जिन्ना के देश के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने एक बार फिर दिखाया कि न उनमें सैन्य गंभीरता है, न वे जिम्मेदार पद पर बैठने के लायक हैं। सेना से जुड़े तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले और झूठ को सच का बाना पहनाने की कोशिश में दुनिया में अपनी खिल्ली उड़वाने वाले मुनीर ने इस बार इस्लामाबाद में जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला के सम्मान में आयोजित भोज में अपनी जगहंसाई कराई। मुनीर ने भारत के प्रति धमकीभरे शब्द बोलते हुए आक्रामक बयानबाजी की।
मुनीर ने विदेशी मेहमानों के सामने अपने भाषण में कहा कि ‘पाकिस्तान एक जिम्मेदार परमाणु ताकत है और उसकी सेना किसी भी बाहरी हमले या दबाव का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।’ मुनीर ने भारत की ओर संकेत भरे शब्दों में आगे कहा कि अगर किसी देश ने पाकिस्तान पर युद्ध थोपने की कोशिश की तो उसका जवाब पहले से अधिक कठोर होगा। पहले से अधिक के क्या मायने हैं, यह मुनीर ने नहीं बताया हालांकि उन्हें साफ कर देना चाहिए था कि पाकिस्तान के जिहादी अड्डे और कई हवाईअड्डे भारत की मिसाइलों से चकनाचूर हुए थे और पाकिस्तान अमेरिका की शरण में जाकर आपरेशन रुकवाने की चिरौरी कर रहा था।
सीधे भारत का नाम लिए बिना जिन्ना के देश के जनरल ने कहा कि उनकी ‘सेना अल्लाह के भरोसे लड़ती है और इसलिए फतह पाती है।’ कौन सी फतह, यह भी मुनीर को साफ बताना चाहिए था, लेकिन इस पर मुनीर के होंठ सिल गए। फौजी जनरल ने बस यही कहा कि ‘पाकिस्तान ने भारत के साथ पिछले युद्धों में कठिन परिस्थितियों में भी अपने आत्मसम्मान की रक्षा की है और भविष्य में भी ऐसा ही करेगा।’

जनरल मुनीर ने अपने वक्तव्य में आगे कहा कि ‘जब मुसलमान अपने ईमान पर भरोसा करता है तो उसके संकल्प असंभव को संभव बना देते हैं।’ उन्होंने प्रतीक रूप में कहा कि ‘जब एक सच्चे ईमान वाला आदमी मिट्टी भी उठाकर दुश्मन पर फेंक देता है, तो वह मिट्टी मिसाइल का काम करती है।’ समझ सकते हैं कि 21वीं सदी में कोई फौजी अगुआ इस तरह की बात करे तो उसकी सेना का मनोबल कितना गिरा हुआ होगा। मुनीर के हर बयान और काम से फौज की कायरता झलकती है।
लेकिन पाकिस्तान जैसे कट्टर इस्लामी मुल्क में मुनीर के इस बयान पर भी मजहबी उन्मादी बल्लियों उछलें तो इसमें आश्चर्य नहीं है। हतबल सेना भी ऐसी बातों से उत्साहित हो तो भी आश्चर्य कैसा। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना कुछ अलग है। वे कहते हैं कि मुनीर के बोल घरेलू लोगों को संबोधित तो किए ही गए हैं, लेकिन उससे बढ़कर यह पाकिस्तान के भीतर बढ़ रही अस्थिरता, आर्थिक संकट और राजनीतिक खींचतान से ध्यान भटकाने का प्रयास ही है।
भारत ने आपरेशन सिंदूर में अपनी सेना से पिटे देश की इस गीदड़भभकी पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। लेकिन रक्षा विशेषज्ञों और राजनयिकों का मानना है कि मुनीर का यह बयान पाकिस्तान की पुरानी जहरबुझी राजनीतिक परंपरा का ही प्रदर्शन है, जिसमें भारत-विरोधी बयानबाजी के जरिए अपने लोगों का समर्थन जुटाने की कोशिश की जाती है।
नई दिल्ली स्थित रणनीतिक मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की सेना ने हमेशा अपने राजनीतिक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ‘भारत से खतरा है’ का विमर्श उछाला है। जनरल मुनीर का यह बयान भी उसी सिलसिले की अगली कड़ी है। उनका उद्देश्य पाकिस्तानी जनता के भीतर यह संदेश देना है कि ‘उनकी सेना देश की संप्रभुता की गारंटी है। जबकि ऐसा है नहीं। पाकिस्तान की सेना दुनिया की सबसे निराशा से भरी फौज मानी जाती है।
हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्तमान में कोई प्रत्यक्ष सैन्य तनाव नहीं है, लेकिन नियंत्रण रेखा पर समय-समय पर छोटी—मोटी झड़पें होती रहती हैं। दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच कूटनीतिक संवाद लगभग ठप है और आतंकवाद, सीमा पार घुसपैठ व जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान अपनी धूर्तता से बाज नहीं आ रहा है।
जनरल मुनीर के इस बयान के संदर्भ में पाकिस्तान की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट को समझना जरूरी है। देश में महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर है, विदेशी मुद्रा भंडार सीमित हैं और जनता में सरकार तथा सेना के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे वक्त में सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान और सेना, अक्सर ‘बाहरी दुश्मन’ के मुद्दे को उभारकर जनता का ध्यान अंदरूनी समस्याओं से हटाने का प्रयास करते हैं।
कहना न होगा, जनरल मुनीर के बयान में मजहबी भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य को साधता प्रतीत होता है। उन्होंने अपने संबोधन में पाकिस्तान को एक ‘मजबूत मुस्लिम राष्ट्र’ और ‘इस्लामी ब्रदरहुड’ के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।

















