बिहार की सियासत हमेशा देश की राजनीति का आईना रही है। यहां के मतदाताओं का मिजाज जितना गूढ़ है, उतना ही अप्रत्याशित भी। यही कारण है कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों के बाद आए एग्जिट पोल्स ने एक बार फिर पूरे देश की निगाहें इस राज्य पर टिका दी हैं। दो चरणों में हुए इस चुनाव में पहले फेज में 121 सीटों पर और दूसरे फेज में 122 सीटों पर मतदान हुआ। पहले चरण में लगभग 65 प्रतिशत और दूसरे चरण में 67 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग ने संकेत दे दिया है कि इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प रहेगा। हालांकि चुनाव परिणाम 14 नवंबर को आएंगे लेकिन उससे पहले ही एग्जिट पोल्स की बाढ़ ने सियासी तापमान चरम पर पहुंचा दिया है।
इस बार एक या दो नहीं बल्कि कुल 12 प्रमुख सर्वे एजेंसियों ने अपने-अपने अनुमान जारी किए हैं और दिलचस्प बात यह है कि लगभग सभी एग्जिट पोल्स में एनडीए की सरकार बनती दिख रही है। ‘पोल ऑफ पोल्स’ के मुताबिक एनडीए को औसतन 154 सीटें, महागठबंधन को 84 सीटें और अन्य को 5 सीटें मिलने का अनुमान है यानी 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए बहुमत के आंकड़ा 122 से काफी ऊपर पहुंचता हुआ दिख रहा है।
एग्जिट पोल के एजेंसीवार आकलन पर नजर डालें तो दैनिक भास्कर ने एनडीए को 145 से 160 सीटें और महागठबंधन को 73 से 91 सीटें दी हैं। मैट्रिज-आईएएनएस के अनुसार एनडीए 147 से 167 सीटें जीत सकता है, जबकि महागठबंधन 70 से 90 सीटों पर सिमट सकता है। पीपुल पल्स के एग्जिट पोल में भी एनडीए को 133-159 सीटें और महागठबंधन को 75-101 सीटें दी गई हैं। वहीं चाणक्य का अनुमान 130-138 बनाम 100-108 का है। पोल्स्ट्रेट, जेवीसी, पी मार्क, टाइम्स नाउ और टीआईएफ रिसर्च के अनुमानों में भी लगभग यही रुझान दिख रहा है। पोल्स्ट्रेट ने एनडीए को 133-148 तथा महागठबंधन को 87-102, जेवीसी ने एनडीए को 135-150 तथा महागठबंधन को 88-103, पी मार्क ने एनडीए को 142-162 तथा महागठबंधन को 80-98, टाइम्स नाउ ने एनडीए को 143 तथा महागठबंधन को 95 और टीआईएफ रिसर्च ने एनडीए को 145-163 तथा महागठबंधन को 76-95 सीटें अपने-अपने पोल में दी हैं। दिलचस्प रूप से ‘पोल डायरी’ और ‘प्रजा पोल एनालिटिक्स’ जैसी कुछ एजेंसियों ने एनडीए को 180 से अधिक सीटों तक का अनुमान दे डाला है, जो इसे बंपर बहुमत की ओर ले जाता है। ‘पोल डायरी’ ने एनडीए को 184-209 तथा महागठबंधन को महज 32-49 और ‘प्रजा पोल एनालिटिक्स’ ने एनडीए को 186 तथा महागठबंधन को केवल 56 सीटें दी हैं।
2020 के मुकाबले कहीं अधिक मजबूती से उभरेगा एनडीए
कुल मिलाकर, सभी 12 एग्जिट पोल्स की औसत तस्वीर बताती है कि एनडीए इस बार 2020 के मुकाबले कहीं अधिक मजबूती से उभर सकता है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम और तेज प्रताप यादव की नई पार्टी जनशक्ति जनता दल जैसी छोटी पार्टियां प्रभावहीन साबित होती दिख रही हैं। इन सबको मिलाकर 3 से 5 सीटों से अधिक मिलने की संभावना नहीं जताई जा रही। यह स्थिति उस पृष्ठभूमि में और दिलचस्प हो जाती है, जब बिहार में पिछली बार यानी 2020 के विधानसभा चुनावों में एनडीए ने महज 125 सीटों के साथ बहुत मुश्किल से बहुमत हासिल किया था जबकि महागठबंधन को 110 सीटें मिली थी। उस चुनाव में राजद 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इस बार एग्जिट पोल्स के मुताबिक तस्वीर बिल्कुल उलट सकती है।
आंख मूंदकर भरोसा करना भी कठिन
हालांकि एग्जिट पोल्स के इतिहास को देखते हुए इस पर आंख मूंदकर भरोसा करना भी कठिन है। 2010, 2015 और 2020 के पिछले तीन विधानसभा चुनाव एग्जिट पोल्स की विश्वसनीयता की कसौटी पर असफल रहे हैं। 2015 में जब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन ने भाजपा को पटखनी दी थी, तब लगभग सभी एग्जिट पोल्स ने एनडीए की बढ़त दिखाई थी। वहीं 2020 में उलटा हुआ, कई सर्वे एजेंसियों ने महागठबंधन की जीत का अनुमान लगाया पर असली नतीजों में एनडीए ने 125 सीटें जीत ली थी। महाराष्ट्र में एग्जिट पोल्स ने महायुति को 150-170 सीटें दी थी जबकि नतीजों में एनडीए को 234 सीटों की ऐतिहासिक जीत मिली। झारखंड में पोल्स ने एनडीए की सरकार बनने का अनुमान जताया था जबकि असल में इंडिया ब्लॉक ने 56 सीटों पर जीत दर्ज की। लगातार गलत अनुमानों ने एग्जिट पोल्स की साख पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि एग्जिट पोल केवल ‘रुझान’ होते हैं यानी वोटरों की प्रवृत्ति का एक मोटा अनुमान। इन्हें वैज्ञानिक या सटीक आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जा सकता क्योंकि इनकी सीमा बहुत छोटी होती है। अधिकतर मामलों में कुछ सौ या कुछ हजार मतदाताओं से बातचीत कर पूरे राज्य की राजनीतिक तस्वीर तैयार कर दी जाती है।
गेम शो की तरह पेश किए जाते हैं एग्जिट पोल्स
ऐसे सीमित सर्वे से प्राप्त निष्कर्ष स्वाभाविक रूप से त्रुटिपूर्ण हो सकते हैं। कई बार मतदाता सर्वे के समय सही जानकारी भी नहीं देते या अपनी पसंद छिपा लेते हैं। वास्तव में एग्जिट पोल अब चुनावी विज्ञान से ज्यादा मनोरंजन का साधन बन चुके हैं। चैनलों के लिए ये उच्च टीआरपी और विज्ञापन राजस्व का सबसे आसान जरिया हैं। चुनावों के दौरान मतदाताओं की उत्सुकता और भावनाओं का लाभ उठाते हुए एग्जिट पोल्स दर्शकों को स्क्रीन से जोड़े रखने का काम करते हैं। यही कारण है कि चुनाव के दिन समाप्त होते ही ये पोल्स लगभग ‘गेम शो’ की तरह पेश किए जाते हैं।
फिर भी, यह नहीं कहा जा सकता कि एग्जिट पोल्स का कोई महत्व नहीं है। ये समाज के एक हिस्से का राजनीतिक झुकाव दिखाते हैं और राजनीतिक दलों के लिए संकेतक की भूमिका निभाते हैं। यदि बिहार के संदर्भ में देखा जाए तो इस बार मतदाता चुपचाप अपना निर्णय दे चुके हैं। 2020 में भाजपा और जदयू के समीकरणों ने मुश्किल से सरकार बनाई थी लेकिन इस बार वोटिंग प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में एनडीए की बढ़ती पैठ ने उसके आत्मविश्वास को मजबूत किया है। महागठबंधन में तालमेल की कमी, कांग्रेस की कमजोर उपस्थिति और आरजेडी के पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव के संकेत एग्जिट पोल्स में भी झलकते हैं। 14 नवंबर का दिन ही यह तय करेगा कि इस बार एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणी कितनी सटीक बैठती है।

















