर्श किया है जिसके कारण टीम को घरेलू मैदानों पर लगातार पिछले चार टेस्ट मैचों में हार का सामना करना पड़ा है। टीम को इस स्थिति में लाने के लिए टीम प्रबंधन काफी हद तक जिम्मेदार है, क्योंकि अब इसका अंदाजा लगा पाना बेहद मुश्किल है कि अंतिम एकादश में किस बल्लेबाज को शामिल कर लिया जाएगा और किसे बाहर। यही नहीं, बल्लेबाजी क्रम में भी इतना बदलाव कर दिया जाता है कि मैदान पर सभी हतप्रभ रह जाते हैं। नतीजतन, टीम देश हो या विदेश, हर जगह बिखरी-बिखरी सी नजर आती है।
भारतीय टीम की ताकत पर प्रहार
पहले भारतीय टीम अपनी दमदार बल्लेबाजी और स्पिनरों के बल पर ‘घर का शेर ’ मानी जाती थी, लेकिन तेज व उछाल लेते विदेशी विकेटों पर उनकी एक न चलती थी। लेकिन कोई दो-ढाई दशक पहले सौरव गांगुली के नेतृत्व में भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और न्यूजीलैंड को उसकी धरती पर सीम व स्विंग लेते विकेटों पर हराने की परंपरा की शुरुआत की। भारतीय क्रिकेटप्रेमी सीना चौड़ा करके दावा करते थे कि शीर्षस्थ टीमों को हमने उनके ही घर में उनके ही हथियारों (तेज गेंदबाजी व आक्रामक क्रिकेट) से मारा। अब वही कहानी भारतीय टीम के साथ दोहरायी जा रही है। भारत के टर्निंग (खराब) विकेट पर विदेशी स्पिनर भारतीय बल्लेबाजों को खूब नचा रहे हैं। यही नहीं, कुलदीप यादव, रवींद्र जडेजा और अक्षर पटेल जैसे स्तरीय स्पिनरों का सामना करने के लिए विदेशी टीमें पूरी तैयारी के साथ मैदान पर उतरती है। लेकिन भारत में स्टार खिलाड़ियों के घरेलू क्रिकेट न खेलने का चलन और घोर टर्निंग पिचों पर अभ्यास की कमी स्पष्ट झलकती है। इस दौरान टीम के चयन और अंतिम एकादश के साथ प्रयोगों का सिलसिला इतना लंबा हो चला है कि भारतीय टीम दयनीय स्थिति में दिख रही है। भारत को पिछले चार टेस्ट मैचों में लगातार हराने में न्यूजीलैंड के स्पिनर मिचेल सैंटनर और दक्षिण अफ्रीका के स्पिनर सिमोन हार्मर का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

















