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राष्ट्रपति और गवर्नर पर क्यों नहीं हो सकता केस? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब

गुरुवार दोपहर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल, राज्यों की ओर से पास किए गए बिलों पर निर्णय लेने के लिए किसी तय समय सीमा से बंधे नहीं हैं।

Written byMahak SinghMahak Singh
Nov 20, 2025, 02:53 pm IST
inभारत
Suprime Court

Suprime Court

गुरुवार दोपहर देश की संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भारत के राष्ट्रपति और राज्यपाल (गवर्नर) राज्य सरकारों द्वारा पास किए गए बिलों को मंजूरी देने या उस पर निर्णय लेने के लिए किसी तय समय सीमा यानी टाइमलाइन से बंधे नहीं हैं। हाल के दिनों में कई राज्यों में यह विवाद चल रहा था कि गवर्नर बिलों को लंबे समय तक रोके रखते हैं। ऐसे में यह फैसला बेहद अहम माना गया है। यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने दिया। यह बेंच राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना जवाब दे रही थी। कोर्ट ने 12 अप्रैल को दिए गए अपने पुराने आदेश की वैधता भी बरकरार रखी।

तमिलनाडु के मामले पर कोर्ट की नाराजगी- फैसले के दौरान जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन ने तमिलनाडु के गवर्नर आर. एन. रवि के कामकाज पर नाराज गी जताई। उन्होंने कहा कि गवर्नर ने राज्य सरकार द्वारा पास किए गए कई बिलों पर लंबे समय तक कोई फैसला नहीं लिया, जो संविधान के अनुसार सही नहीं है। संविधान गवर्नर को तीन विकल्प देता है- बिल को मंजूरी दें, उसे वापस विधानसभा भेजें, उसे राष्ट्रपति के पास भेजें। उसे अनिश्चित समय तक रुका कर रखना संवैधानिक रूप से गलत है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि वह केवल सलाह दे सकता है, आदेश नहीं दे सकता।

क्या राष्ट्रपति या गवर्नर पर केस हो सकता है- कोर्ट ने साफ किया कि राष्ट्रपति और गवर्नर के आधिकारिक काम “जस्टिसिएबल” नहीं हैं, यानी उन पर उनके पद पर रहते हुए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। संविधान का आर्टिकल 361 उन्हें कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा देता है। हां, अगर कोई बिल कानून बन जाने के बाद गलत तरीके से लागू हो, तो उस पर न्यायिक समीक्षा (ज्यूडिशियल रिव्यू) हो सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिल अगर रोका जाए तो गवर्नर उसे बिना कारण अनिश्चित समय तक पेंडिंग नहीं रख सकते। उचित समय में फैसला करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आर्टिकल 200 के तहत गवर्नर बिल पर फैसला स्वतंत्र रूप से लेते हैं। वे इस मामले में राज्य के मंत्रिमंडल की सलाह से बंधे नहीं हैं। इसी तरह आर्टिकल 201 के तहत राष्ट्रपति भी समय सीमा से मुक्त हैं। कुछ राज्यों में यह मांग उठती रही कि अगर गवर्नर बहुत देर तक बिल पर फैसला न लें, तो उसे “मानी हुई मंजूरी” (Deemed Assent) माना जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि भारतीय संविधान में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। यहां तक कि कोर्ट अपने विशेष अधिकार (आर्टिकल 142) का उपयोग करके भी “डीम्ड असेंट” घोषित नहीं कर सकता।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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