राजनीति में असहमति होना लोकतंत्र की सुंदरता है, लेकिन असम्मान की भाषा उसका पतन है। हाल के दिनों में पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष और लुधियाना से लोकसभा सांसद अमरिंदर सिंह राजा वडिंग द्वारा भारत के पूर्व गृह मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता स्वर्गीय बूटा सिंह के प्रति की गई टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस पार्टी आज न केवल जनसमर्थन में, बल्कि संस्कार और मर्यादा में भी दरिद्र होती जा रही है।
बूटा सिंह कोई साधारण नाम नहीं थे। वे उस पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने कांग्रेस की वैचारिक रीढ़ को मज़बूती दी और संगठन के लिए अपना जीवन समर्पित किया। पंजाब के गरीब और दलित समाज से निकलकर दिल्ली की सत्ता के शिखर तक पहुंचे। लेकिन दुख की बात यह है कि उसी पार्टी के एक प्रदेश अध्यक्ष ने अपने ही दिग्गज नेता की स्मृति को राजनीतिक लाभ के लिए मलीन करने का दुस्साहस किया है। उधर, पंजाब भाजपा ने इस मामले को लेकर राजा वड़िंग की शिकायत लोकसभा अध्यक्ष से करते हुए उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द करने की मांग करते हुए देश के गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले में दखल देने की अपील की है।
वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री तरूण चुघ ने भी कांग्रेसी सासंद व प्रदेश कांग्रेस प्रधान राजा वडिंग की इस अमर्यादित भाषा की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के चेयरमैन को लिखित में शिकायत भेज कर राजा वड़िंग के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने के लिए अपील की है। श्री चुघ ने कहा कि दलित समुदाय के खिलाफ कांग्रेस की मानसिकता किसी से छिपी हुई नहीं है लेकिन स्व. बूटा सिंह जो मजहबी सिख समाज के बड़े नेता थे उनके खिलाफ जब कोई चुना हुआ प्रतिनिधि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है तो कानूनी कार्रवाई जरूरी बन जाती है।
बूटा सिंह — संघर्ष, समर्पण और सादगी की मिसाल
स्व. बूटा सिंह का जीवन कांग्रेस की उस पुरानी परंपरा का प्रतीक था, जहाँ व्यक्ति नहीं, विचार सर्वोपरि हुआ करता था। वे इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक थे। 1980 के दशक में उन्होंने कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी निभाई — गृह मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, संचार मंत्रालय — और हर जगह अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया। 1984 के दंगों के बाद जब दिल्ली जल रही थी, बूटा सिंह जैसे नेताओं ने प्रशासनिक और सामाजिक संतुलन स्थापित करने में भूमिका निभाई। वे हमेशा दलित समाज के उत्थान और किसानों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रहे।
राजा वडिंग की टिप्पणी — अज्ञान और अहंकार का मिश्रण
पंजाब प्रदेश कांग्रेस के प्रधान व सांसद राजा वडिंग का हालिया बयान, जिसमें उन्होंने बूटा सिंह पर असंवेदनशील टिप्पणी की, कांग्रेस के वैचारिक दिवालियापन की गवाही देता है। कांग्रेस में वाणी पर संयम की जगह बेतुके भाषण, सोशल मीडिया की राजनीति और तात्कालिक सुर्खियों की भूख ने ले ली है। इससे पहले पंजाब के सीएम रहे चरनजीत सिंह चन्नी जो मौजूदा समय में जालंधर से लोकसभा सांसद हैं, ने एक सियासी रैली के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा की मौजूदगी में कहा था कि यूपी-बिहार के लोगों को पंजाब से बाहर निकालेंगे और पंजाब में घुसने नहीं देंगे और उस समय चन्नी के बयान पर प्रियंका गांधी ने ठहाके मारते हुए खूब तालियां बजाई थीं। उसके बाद अब कांग्रेसी सांसद व प्रदेश प्रधान का यह बयान भी तरनतारन में हो रहे विधानसभा उपचुनावों के दौरान एक सियासी मीटिंग के दौरान ही आया है।
कांग्रेस की संस्कृति में दरारें
एक समय था जब बूटा सिंह जैसे नेता दल के अनुशासन और शिष्टाचार का उदाहरण हुआ करते थे। आज की कांग्रेस उस अनुशासन से उतनी ही दूर जा चुकी है, जितनी उसकी राजनीति जनता से। वडिंग का बयान यही दर्शाता है कि पार्टी के भीतर न तो विचार की एकरूपता बची है, न नेतृत्व का आदर।
राजनीति की भाषा में गिरावट — लोकतंत्र के लिए खतरा
राजनीति में असहमति होना स्वाभाविक है, परन्तु भाषा का गिरना एक सभ्यता का पतन है। आज जब समाज पहले से ही विभाजनों और वैचारिक टकरावों से जूझ रहा है, ऐसे में वरिष्ठ नेताओं का अपमान राजनीतिक विमर्श को और अधिक विषैला बनाता है।हालांकि राजा वड़िंग द्वारा ऐसी अमर्यादित भाषा पहली बार इस्तेमाल नहीं की गई, इससे पहले भी वे चर्चा में आए हुए हैं। उन्होंने एक दर्जी से कपड़े सिलवाए थे लेकिन उसके पैसे नहीं दिए थे, जिस वजह से वो काफी चर्चा में रहे थे और उनकी काफी फज़ीहत हुई थी।
कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय
यह प्रकरण कांग्रेस नेतृत्व के लिए आत्ममंथन का अवसर है। क्या पार्टी में अब भी वह आंतरिक शालीनता बची है जिसके लिए वह जानी जाती थी ? क्या कांग्रेस अपने युवाओं को यह सिखा पा रही है कि राजनीति में केवल पद नहीं, बल्कि संस्कार भी मायने रखते हैं ?
एससी कमिशन पंजाब ने लिया सू-मोटो
उधर, राजा वडिंग के इस बयान के बाद पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आय़ोग द्वारा पंजाब कांग्रेस के प्रधान व लोकसभा सांसद राजा वडिंग को तलब किया है और उन्हें 6 नवंबर को लिखित जवाब सहित आयोग के सामने पेश होने के लिए कहा गया है। आयोग की ओर से उप-चुनाव के चलते वहां के चुनाव अधिकारी से भी सारे मामले की रिपोर्ट तलब की है। आयोग के पंजाब के चेयरमैन जसवीर सिंह गढ़ी ने बयान की निंदा करते हुए कहा कि नेता कोई भी हो अथवा कितने भी बड़े पद पर हो, उसे दलितों का अपमान करने का अधिकार नहीं है और जो भी ऐसा करेगा उसके खिलाफ नियम व कानून के तहत जो भी बनती होगी, वो कार्रवाई जरूर होगी।
इस मामले को लेकर पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग के समक्ष सहायक रिटर्निंग आफिसर कम नायब तहसीलदार पहुंचे लेकिन आयोग ने उनके जवाब पर असंतुष्टि जताते हुए कहा कि कांग्रेस सांसद राजा वडिंग को जिले की हद से बाहर तड़ी पार क्यों नहीं किया गया साथ ही आयोग की ओर से जिला रिटर्निंग आफिसर को 6 नवंबर को रूल बुक के साथ तलब किया गया है।
पंजाब कांग्रेस के नेताओं के मुंह पर भी लगे ताले, चन्नी ने भी साधी चुप्पी
इस पूरे प्रकरण पर पंजाब कांग्रेस के छोटे बड़े सभी नेताओं ने अपने मुंह बंद कर लिए हैं। यहां तक कि पंजाब कांग्रेस के दलित नेताओं ने भी राजा वड़िंग की इस अमर्यादित भाषा की ना तो खुलकर निंदा की और ना ही उनके खिलाफ किसी एक्शन की मांग की है। हाल ये है, पूर्व सीएम व सांसद चरनजीत सिंह चन्नी ने तो यहां तक कह दिया है कि राजा वडिंग ने अपनी बात के लिए माफी मांग ली है इसलिए उन्हें माफ कर देना चाहिए। सियासी माहिर कहते हैं, चन्नी का यह बयान मजबूरीवश दिया गया है चूंकि चन्नी के यूपी-बिहार के लोगों वाले बयान को जब प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार की एक चुनावी जनसभा में उठाया तो उसके बाद से चन्नी खुद पार्टी में बैकफुट पर हैं और उन्हें बिहार के स्टार प्रचारकों की सूची में भी नहीं रखा गया।

















