भारत ने जब-जब मुश्किलों का सामना किया, तब-तब उसने अपनी क्षमता साबित की है। अमेरिका ने क्रायोजेनिक इंजन नहीं दिया और रूस से भी नहीं लेने दिया। सुपरकम्प्यूटर और चिप-सेमीकंडक्टर की राह में भी रोड़े अटकाए।लेकिन भारत ने हार नहीं मानी। अपनी प्रतिभा और संसाधनों के दम पर सुपरकम्प्यूटर ‘परम’ और चिप ‘विक्रम’ बनाकर दुनिया में अपनी स्वदेशी शक्ति का लोहा मनवाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी आह्वान ने हर भारतीय के भीतर नई चेतना जगाई है। इसलिए आज भारतीय मेधा द्वारा विकसित जोहो और मैपल्स जैसे स्वदेशी उत्पाद गूगल जैसी बड़ी टेक कंपनियों को चुनाैती दे रहे हैं
भारत की स्वदेशी पर आत्मनिर्भरता की कहानी केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावना और गौरव का प्रतीक है। जब देशवासी स्वदेशी उत्पादों, तकनीकों और नवाचारों को अपनाते हैं, तो वे केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि राष्ट्र की सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूत करते हैं। आत्मनिर्भरता का अर्थ है-संकट की स्थिति, वैश्विक आपूर्ति की चुनौतियों या अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद देश अपनी शक्ति, संसाधनों और योजनाओं पर भरोसा कर सके। यह आत्मबल देश को हर आपदा में स्थिर और सक्षम बनाता है।
अगर इतिहास देखें, तो स्वदेशी आंदोलन से लेकर ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ तक, हर चरण ने देश को अपनी जड़ों से जोड़ने, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय आत्मगौरव को पुनर्जीवित करने का कार्य किया है। आत्मनिर्भरता से रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा, औद्योगिक विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमता विकसित होती है, जिससे देश वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा हो सके और आर्थिक प्रगति के पथ पर आगे बढ़े। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि आत्मनिर्भर भारत केवल आर्थिक अभियान नहीं, बल्कि हर नागरिक के अंदर एक नई चेतना जगाने का साधन है, जिससे भारतीय समाज का हर वर्ग सशक्त और सम्मानित हो सके।

… जब अमेरिका ने नहीं दिया जीपीएस डेटा
विदेशी कंपनियों पर तकनीकी या डिजिटल निर्भरता भारत के लिए बेहद घातक सिद्ध हो सकती है। इसका स्पष्ट उदाहरण अतीत और वर्तमान, दोनों में मिलता है। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारत ने शत्रु सैनिकों और आतंकियों की सटीक स्थिति जानने के लिए अमेरिका से ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) डेटा मांगा था। लेकिन अमेरिका ने रणनीतिक और राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हुए भारत को यह सेवा देने से इनकार कर दिया। नतीजा, भारतीय सेना को बिना जीपीएस की मदद के ऊंचाई पर स्थित दुश्मनों से लड़ना पड़ा, जो काफी कठिन और जानलेवा साबित हुआ। इस कारण भारतीय सैनिकों को भारी जनहानि भी उठानी पड़ी। इस घटना ने भारत को अपनी स्वदेशी उपग्रह-आधारित नेविगेशन प्रणाली विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
इसके बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने NavIC नेविगेशन सिस्टम बनाया, जो जीपीएस की तरह काम करता है और भारत व इसके आसपास के क्षेत्र में सटीक नेविगेशन सुविधा प्रदान करता है। NavIC का उद्देश्य भारत को सैन्य और नागरिक नेविगेशन, दोनों में आत्मनिर्भर बनाना है, ताकि भविष्य में कोई अन्य देश अपनी मर्जी से भारत को तकनीकी सहायता से वंचित न कर सके।
अपना सुपरकम्प्यूटर ‘परम’

1980 के दशक के अंत में भारत ने अमेरिका से क्रे सुपरकम्प्यूटर (Cray Supercomputer) की मांग की थी। लेकिन अमेरिका ने तकनीकी प्रतिबंधों तथा डुअल-यूज (सैन्य एवं नागरिक) एप्लिकेशन के कारण इसे देने से मना कर दिया था। इसके बाद भारत सरकार ने स्वयं उच्च प्रौद्योगिकी आधारित सुपरकम्प्यूटर विकसित करने का निर्णय लिया। इसी के तहत 1988 में C-DAC (सेंटर फॉर डेवेलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग) की स्थापना की गई और डॉ. विजय भाटकर के नेतृत्व में 1991 में भारत का पहला स्वदेशी सुपरकम्प्यूटर ‘परम 8000’ विकसित हुआ। भारत ने दुनिया को दिखा दिया कि वह अपने दम पर अत्याधुनिक कम्प्यूटिंग बना सकता है। इसके बाद सुपरकम्प्यूटर शृंखला में 10000, परम पद्म, परम युवा और परम ईशान जैसे मॉडल निरंतर तकनीकी सुधार के साथ विकसित हुए। राष्ट्रीय सुपरकम्प्यूटिंग मिशन (एनएसम) के तहत भारत ने अपने सुपरकम्प्यूटिंग अवसंरचना को और भी मजबूत किया है, जिससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास को बड़ा फायदा मिला है।
नायरा एनर्जी को माइक्रोसॉफ्ट का झटका
यही स्थिति जुलाई 2025 में देखी गई, जब भारत की अग्रणी तेल और गैस कंपनी नायरा एनर्जी (पूर्व नाम एस्सार ऑयल) को माइक्रोसॉफ्ट ने एकतरफा और बिना पूर्व सूचना अपनी आईटी सेवाएं बंद कर दीं। इसका कारण यूरोपीय संघ के रूस के खिलाफ प्रतिबंध थे, क्योंकि नायरा में रूसी ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट (Rosneft) की हिस्सेदारी लगभग 49.13 प्रतिशत है। हैरानी की बात यह कि यह कार्रवाई अमेरिकी या भारतीय कानून के तहत अनिवार्य नहीं थी, लेकिन फिर भी माइक्रोसॉफ्ट ने आईटी सेवाएं रोक दीं। इससे नायरा की ईमेल, क्लाउड और डेटा तक पहुंच ठप हो गई। इससे भारत के एक बड़े ऊर्जा नेटवर्क का संचालन संकट में आ गया।
आखिरकार कंपनी को दिल्ली उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, ताकि अपने अधिकारों की रक्षा कर सके और सेवाएं फिर से शुरू करवा सके। हालांकि, अदालत के हस्तक्षेप से सेवाएं बहाल हो गईं, लेकिन इस घटना ने भारत के नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत और आम नागरिकों के मन में बड़ा सवाल छोड़ दिया-अगली बार अगर ऐसी कोई सेवा अचानक बंद होती है, तो क्या गारंटी है कि भारत को किसी नए संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा?
यह घटना एक चेतावनी है कि तकनीक या आईटी सेवा में विदेशी कंपनियों पर निर्भरता देश की आर्थिक, सामरिक और डेटा सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है। अगर कंपनी विदेशी सेवा प्रदाता की ‘मनमानी’ पर निर्भर है, तो वह सचमुच पंगु हो सकता है।
चिप-सेमीकंडक्टर देने में भी आनाकानी

भारत को चिप देने से रोकने के लिए भी अमेरिका ने कई बार निर्यात प्रतिबंध लगाए हैं। खासकर एआई चिप और अन्य उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी का निर्यात सीमित किया है या प्रतिबंधित कर दिया है, जिससे भारत के उभरते तकनीकी क्षेत्रों पर असर पड़ा है। इसके बावजूद भारत ने पूर्ण स्वदेशी 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर चिप ‘विक्रम’ बना लिया है, जिसे सितंबर 2025 में सेमीकॉन इंडिया-2025 में लॉन्च किया गया। इसरो के सेमीकंडक्टर लैब में विकसित इस चिप को विशेष रूप से अंतरिक्ष और रक्षा जैसे क्षेत्रों के लिए बनाया गया है। हालांकि, भारत ने 1983 में ही पंजाब के मोहाली में सेमीकंडक्टर प्लांट सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (एससीएल) स्थापित कर लिया था। अपनी प्रतिभा और संसाधनों के दम पर इसके लिए 1970 के दशक में काम शुरू हुआ था। 1984 में इस इकाई से उत्पादन भी शुरू हुआ, लेकिन 1989 में लगी रहस्यमयी आग के बाद इस परियोजना को गहरा धक्का लगा। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह योजना परवान चढ़ रही है।
गूगल अपनी सेवाएं बंद कर दे तो!
आज भारत में लगभग हर स्मार्टफोन में गूगल जैसी विदेशी तकनीकी कंपनियों की सेवाएं अनिवार्य रूप से शामिल हैं। यदि वे सेवाएं भारत के लिए एकतरफा बंद कर दी जाएं, तो करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, सरकारी व निजी संस्थाओं के संचालन और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर संकट आ सकता है। भारत को गूगल फीचर्स की अनिवार्यता के चलते डाटा सुरक्षा, डिजिटल आत्मनिर्भरता, प्रतिस्पर्धा के अवसर, तथा तकनीकी नियंत्रण में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि, भारत के पास गूगल, विशेषकर गूगल मैप, क्रोम, व्हाटप और टेलीग्राम सेवा प्रदाता कंपनियों के स्वदेशी विकल्प के रूप में Mappls MapmyIndia और जोहो उपलब्ध हैं। इन दोनों कंपनियों की नींव लगभग एक साथ पड़ी। श्रीधर वेम्बू ने जोहो की स्थापना 1996 में अपने भाइयों और दोस्तों के साथ की थी। श्रीधर वेम्बू शुरू में अमेरिका में काम कर रहे थे, लेकिन H-1B वीजा नहीं मिला तो तमिलनाडु के एक छोटे से गांव मथालमपराई में बसने का निर्णय लिया। उनका उद्देश्य केवल एक सफल कंपनी बनाना नहीं था, बल्कि ग्रामीण भारत को तकनीकी विकास की मुख्यधारा में लाना था। जोहो की शुरुआत एडवेंटनेट नाम से हुई, जो दूरसंचार कंपनियों के लिए नेटवर्क प्रबंधन सॉफ्टवेयर पर काम करती थी। वेम्बू ने बाहरी फंडिंग लेने से इनकार किया और कंपनी को बूटस्ट्रैप्ड (स्वनिधि पर आधारित) तरीके से विकसित किया। उनका दीर्घकालिक दृष्टिकोण था कि जोहो एक ऐसी कंपनी बने जो पीढ़ियों तक टिके और ग्रामीण प्रतिभाओं को सशक्त बनाए। आज जोहो के उत्पाद जैसे-जोहो मेल, अरत्तई (Arattai) और Ulaa गूगल ई-मेल, मेटा के व्हाट्सएप और गूगल क्रोम को चुनौती दे रहे हैं।
वेम्बू का मानना है कि विश्वस्तरीय तकनीक महानगरों या विदेशों से आने की जरूरत नहीं, बल्कि इसे गांवों में भी विकसित किया जा सकता है, जहां प्रतिभाएं मौजूद हैं, लेकिन पारंपरिक शिक्षा प्रणाली उन्हें नजरअंदाज करती है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपने गांव के आस-पास सैटेलाइट कार्यालय बनाए, ताकि ग्रामीण विकास और तकनीकी नवाचार साथ-साथ चलते रहें। अब वे अमेरिका में काम करने वाले भारतीयों को देश लौटने और भारत में अवसरों का लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, खासकर जब अमेरिका की नई वीजा नीतियां भारतीय तकनीकी कर्मचारियों के लिए कठिनाई पैदा कर रही हैं।
इसी तरह, राकेश वर्मा 12 वर्ष तक जनरल मोटर्स में और रश्मि वर्मा ने आईबीएम में काम करने के बाद देश के लिए कुछ करने की जुनून लेकर अमेरिका से आए। 1995 में उन्होंने CE Info systems नाम से कंपनी बनाई, जिसका उत्पाद Mappls MapmyIndia एप आज गूगल मैप को चुनौती दे रहा है। मैप माई इंडिया के सह-संस्थापक, चेयरमैन और प्रबंध निदेशक राकेश वर्मा बताते हैं, ‘‘1991 में जब हम भारत आए तो कुछ लोगों ने सामान्य प्रतिक्रिया दी, जबकि अमेरिका और भारत में हमारे मित्रों और परिवार को यह निर्णय अजीब लगा। वे हमें ‘क्रेजी कपल’ कहते थे। उस समय भारत की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। आज जब मैं उस समय को याद करता हूं, तो सोचता हूं-हममें उस वक्त इतनी हिम्मत आई ही कैसे!’’
1995-97 में मोबाइल फोन आया तो कंपनियों को नेटवर्क टावर लगाने के लिए मैप चाहिए थे। कोका-कोला जैसे ब्रांड यह जानना चाहते थे कि कौन-सी दुकान पर उनका उत्पाद बिक रहा है और कहां नहीं। राकेश वर्मा कहते हैं, ‘‘हमने तय किया कि जो भी काम करेंगे, उसकी बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) भारत में ही रहेगी। इसी शर्त पर हम आज भी काम कर रहे हैं। हम हमेशा कहते आए हैं कि हमें अपनी तकनीक पर निर्भर रहना चाहिए। अगर हम विदेशी तकनीक पर निर्भर रहे, तो एक बार फिर आर्थिक रूप से गुलाम बनने का खतरा रहेगा। पर हमें विश्वास है कि वर्तमान नेतृत्व में भारत अपनी तकनीक, अपना भविष्य खुद बनाएगा। हमारी एकमात्र विनती सरकार से यही है कि मोबाइल निर्माताओं से कहा जाए कि हर हैंडसेट में सिर्फ गूगल मैप ही अनिवार्य न हो। YouTube का भले ही कोई विकल्प न हो, लेकिन गूगल मैप का तो है और वह है, भारत का अपना Mappls। प्रधानमंत्री मोदी के स्वदेशी आह्वान का यही सार है-भारत को आत्मनिर्भर बनाना।’’
राकेश वर्मा की चिंता स्वाभाविक है। माइक्रोसॉफ्ट ने जिस तरह नायरा एनर्जी के विरुद्ध कार्रवाई की, यदि किसी दिन गूगल भी अचानक अपनी सेवाएं बंद कर दे तो क्या होगा, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। वैसे भी मोबाइल में गूगल फीचर्स को अनिवार्य बनाने से भारत के समक्ष कई चुनौतियां आ रही हैं। जैसे-
- डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा : गूगल के कई फीचर्स यूजर्स का डेटा एकत्र करते हैं, जिससे डाटा प्राइवेसी पर खतरा बढ़ता है। इसके लिए सरकार को कड़े नियम बनाने की जरूरत है ताकि यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षित रहे।
- स्वदेशी एप्स और सेवाओं का दबाव : गूगल के अनिवार्य फीचर्स के कारण भारत में विकसित स्वदेशी एप्स और तकनीक को प्रतिस्पर्धा में नुकसान होता है। इससे भारत की डिजिटल आत्मनिर्भरता की राह में बाधा आ सकती है।
- बाजार पर शिकंजा : गूगल के फीचर्स अनिवार्य होने के कारण बाजार में उसका वर्चस्व बढ़ा है। इस कारण छोटे और नए एप डेवलपर्स की जगह सीमित हो जाती है। इससे नवाचार में रुकावट आ सकती है।
- तकनीकी निर्भरता और नियंत्रण : गूगल जैसे बड़े विदेशी टेक कंपनी के फीचर्स पर निर्भरता से भारत अपनी तकनीकी स्वतंत्रता में कमी महसूस करता है, खासकर सुरक्षा और प्लेफॉर्म नियंत्रण के लिहाज से।
- उपयोगकर्ता अनुभव और भाषा विविधता : गूगल ने हाल ही में भारत में कई भाषाओं में एआई आधारित फीचर्स लॉन्च किए हैं, जो यूजर्स के लिए लाभकारी हैं, लेकिन अनिवार्यता के कारण कुछ यूजर्स को पसंद या जरूरत के अनुसार विकल्प चुनने में कठिनाई होती है।
इसलिए स्वदेशी तकनीक व डिजिटाइजेशन पर निवेश करना, अपने डेटा व संचालन के नियंत्रण को मजबूत करना और नीति-निर्माताओं द्वारा स्वदेशी कंपनियों को प्रोत्साहन देना भविष्य के भारत के लिए अनिवार्य है। देश की आत्मनिर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा, डिजिटल स्वतंत्रता और आर्थिक मजबूती के लिए एक अपरिहार्य आवश्यकता है।
गूगल मैप्स और Mappls एप में अंतर

गूगल मैप्स और MapmyIndia एप में अंतर छोटे-छोटे नवाचार का है। उदाहरण के लिए, हाल ही में MapmyIndia ने बेंगलुरु में ट्रैफिक पुलिस के लिए एक नया फीचर लॉन्च किया। इसके तहत Mappls एप पर हर सिग्नल से 500 मीटर पहले यूजर देख सकता है कि सिग्नल रेड है या ग्रीन और अगला बदलाव कितने सेकंड में होगा। अब कई शहर इसमें अपनी रुचि दिखा रहे हैं। गूगल मैप में यह सुविधा नहीं है।
दूसरा, Mappls एप में फ्लाइओवर का थ्री-डी व्यू दिखता है। इसमें यूजर फ्लाइओवर का ऊपरी और निचला दृश्य स्पष्ट देख सकता है। एप बताता है कि कौन-सा रास्ता सही है। यह फीचर सुरक्षा की सोच से प्रेरित है और अभी तक गूगल में उपलब्ध नहीं है, इस कारण यूजर को अक्सर भ्रम होता है।
Mappls एप में तीसरा अनूठा फीचर है Mappls Pin, जो यूजर को सीधे गंतव्य तक पहुंचाता है। राकेश वर्मा बताते हैं, ‘‘हमारे मैप में ऐसी गलतियां नहीं होतीं जो जोखिम पैदा करें, जैसे टूटा पुल या गलत मार्ग दिखाना। सुरक्षा हमारे डिजाइन का मुख्य आधार है। हमने 20-25 वर्षों में कड़ी मेहनत से गली-मोहल्ले तक की सड़कों का डेटा मैप में अपडेट किया है। जैसे फोन का ऑपरेटिंग सिस्टम अपडेट होता है, वैसे ही हमारे मैप और तकनीक को भी नए बदलावों के अनुरूप अपडेट करना पड़ता है। जब भी नए फ्लाईओवर या सड़कें बनती हैं, Mappls उन्हें तुरंत जोड़ देता है। हमारा लक्ष्य है कि तकनीक और वास्तविकता के बीच का यह गैप न्यूनतम रहे ताकि हर यूजर को सटीक, तेज और सुरक्षित नेविगेशन अनुभव मिले।’’
Mappls एप में चौथा फीचर है सेफ्टी अलर्ट। यह फीचर गति सीमा, फ्यूल एवं ईवी चार्जिंग, सीसीटीवी कैमरों के अलावा सड़कों में गड्ढे, स्पीड ब्रेकर या अन्य खतरों की जानकारी पहले से देता है। ऐसी हाइपर लोकल सुविधाएं गूगल मैप में अभी सीमित हैं।
इसके अलावा, Mappls एप भारत के दूर-दराज इलाकों में भी बेहद विस्तार और सटीक डेटा प्रदान करता है। वहीं, गूगल मैप शहरी क्षेत्रों में कारगर है और ज्यादा सटीक व व्यापक ट्रैफिक अपडेट देता है। MapmyIndia NAVIC उपग्रह प्रणाली पर आधारित है, जबकि गूगल मैप Google Earth/Vision पर।

















