आज एक नवंबर यानि कि पंजाब दिवस है, साथ ही कुल सात राज्यों की पुर्नस्थापना का दिन भी, जिनमें पंजाब के अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्य-प्रदेश, केरल शामिल हैं, और इन सभी राज्यों का पुर्नस्थापना दिवस आज ही के दिन मनाया जाता है लेकिन पंजाब दिवस के खास मायने इसलिए हैं चूंकि पंजाब ने अपने आप को पाने के लिए सबसे ज्यादा गंवाया है। पंजाबी बोलते इलाके, पानी पर अपना अधिकार, अपनी भूमि, अपने लोग और ना जाने क्या क्या, लेकिन बावजूद इसके पंजाब के साथ सबसे ज्यादा भेदभाव किया जाता रहा है। देश में कांग्रेस की सरकारों के प्रधानमंत्री हों या फिर राज्य में कांग्रेस की सरकारों के मुख्यमंत्री हों, किसी ने भी पंजाब को अपना समझा ही नहीं और आज के हालात देखिए, पंजाब विकास की डगर पर दिन ब दिन पिछड़ता दिखाई दे रहा है। पंजाब यदि खड़ा है अथवा आगे बढ़ा है तो वो पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की वजह से जबकि पंजाब की मांगों को कभी तवज्जों दी ही नहीं गई और शायद आज भी यही वजह है कि बगावत के सबसे पहले स्वर यदि कहीं से उठते हैं तो वो पंजाब से ही उठते हैं।
कैसे कांग्रेसी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी फिर उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सहित कांग्रेस की सरकारों ने सदैव ही पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत के साथ धोखा व छलावा किया है, उसकी विस्तृत जानकारी दे रहे हैं पाञ्चजन्य के संवाददाता प्रमोद कौशल, आईए जानते हैं…
राजधानी तक से वंचित रखा पंजाब को
पंजाब जो कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहा, जो कि हर बार देश की रक्षा में सबसे आगे खड़ा रहा, उसे उसकी राजधानी तक से वंचित कर दिया गया। 1966 में पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के बाद चंडीगढ़ को पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी घोषित किया गया, लेकिन यह घोषणा अस्थायी मानी गई थी। तब यह कहा गया था कि हरियाणा के लिए एक नई राजधानी बनाई जाएगी और चंडीगढ़ को अंततः पंजाब को सौंप दिया जाएगा। लेकिन हुआ क्या? कांग्रेस की सरकारें वर्षों तक दिल्ली में रहीं, पंजाब में भी सत्ता में रहीं, हरियाणा में भी रही, लेकिन उन्होंने इस विषय को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
कांग्रेस ने पंजाब को लटकाया, अटकाया और भटकाया
इतिहास साक्षी है कि चंडीगढ़ पर पंजाब का दावा न केवल सांस्कृतिक, भाषाई और ऐतिहासिक रूप से न्यायोचित है, बल्कि यह संवैधानिक रूप से भी पुख्ता है। लेकिन कांग्रेस ने हर बार इस मुद्दे को लटकाया, अटकाया और भटकाया। जब-जब पंजाब ने चंडीगढ़ की मांग उठाई, कांग्रेस ने उसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। यही नहीं, कांग्रेस ने पंजाब के साथ अपने विश्वासघात को छिपाने के लिए कभी अकालियों को दोषी ठहराया, कभी सिख चरमपंथियों को और कभी-कभी भाजपा तक को भी निशाने पर लिया।
इंदिरा गांधी का विश्वासघात
29 जनवरी 1970 को जब भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संसद में यह घोषणा की कि चंडीगढ़ पंजाब को सौंपा जाएगा और इसके एवज में हरियाणा को नई राजधानी बनाने के लिए आर्थिक सहायता दी जाएगी, तो यह एक ऐतिहासिक क्षण था। न केवल देश की संसद में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे भारत सरकार की ओर से एक अंतिम निर्णय के रूप में प्रस्तुत किया गया। “द न्यू यॉर्क टाइम्स” ने 30 जनवरी 1970 को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में लिखा कि भारत सरकार ने चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने का निर्णय ले लिया है। रिपोर्टर सिडनी एच. शानबर्ग ने इस निर्णय को स्पष्ट रूप से अंतरराष्ट्रीय पाठकों तक पहुँचाया और यह निर्णय एक तरह से वैश्विक मंच पर भारत की घोषणा थी कि पंजाब को उसका हक मिल गया है।

लेकिन अगर यह निर्णय वास्तव में लागू हुआ होता, तो आज पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ होती और हरियाणा की कोई अलग राजधानी बन चुकी होती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके विपरीत, 1980 में जब इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आईं, तो उन्होंने एक नया ड्रामा रचा। इंदिरा गांधी की सरकार ने 10 साल बाद 30 दिसंबर 1980 को एक ऐसा कदम उठाया जो उनके 1970 के वादे के ठीक उलट था। उन्होंने फिल्लौर स्थित महाराजा रणजीत सिंह के किले में “रणजीतगढ़” नामक एक नई राजधानी बसाने की नींव रखी।
यह एक स्पष्ट प्रमाण है कि इंदिरा गांधी को स्वयं भी इस बात का भरोसा नहीं था कि चंडीगढ़ वास्तव में पंजाब को सौंपा जाएगा, वरना नई राजधानी बसाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। इस शिलान्यास को कांग्रेस की मीडिया ने बड़े पैमाने पर प्रचारित किया, मानो यह कोई पंजाब को न्याय दिलाने की दिशा में ठोस कदम हो। लेकिन आज, जब उस नींव पत्थर को देखा जाता है, जो आज भी पंजाब पुलिस अकादमी, फिल्लौर के गॉल्फ ग्राउंड में धूल फांकता पड़ा है, तो साफ होता है कि यह महज एक चुनावी नौटंकी थी। यह प्रतीक था एक और धोखे का। रणजीतगढ़ न कभी बना, न उसकी कोई फाइल आगे बढ़ी, न ही कोई बजट आवंटित हुआ। यह सिर्फ एक धोखे की इबारत बनकर रह गया।
पंजाबियों के साथ सबसे बड़ा छल
पंजाब के लोगों के साथ छल का सबसे बड़ा उदाहरण वह रणजीतगढ़ राजधानी योजना है, जिसकी शुरुआत खुद इंदिरा गांधी ने की थी। 30 दिसंबर 1980 की वह तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज है जब शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के किले के प्रांगण में खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पहुंचीं थीं। उन्होंने जनता के सामने भाषण दिया, बड़े-बड़े वादे किए और पंजाब को रणजीतगढ़ नामक एक नई राजधानी देने की घोषणा की। पूरे प्रांत में उम्मीद की लहर दौड़ गई थी कि अब चंडीगढ़ विवाद का हल निकल गया है, पंजाब को उसकी पहचान की राजधानी मिल जाएगी और चंडीगढ़ पंजाब के अधिकार में आ जाएगा।
लेकिन वह दिन सिर्फ एक दिखावा था। न वह भूमि अधिग्रहण हुआ, न मास्टर प्लान तैयार हुआ, न विधानसभा का भवन बना और न कोई सचिवालय। जो नींव पत्थर इंदिरा गांधी ने रखवाया, वह आज तक अकेला खड़ा है, जैसे कांग्रेस की वादाखिलाफी का स्मारक। कांग्रेस की पंजाब विरोधी राजनीति का यह प्रतीक सिर्फ इमारत की नींव नहीं बल्कि झूठी राजनीति की कब्र है। सबसे हैरानी की बात यह है कि उसके बाद भी कांग्रेस कई बार पंजाब में सत्ता में आई, फिल्लौर से सांसद और विधायक भी उसी पार्टी के होते रहे, लेकिन किसी ने रणजीतगढ़ का नाम तक नहीं लिया। कोई फाइल तक नहीं उठाई गई। जब-जब कांग्रेस को सत्ता की जरूरत पड़ी, वह पंजाबियों से बड़े वादे करती रही लेकिन जब सत्ता में आई, तो सब भुला दिया।
कांग्रेस का दोगलापन भी उजागर
कांग्रेस की नीयत कभी साफ नहीं थी। चंडीगढ़ को पंजाब से दूर रखने की नीति बनाई गई। कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं ने इसे जानबूझकर उलझाया। जब-जब पंजाब में कोई सरकार चंडीगढ़ को पाने की बात करती, केंद्र की कांग्रेस सरकार उस पर दबाव बनाती, फाइलें रोक देती, और सांप्रदायिकता का डर दिखाकर चुप करा देती। यहां तक कि कई बार पंजाब की मांगों को संविधान विरोधी कहकर खारिज कर दिया गया। यह कांग्रेस की दोहरी नीति का परिचायक था। कांग्रेस की इस नीति को यदि एक शब्द में वर्णित किया जाए तो वह शब्द है — “दोगलापन”। कांग्रेस ने न केवल पंजाब को चंडीगढ़ से वंचित रखा, बल्कि सिख समुदाय और पंजाबियों की भावनाओं को बार-बार ठेस पहुंचाई। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही पंजाब के शांतिपूर्ण आंदोलनों को क्रूरता से कुचला गया। 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद हुए सिखों का नरसंहार (कत्लेआम) कांग्रेस की उसी मानसिकता के परिणाम थे जिसमें राष्ट्रहित नहीं बल्कि सत्ता हित सर्वोपरि था।
राजीव गांधी ने भी दिया पंजाब को धोखा
1986 में राजीव गांधी के कार्यकाल में भी इसी तरह का आश्वासन दोहराया गया लेकिन हुआ कुछ नहीं। हर बार पंजाब को ठगा गया। 1984 में जब ब्लू स्टार हुआ और पंजाब जल उठा, तब कांग्रेस ने एक और छल किया। उन्होंने “पंजाब समझौता” नाम से अकाली नेताओं के साथ एक समझौता किया जिसमें चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपने की बात दोहराई गई। लेकिन जैसे ही हालात सामान्य हुए, कांग्रेस ने उस समझौते को भी रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। यह कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा था—वादा करो, माहौल शांत करो, फिर भूल जाओ।

चंडीगढ़ सिर्फ एक राजधानी नहीं है। यह पंजाब की अस्मिता, अधिकार और आत्म-सम्मान का प्रतीक है। इस पर बार-बार समझौता करवाना, इसका हिस्सा न देना और इसके बहाने पंजाब को राजनीतिक रूप से कमजोर करना कांग्रेस की हमेशा की नीति रही है। यदि कांग्रेस चाहती तो 1980 से 1990 के बीच जब वह केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर सत्ता में थी, तब यह मुद्दा हल हो चुका होता। लेकिन उसने जानबूझकर इसे उलझाया क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि पंजाब एक सशक्त और पूर्ण राज्य के रूप में अपनी पहचान बना सके।
रणजीतगढ़ की योजना-कांग्रेस का छलावा
अब बात करें रणजीतगढ़ योजना की—यह योजना भी कांग्रेस का केवल एक ‘डमी प्रोजेक्ट’ था। इंदिरा गांधी को पता था कि चंडीगढ़ विवाद के कारण पंजाब में उनकी सरकार की छवि खराब हो रही है। उन्होंने इस असंतोष को शांत करने के लिए एक प्रतीकात्मक कार्य किया। उन्होंने कागज़ी शिलान्यास कराया, जिससे यह संदेश जाए कि कांग्रेस पंजाब को उसकी राजधानी देने के लिए गंभीर है। लेकिन यह शिलान्यास केवल कैमरों के लिए था। असल में दिल्ली में बैठी कांग्रेस सरकार ने न तो कोई बजट पास किया, न कैबिनेट में प्रस्ताव लाया, न योजना आयोग से मंजूरी ली, न किसी विभाग को भूमि सर्वेक्षण का आदेश दिया। नतीजा यह कि रणजीतगढ़ योजना वहीं दफन हो गई जहाँ उसका नींव पत्थर रखा गया था।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो हमें स्पष्ट दिखाई देता है कि कांग्रेस की राजनीति पंजाब विरोधी थी और है। उन्होंने पंजाब को बार-बार धोखा दिया। पंजाब की नदियों का पानी बिना उचित मुआवज़ा दिए हरियाणा और राजस्थान को देने का मामला हो या फिर सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर का विवाद—हर बार कांग्रेस ने पंजाब के हितों को कुर्बान किया। यही नहीं, पंजाब में राष्ट्रपति शासन थोपकर लोकतंत्र की हत्या की गई, सिख नेताओं को जेल में डाला गया, निर्दोषों पर गोलियां चलाई गईं।
कांग्रेस की राजनीति सिर्फ सत्ता पाने की राजनीति थी, और इसके लिए उसने देश, राज्यों और खासकर पंजाब की कीमत पर भी समझौते किए। रणजीतगढ़ योजना इसका ज्वलंत उदाहरण है। आज जब पंजाब के युवा उस नींव पत्थर को देखते हैं तो उन्हें यह समझ आता है कि कैसे उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया गया। वे जानना चाहते हैं कि 1980 में रखी गई उस आधारशिला पर आज तक एक ईंट क्यों नहीं रखी गई। वे पूछते हैं कि जब कांग्रेस के नेता बार-बार सत्ता में आते रहे, तब उन्होंने इस पर चुप्पी क्यों साधी? इस प्रश्न का उत्तर सिर्फ एक है—क्योंकि कांग्रेस पंजाब के लिए नहीं बल्कि अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए सत्ता में आती थी।
कांग्रेस ने संवैधानिक वादों को तोड़ा, जिनमें 1970 में इंदिरा गांधी द्वारा लोकसभा में दिए गए उस बयान को भी रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि चंडीगढ़ को पंजाब को सौंपा जाएगा और हरियाणा को एक वैकल्पिक राजधानी दी जाएगी। उस वादे के साथ-साथ पंजाब के नेताओं को एक नोट भी सौंपा गया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने कभी उस वादे को लागू नहीं किया। उन्होंने जानबूझकर ऐसी स्थिति बनाई कि दोनों राज्यों के बीच टकराव बना रहे, और कांग्रेस को इसका राजनीतिक लाभ मिलता रहे।
The New York Times, दिनांक: शुक्रवार, 30 जनवरी 1970 में रिपोर्टर: सिडनी एच. शानबर्ग (Sydney H. Schanberg), “भारत ने विवादित चंडीगढ़ शहर को पंजाब राज्य को सौंपा” शीर्षक के तहत छापे इस लेख के माध्यम से अंतर-राष्ट्रीय मंच पर यह जानकारी साझा की गई थी कि चंडीगढ़, पंजाब को दे दिया गया है। इसके एवज में हरियाणा को करोड़ों रूपए दिए जाने की बात कही गई जिसकी आधी रकम अनुदान और आधी ऋण के रूप में दिए जाने की बात कही गई थी। यह लेख भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संसद में दिए गए वक्तव्य पर आधारित था।

इसमें यह भी दावा किया गया है कि हरियाणा अपनी राजधानी करनाल के निकट बनाएगा और इस सारी व्यवस्था के मुकम्मल होने तक पांच साल का समय दिया गया जबकि पंजाब के फिरोजपुर व अबोहर का इलाका भी हरियाणा को देने की बात कही गई थी। तब चंडीगढ़ के साथ लगते पंजाबी बोलते इलाके भी पंजाब को दिए जाने की बात हुई थी। अब सवाल यह है कि इंदिरा गांधी 1970 में सही थीं या फिर 1980 में चूंकि एक तरफ 1970 में उन्होंने चंडीगढ़ पंजाब को सौंपने की बात कही तो दूसरी तरफ 1980 में फिर रणजीतगढ़ का नींव पत्थर क्यों रखा य़ कांग्रेस पार्टी के नेता लोकसभा व विधानसभा के साथ साथ मंचों व मीडिया के माध्यम से पंजाब के हितैषी तो बनते हैं लेकिन वे इस हकीकत के बारे में कभी कुछ बोलेंगे ऐसी उम्मीद उनके से नामात्र ही है।
1984 के राजीव-लोंगोवाल समझौते में भी यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि चंडीगढ़ 26 जनवरी 1986 को पंजाब को सौंप दिया जाएगा। लेकिन कांग्रेस ने न केवल यह वादा तोड़ा, बल्कि पंजाब में फिर से अशांति फैलाई। पंजाब में जो हालात बिगड़े, उनमें कांग्रेस की दोहरी राजनीति ही मुख्य कारण रही। जब कोई सरकार पंजाब के पक्ष में बोलती, तो केंद्र में बैठी कांग्रेस उसे राष्ट्र विरोधी ठहराने लगती थी।
कांग्रेस की यह नीति सिर्फ पंजाब की भौगोलिक सीमाओं से नहीं जुड़ी थी, बल्कि यह पंजाब की अस्मिता, उसकी पहचान और आत्म-सम्मान पर आघात था। कांग्रेस ने बार-बार पंजाब को एक ऐसा राज्य माना जिसे ‘कंट्रोल’ करना जरूरी है, न कि सम्मान देना। यही कारण था कि पंजाब में केंद्र द्वारा भेजे गए राज्यपाल अक्सर ऐसे होते थे जिनका क्षेत्रीय समझ से कोई लेना-देना नहीं होता था, और जो केवल कांग्रेस हाईकमान के इशारों पर काम करते थे।
पंजाब के साथ भौतिक, मानसिक और राजनीतिक अन्याय
पंजाब के साथ अन्याय केवल भौतिक नहीं बल्कि मानसिक और राजनीतिक भी रहा है। कांग्रेस ने हर मोर्चे पर पंजाब को दबाने का प्रयास किया। रणजीतगढ़ योजना और चंडीगढ़ विवाद इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। कांग्रेस ने पंजाब के लोगों के विश्वास को बार-बार तोड़ा, उनकी भावनाओं का अपमान किया और उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक समझा।
कांग्रेस की पंजाब विरोधी मानसिकता सिर्फ प्रशासनिक या संवैधानिक निर्णयों तक सीमित नहीं रही, उसने भावनात्मक और धार्मिक स्तर पर भी पंजाब को गहरा आघात पहुँचाया। 1984 का ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद देशभर में फैले सिख विरोधी दंगे भारतीय राजनीति के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से हैं। इन दोनों घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि कांग्रेस सत्ता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती है—चाहे उसे अपने ही देश के नागरिकों पर टैंक चलवाने पड़ें या हजारों बेगुनाहों को जिंदा जलवाना पड़े।
कांग्रेसियों ने करवाया था सिख नरसंहार
30 नवंबर, जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई, तो पूरे देश में कांग्रेस नेताओं ने खुलकर सिखों का नरसंहार करवाया। दिल्ली, कानपुर, भागलपुर, रांची—हर जगह कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने संगठित ढंग से सिखों को जलाया, मारा, लूटा। खुद कांग्रेस के बड़े नेताओं जैसे सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर, कमलनाथ जैसे नाम खुलकर सामने आए लेकिन किसी को न्याय नहीं मिला। 1984 के दंगे कोई स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थे, वे कांग्रेस की अंदरूनी घृणा नीति का नतीजा थे। और इस नीतिगत हत्या के लिए आज तक कांग्रेस ने माफी नहीं मांगी। उल्टा यह कहा गया—”जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।” यह शब्द कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने कहे थे। क्या यही संवेदना थी उस पार्टी की, जो खुद को गांधी की विरासत कहती है?

पंजाब के सांसदों और कांग्रेस के नेताओं ने भी उस समय चुप्पी साध ली। जिन सांसदों को जनता ने चुना था, वे अपने धर्म और राज्य के अपमान पर भी कुछ नहीं बोले। संसद में सिख विरोधी हिंसा का विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी। कांग्रेस का डर, दबाव और राजनीतिक स्वार्थ इतने हावी थे कि पंजाब के प्रतिनिधि केवल दर्शक बनकर रह गए। उनकी चुप्पी कांग्रेस की साज़िश में एक मौन समर्थन बन गई।
यही कांग्रेस की नीति रही है—राज्यों को, विशेष रूप से पंजाब जैसे सशक्त राज्यों को, कमजोर बनाए रखना। उनकी राजनीति हमेशा से विभाजन और भावनात्मक शोषण पर टिकी रही है। जहां एक ओर पंजाब के साथ यह सुलूक हुआ, वहीं दूसरी ओर अन्य राज्यों में जाति, क्षेत्र, भाषा के नाम पर लोगों को बाँटकर कांग्रेस सत्ता का खेल खेलती रही। पंजाब को कभी उग्रवाद से, कभी खालिस्तान से, कभी नक्सलवाद से जोड़ा गया, ताकि उसकी मांगों को देशद्रोह ठहराया जा सके। कांग्रेस ने पूरे देश को यह यकीन दिलाने की कोशिश की कि पंजाब की बात करना = देशद्रोह करना। लेकिन असल में देशद्रोह वह था जो कांग्रेस ने खुद लोकतंत्र के खिलाफ किया।
इस पूरे परिदृश्य में यदि कोई संगठन या विचारधारा रही जिसने पंजाब के सम्मान, सुरक्षा और सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा की, तो वह था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसने पंजाब में सेवा कार्यों को बढ़ाया, हिन्दू-सिख एकता को मजबूत किया, और वह सामाजिक बुनियाद रखी जिस पर पंजाब खड़ा हो सका। जब कांग्रेस ने पंजाब में फूट डालने की कोशिश की, संघ ने एकता का संदेश दिया।
वहीं, भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, न केवल गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती पर विश्वस्तरीय आयोजन किए, बल्कि करतारपुर साहिब कॉरिडोर को खुलवाकर इतिहास में वह कार्य किया जिसे कांग्रेस दशकों तक लटकाती रही। मोदी सरकार ने पंजाबी, गुरुमुखी और सिख संस्कृति को राष्ट्रीय गौरव का हिस्सा बनाया, सिख श्रद्धालुओं को विदेशों से यात्रा में सुविधा दी, NRI सिखों के लिए OCI कार्ड नियमों में ढील दी, और 1984 के दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए SIT बनाई और दोषियों का सज़ा करवाई जा रही है ।
जब कांग्रेस अपने पुराने पापों पर परदा डालने की कोशिश कर रही थी, भाजपा ने खुले मंचों से 1984 के दोषियों को सज़ा दिलाने का वादा किया और उस दिशा में कार्य भी किया। भाजपा सरकारों ने न केवल पंजाब की धार्मिक पहचान को सम्मान दिया, बल्कि उसकी आर्थिक रीढ़ को भी मज़बूत किया।
आपातकाल
वहीं, इन दिनों आपातकाल की चर्चा हो रही है, होनी भी चाहिए क्योंकि इस आपातकाल की घोषणा को पचास वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन उन पचास वर्षों के बाद भी आपातकाल के जख्म इस देश के लोकतंत्र के जिस्म पर अब भी हरे के हरे हैं। उस समय देश के नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई थी, मीडिया पर सेंसरशिप थोप दी गई थी, न्यायपालिका को कठपुतली बना दिया गया था और लाखों देशवासियों को केवल इसीलिए जेल में डाल दिया गया था क्योंकि वे सत्ता की निरंकुशता के खिलाफ खड़े थे। यह वही समय था जब देश की सत्ता पर बैठी एक महिला ने संविधान को बंधक बनाकर अपने राजनीतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए सम्पूर्ण लोकतंत्र को तहस-नहस कर दिया। इस महिला का नाम था इंदिरा गांधी—जिसे उस दौर के अनेक बुद्धिजीवियों ने भारत की हिटलर तक कहा।
इंदिरा गांधी ने सत्ता की भूख के लिए 1975 में जो आपातकाल थोपा था, वह महज़ एक घटना नहीं बल्कि एक मानसिकता का प्रतिबिंब था। यह मानसिकता सत्ता को परमेश्वर मानती है और राष्ट्र की जनता को केवल वोट बैंक। इसी मानसिकता के तहत पंजाब जैसे राष्ट्रवादी राज्य के साथ भी निरंतर छल किया गया। यह कोई संयोग नहीं था कि चंडीगढ़ जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कांग्रेस ने पंजाब को लगातार धोखा दिया। न तो वह आपातकाल के समय लोकतांत्रिक भावनाओं का सम्मान कर सकी और न ही वह पंजाब की वैध, न्यायसंगत और ऐतिहासिक मांगों का आदर कर सकी।

















