राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ग्वालियर में पहले प्रचारक नारायण राव तर्ते आये थे। उन्हीं के प्रयासों से अप्रैल 1938 में जीवाजीगंज स्थित पोतनीस की धर्मशाला में नियमित रूप से संघ शाखा प्रारंभ हुई थी। महानगर की पहली शाखा में जाने वाले प्रमुख स्वयंसेवक थे माधवराव वाघ, श्रीकृष्ण कान्हेरे, माधव केलकर, श्रीधर गोपाल कुंटे, दत्तात्रय कल्याणकर, दिगम्बर सोहनी, नरहरि सोहनी, राव साहब पाटील, कृष्णराव भट्ट, सदाशिवराव भिड़े, श्रीरंग हरि गोखले, बापूनाना परांजपे।
इस शाखा में जब स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ गई तो पोतनीस साहब की धर्मशाला का प्रांगण छोटा पड़ने लगा। लक्ष्मीगंज में सातभाई की गोठ में अखाड़े के साथ-साथ एक बड़ा मैदान था, उसे संघ की शाखा के लिए उपयुक्त मानकर वहां शाखा लगाई जाने लगी। संघ का कार्य पूरे क्षेत्र में विस्तार पाने लगा। नगर में संघ की अनेक उपशाखाएं प्रारंभ हो गई थीं। जिनमें लक्ष्मीगंज की केन्द्रीय शाखा के अलावा महारूद्र मण्डल, शिन्दे की छावनी की टेकड़ी शाखा, मुरार, बिरलानगर व ग्वालियर उपनगर की शाखा भी थी। उन दिनों शाखा में ग्वालियर नगर की उपस्थिति 400 तक नित्य रहने लगी थी। सभी उत्सव, शिविर आदि विधिवत आयोजित होते थे। विजयादशमी पर संचलन पूर्ण गणवेश में निकलने लगे थे। जिनकी उपस्थिति 250 तक रहती थी। शीत शिविर व वन संचार के कार्यक्रम होना प्रारंभ हो गये थे।
इसके बाद नारायण राव तर्टे ने आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करना शुरू किया। भिंड, मुरैना, शिवपुरी, गुना आदि स्थानों पर भी प्रवास करने व इन क्षेत्रों में भी संघ की शाखा प्रारंभ करने में सफलता प्राप्त की। इस बीच ग्वालियर नगर से संघ कार्यकर्ता संघकार्य हेतु अपना घर छोड़कर विभिन्न क्षेत्रों में कार्य विस्तार हेतु निकलने लगे थे। कार्य को विस्तार और उसे सुदृढ़ आधार देते हुए श्री तर्टे 1937 से सन् 1943 तक ग्वालियर में प्रचारक के नाते रहे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इसी काल में स्वयंसेवक बने। 1943 में श्री तर्टे को उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में संघकार्य हेतु भेजा गया और उनके स्थान पर उत्तर प्रदेश से ही एक प्रचारक प्र.ग. सहस्त्रबुद्धे (भैयाजी) को ग्वालियर में नियुक्त किया गया।
उपनगर ग्वालियर में लश्कर से जाते थे गोपाल टेम्बे
उपनगर ग्वालियर की शाखा गोपाल गणेश टेम्बे ने प्रारंभ की थी। वहां की सबसे पहली शाखा नौमहला मोहल्ले में चऊआमल की बगीची में लगती थी। श्री टेम्बे लश्कर से नित्य वहां शाखा लगाने जाते थे। उनके पास न तो स्वयं की साइकिल थी और न ही वाहन से जाने के लिये आवश्यक धन, पर शाखा लगाने तो जाना ही था। अत: रोज ही किसी ऐसे स्वयंसेवक को तैयार करना पड़ता, जिसके पास साइकिल हो और वह इनको ले जा सके। ग्वालियर उपनगर में पहली बार शाखा जाने वालों में नंदलाल कटारे, राधेलाल चतुर्वेदी, बाबूलाल रस्तोगी, काशी नरेश के वंश का साहसी बालक दर्शन सिंह आदि शामिल थे।
डबरा में 1940 में लगी पहली शाखा
ग्वालियर से लगे डबरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा 1940 में लगाई गई। यहां भी प्रारंभिक प्रयास ग्वालियर के प्रचारक नारायणराव तर्ते ने किए। उसके बाद उज्जैन से निकले प्रचारक शारदा शंकर व्यास डबरा आए और डबरा के भीखाराम गुप्ता के माध्यम से समाज के बीच जाकर संपर्क किया और संघ के बारे में बताया। भीखाराम गुप्ता डबरा की पहली शाखा के स्वयंसेवक बताए जाते हैं। डबरा नगर एवं भितरवार, चीनौर, आंतरी, पिछोर खंड में बांटा गया है।
डॉक्टर हेडगेवार के आदेश पर पांच रुपए लेकर ग्वालियर आये थे तर्ते
तर्ते जी का ग्वालियर में प्रचारक बनकर आने की कहानी भी बड़ी प्रेरक और रोचक है। ख्यात पत्रकार रमेश पतंगे जी की पुस्तक में उनका जिक्र आता है। हुआ यूं कि तर्ते जी महाराष्ट्र के अकोला जिले में रहते थे उनके मन में संघ कार्य के लिए बाहर जाने का संकल्प आया। एक दिन वह अकोला के संघचालक के पास गए और अपनी यह इच्छा जताई, लेकिन संघचालक ने मन में यह सोचकर उन्हें उस दिन मना कर दिया कि यह मैट्रिक पास सीधा साधा सा लड़का बाहर जाकर क्या संघ कार्य करेगा। तर्ते जी का संकल्प प्रबल और अडिग था इसलिए वे अकोला से सीधे नागपुर में डॉ हेडगेवार जी के पास चले गए। डॉ साहब ने उनकी प्रबल इच्छा शक्ति को भांपते हुए अपने हाथ से लिखी प्रार्थना और प्रतिज्ञा संघ के वैचारिक अधिष्ठान के रूप में दिए । साथ में प्रवास व्यय के लिए 5 रुपये भी दे दिए, और कहा कि तुम ग्वालियर जाओ। नारायण राव ट्रेन में बैठकर सीधे ग्वालियर आ गए। इससे पहले उन्होंने ग्वालियर का नाम भी शायद ही सुना था। डॉक्टर साहब के आदेश पर आए नारायण राव जी ने बाद में ग्वालियर में संघ की जो नींव रखी वह आज सबके समक्ष है।
















