साहित्यिक कुंभ में बोलियों के संरक्षण का संकल्प
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साहित्यिक कुंभ में बोलियों के संरक्षण का संकल्प

रीवा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का 17वां अधिवेशन आयोजित हुआ। इसका भव्य शुभारंभ पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ होने और राष्ट्रचेतना को प्राणतत्व मिलने की बात कही।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 15, 2025, 04:21 pm IST
inसंघ @100
अधिवेशन के उद्घाटन पर मां सरस्वती की पूजा करते श्री रामनाथ कोविंद और साहित्य परिषद के अधिकारी एवं (बाएं) अधिवेशन में उपस्थित साहित्य-प्रेमी

अधिवेशन के उद्घाटन पर मां सरस्वती की पूजा करते श्री रामनाथ कोविंद और साहित्य परिषद के अधिकारी एवं (बाएं) अधिवेशन में उपस्थित साहित्य-प्रेमी

गत 7-9 नवंबर तक रीवा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का 17वां अधिवेशन आयोजित हुआ। इसका भव्य शुभारंभ पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ होने और राष्ट्रचेतना को प्राणतत्व मिलने की बात कही। उन्होंने साहित्य को स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देश के आज के विकास में एक सशक्त माध्यम बताया। उद्घाटन सत्र में प्रसिद्ध मराठी साहित्यकार श्री विश्वास पाटिल ने भारतीय साहित्य को समाज निर्माण की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग बताते हुए अपने विभिन्न अनुभवों को साझा किया। मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने इस आयोजन हेतु रीवा का चयन करने पर आभार प्रकट किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री अतुल लिमये, अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराड़कर, अध्यक्ष श्री सुशीलचन्द्र त्रिवेदी, महामंत्री श्री ऋ षि कुमार मिश्र आदि की गरिमामयी उपस्थिति तीनों दिन रही। अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति, पद्मश्री, अकादमियों से अलंकृत विभूतियां इस आयोजन में सम्मिलित रहीं। आगामी तीन वर्ष तक ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर लेखन, पठन, पाठन, व्याख्यान के लक्ष्य को लेकर यह आयोजन हुआ। अधिवेशन में देश भर से आए वरिष्ठ साहित्यकारों, विचारकों व समाजकर्मियों ने व्याख्यान दिए। कुल दस सत्रों में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर व्यापक मंथन, चिंतन, मनन का वैचारिक यज्ञ चला।

देश के लगभग सभी प्रदेशों से इस सम्मेलन में आए साहित्यकारों ने रीवा में जैसे लघु भारत की रचना कर दी। सुदूर दक्षिण में केरल से लेकर पंजाब और ओडिशा से लेकर पूर्वोत्तर तक के साहित्य-प्रेमियों ने इस सम्मेलन में अनवरत त्रिदिवसीय वैचारिक यज्ञ किया। सर्वभाषा कवि सम्मेलन के आयोजन हुए। सभी देशज भाषाओं के कवियों का एक मंच पर समागम व भिन्न-भिन्न भाषाओं की राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत कविताओं ने मन मोह लिया।

अधिवेशन में आगामी तीन साल के लिए नई कार्यकारिणी की घोषणा भी की गई। परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर श्री सुशीलचन्द्र त्रिवेदी पूर्ववत बने रहेंगे। राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में श्री पवनपुत्र बादल कार्य करेंगे। साहित्य परिषद् के राष्ट्रीय संगठन मंत्री का दायित्व वरिष्ठ प्रचारक श्री मनोज कुमार संभालेंगे।

साहित्य परिषद् ने देश में ओटीटी प्लेटफार्म से प्रसारित हो रही अनैतिक सामग्री के विरुद्ध एक प्रस्ताव पारित किया। भारत के विविध भाषायी गौरव पर भी परिषद् ने एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में कहा गया है,“भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। इन भाषाओं के अतिरिक्त देश के विभिन्न क्षेत्रों में सैकड़ों बोलियां प्रचलित हैं, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विविधता की सजीव प्रतीक हैं। ये भाषाएं प्रतिस्पर्धी पहचान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जीवन के व्यापक फलक पर पूरक रंग हैं। इन भाषाओं का संरक्षण, संवर्धन और उत्सव प्रतिरोध का कार्य नहीं है-यह समावेशिता और स्वाभिमान के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की पुष्टि है। अतः भारतीय भाषा दिवस (11 दिसंबर) के उपलक्ष्य में पूरे देश में व्यापक समारोह आयोजित किए जाए।”

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघअखिल भारतीय साहित्य परिषदसाहित्यिक कुंभबोलियों का संरक्षण17वां अधिवेशनश्री रामनाथ कोविंदआत्मबोध से विश्वबोधराष्ट्रचेतना
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