मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0: हेमंत मुक्तिबोध ने संघ संवाद में नरैटिव वारफेयर पर रखी बात
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मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0: हेमंत मुक्तिबोध ने संघ संवाद में नरैटिव वारफेयर पर रखी बात

भोपाल के मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0 में RSS सह-कार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध ने हिंदू राष्ट्र के 100 साल पुराने नरेटिव पर चर्चा की। संघ की हिंदुत्व परिभाषा: संस्कृति और मूल्यों का सम्मान। जानें संघ की यात्रा और समाज संगठन का लक्ष्य।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 16, 2025, 02:19 pm IST
inमध्य प्रदेश
Madhya Pradesh Sushashan Samvad 2.0

संघ संवाद पर बोलते हेमंत मुक्तिबोध

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हो रहे मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0 में ‘संघ संवाद’ विषय पर वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा से बात करते हुए आरएसएस के मध्य क्षेत्र के सह कार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध जी ने कहा कि दुनिया में हिन्दुओं को लेकर तमाम तरह के नरैटिव चल रहे हैं। लेकिन हिन्दू राष्ट्र के नरैटिव की शुरुआत आज से 100 वर्ष पहले आरएसएस के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी। संघ हर उस व्यक्ति को हिन्दू मानता है, जो इसकी संस्कृति, मूल्यों और देश का सम्मान करता है। फिर उसकी पूजा-उपासना, पंथ या मजहब कुछ भी हो।

संघ की 100 वर्ष की यात्रा में हिन्दू जीवन को किस प्रकार से प्रतिपादित करते हैं?

हेडगेवार जी ने 1925 में संघ की शुरुआत की। दुनिया में तमाम तरह के नरैटिव चल रहे हैं। आने वाले वक्त में नरैटिव वारफेयर चल रहा है। भारत में सबसे अधिक प्रभावशाली व्यक्ति कोई हैं तो वो थे डॉ हेडगेवार थे। उनकी जीवनी में एक बैठक के दौरान किसी ने हिन्दू राष्ट्र की बात करने वालों को पागल कहा गया था तब हेडगेवार ने कहा था कि ये राष्ट्र हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा। इस धरती पर हिन्दू रक्त का एक भी व्यक्ति जब तक रहेगा, तब तक ये देश हिन्दू राष्ट्र रहेगा। इस लिए हिन्दू राष्ट्र के नरैटिव की शुरुआत आज से 100 साल पहले हुई थी। लेकिन,अगर इसे अस्तित्व के संदर्भ में देखें तो ये हिन्दू राष्ट्र तो शुरू से रहा है।

अगर बात करें कि संघ ने हिन्दू किसे कहा तो संघ के हिन्दू या हिन्दुत्व की पहचान आपके बाहरी आचरण से, उपासना पद्धति से, तिलक, लगाने, भगवान को मानने या ना मानने से कुछ भी लेना देना नहीं है। संघ कि सीधी परिभाषा ये है कि जो इस देश को मानता है, इसकी संस्कृति और मूल्यों का सम्मान करता है, देश से प्रेम करने वाला, ऐसे सभी व्यक्ति हिन्दू हैं, चाहे फिर उनकी पूजा, उपासना या पंथ और मजहब कुछ भी हों। मुझे ऐसा लगता है कि इससे बड़ी हिन्दुत्व की कोई और परिभाषा नहीं हो सकती।

हिन्दू एक मूल्य आधारित संस्कृति है। और राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है और इसके अंदर राजनैतिक, प्रशासनिक इकाइयां हो सकती हैं। जिन सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर समाज की पहचान होती है वो राष्ट्र है। संविधान की प्रस्तावना में भी कहा गया है कि ‘वी द पीपुल ऑफ इंडिया’ इसमें इंडिया से पहले पीपुल आता है। इसलिए लोगों से राष्ट्र बनता है। इसलिए हम ये कह सकते हैं कि आध्यात्मिक आधार पर राष्ट्र की संरचना हुई। हमारे देश में प्राचीन काल में कहा गया है कि ऋषियों की भद्र इच्छाओं से राष्ट्र की संकल्पना का जन्म हुआ। ये भद्र इच्छाएं सर्वे भवन्तु सुखिन:, “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥” , इस तरह की अनेक भद्र इच्छाओं की पूर्ति के लिए राष्ट्र की संकल्पना को प्रतिपादित किया गया। ये सांस्कृतिक आधार और आध्यात्मिक अधिष्ठान है। और इसे ही हम लोग हिन्दू या हिन्दुत्व कहते हैं। इसी बात को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं।

भारत की बात कहने में संघ कितना सफल हुआ और पिछले कुछ सालों में इसमें कितना परिवर्तन देखने को मिला है?

देखिए कौन कैसे देखता है ये उसका मूलभूत अधिकार है। लेकिन, लोगों के देखने का नजरिया खुद बदला है। क्योंकि उसे लगा कि जो मैं देख रहा हूं वो सही है क्या, क्योंकि अंतर्मन में वो देख रहा था उसमें और बाह्य में साम्य नहीं था। जब उसने (लोगों ने) नजरिए को बदला तो समझ आय़ा कि उसकी अंतर्दृष्टि तो ठीक है, लेकिन बाह्य दृष्टि सही नहीं है, तो उसने अंतर्दृष्टि की ओर आना शुरू किया।

संघ ने शुरू से ही कहा है कि हम कोई समाज के अंदर अलग संगठन नहीं हैं और न ही हम बंधकर रहना चाहते हैं। हम तो चाहते हैं कि जितनी जल्दी हो सके हम अपना काम खत्म करके समाज में ही विलीन हो जाएं। समाज को ही एक संगठित अवस्था प्रदान करना ही संघ का उद्देश्य है।

इस मामले में चल रही सियासत के दौर में कुछ आरोप भी लगते रहे हैं, इसको लेकर जब भी लोगों से आपकी बातचीत होती है तो उस पर आप क्या कहेंगे?

जहां तक आरोपों की बात करें तो वो तो किसी के भी ऊपर लगाए जा सकते हैं क्योंकि हर एक के पास अपनी स्वतंत्रता है। संघ को समाज से मिलने वाले प्रतिसाद को देखकर के यदि कुछ समाद्रोही व्यक्तियों के मन के अंदर कुछ पीड़ा होती है और उसके कारण वो संघ पर आरोप लगाते हैं तो हम क्या कर सकते हैं। हम तो अपने मूल चरित्र में अहिंसावादी और मासूम संगठन हैं। इसलिए उनके दुख के कारण को स्पष्ट करना हमारा काम है। संघ का काम किसी के भी खिलाफ होना नहीं है। सबके प्रति सकारात्मक और अहोभाव रखके काम करने से ही कुछ परिवर्तन लाया जा सकता है। हम तो आज के विरोधी को भी अपनाकर चलते हैं।

‘संघ को समझना है तो शाखा में आइए’, इसे किस तरह से परिभाषित करेंगे?

लोगों की संघ को देखने की दृष्टि का खेल है। कई बार लोग शाखा को लेकर भी अपने विचार रखते हैं। कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे। कुछ लोग आना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं है कि जाएं तो जाएं कैसे। रही बात शाखा की तो वहां हम सुबह, खेल भी खेलते हैं, लेकिन ये कोई स्पोर्ट्स क्लब नहीं है। शाखा वस्तुत: चरित्र निर्माण का केंद्र है। ये महिलाओं की सुरक्षा का मूक अभिवचन है। स्वामी विवेकानंद इसे मैन विद कैपिटल कहा था।

क्या कारण है कि थोड़ा शारीरिक और बहुत अधिक आत्मिक विकास है कि संघ ने ऐसे दुरूह क्षेत्रों में जाकर काम करना शुरू करना शुरू किया?

हमें इस राष्ट्र का परम वैभव वापस करना है। जब इसकी बात आती है तो मन, बुद्धि, जन आदि की भी बात आती है। इस वैभव को लाने के लिए इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना होगा। ऐसा नहीं है कि भारत के किसी दूरस्थ क्षेत्र में नक्सल की समस्या हैं तो वहां संघ पहुंचा। अगर देश में ये शक्तियां नहीं भी होती तो भारत को संघ की जरूरत है। क्योंकि प्राचीन भारत के पुनर्जागरण के लिए हमें वो सारे कार्य करने होंगे, जिसके कारण भारत भारत था।

प्रचार की दिशा में संघ कुछ कर पाया है या उसे अभी और करने की आवश्यकता है?

आज के दौर में प्रचार का बड़ा महत्व है। शुरुआत में जब संघ था तो हमारे यहां एक गीत गाया जाता था, ‘वृत पत्रों में नाम छपेगा, पहनूंगा स्वागत समुहार, छोड़ चलो ये छुद्र भावना हिन्दु राष्ट्र के तारणहार।’ तो जिनको हिन्दू राष्ट्र को फिर से विकसित करना है तो उन्हें इन भावनाओं को छोड़कर काम करना होगा। क्योंकि, पैसा, पद और प्रसद्धि मनुष्य को अहंकारी बना देते हैं। इसलिए संघ के स्वयंसेवक प्रचार नहीं करते हैं। लेकिन, वक्त के साथ समाज में जिस प्रकार से नकारात्मकता को बढ़ावा देने की कोशिश की गई, जिससे लोगों को सच बताने की जरूरत भी महसूस होती है। समाज को अच्छी चीजों का भी पता चले इसलिए हमने धीरे-धीरे प्रचार का भी काम शुरू किया। लेकिन, हम संघ का प्रचार नहीं करते। हम समाज के अंदर हो रहे अच्छे बदलावों का प्रचार करते हैं।

Topics: हेमंत मुक्तिबोधSangh dialogueHindu CultureMadhya Pradesh good governance dialogue 2.0BhopalHindutva definitionHindu nationnarrative warfareहिंदू राष्ट्रHemant Muktibodhहेडगेवार जीHedgewar jiसंघ संवादRSSमध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0नरेटिव वारफेयर
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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