ओआईसी (आर्गेनाइजेशन आफ इस्लामिक कोआपरेशन) ने एक बयान जारी किया है। उसने यह बयान 27 अक्तूबर के दिन पाकिस्तान द्वारा हर साल कश्मीर के नाम पर ‘ब्लैक डे’ के मातम में बुक्के फाड़कर घड़ियाली आंसू बहाने की याद में दिया गया। इस संगठन में चूंकि सभी सदस्य देश मुस्लिम हैं इसलिए मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर मजहबी मुद्दों पर तथ्यों को अनदेखा करके एक स्वर में राग अलापने लगते हैं। ये रस्मी तौर पर एक बयान जारी कर देते हैं और संदर्भित देश के कलेजे को ठंडक पहुंचा देते हैं। इस बार जिन्ना के देश के मातम के दिन यानी ‘ब्लैक डे’ को लेकर संगठन ने अपने बयान में कहा है कि ‘भारत को जम्मू-कश्मीर पर अवैध कब्जा किए 78 साल हो गए हैं। हम कश्मीर के लोगों के जनमत के अधिकार के साथ खड़े हैं।’ ओआईसी ने यह बयान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का हवाला देकर ‘कश्मीरी अवाम’ के ‘मानवाधिकारों की वकालत’ करते हुए दिया है। ओआईसी पहले भी इसी तरह के बयान देता रहा है और खासतौर पर, पाकिस्तान के दबाव में उसके सुर भारत विरोधी ही रहे हैं।

ओआईसी की कश्मीर मुद्दे पर जब भी कोई इस जैसी आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, तो वह अधिकतर पाकिस्तान के नेतृत्व में मुस्लिम देशों के एजेंडे का प्रतिनिधित्व करती दिखती है। इसकी बैठकें, संपर्क समूह और प्रस्ताव पाकिस्तान की पहल पर कश्मीरियों के तथाकथित अधिकारों को लेकर दोहराए गए समर्थन से प्रभावित रहे हैं। उदाहरण के लिए, 23 सितंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान ओआईसी की एक बैठक हुई थी जिसमें अजरबैजान, तुर्किए, सऊदी अरब और नाइजर के साथ मिलकर पाकिस्तान ने कश्मीर में ‘जनमत के अधिकार’ की वकालत की थी।
पाकिस्तान खुले तौर पर ओआईसी मंच का दुरुपयोग करते हुए अपने कश्मीर एजेंडे को इंटरनेशनल फोरम पर उभारने की कोशिशें ही की हैं और हर बार वह इसमें नाकाम रहा है। इसके चलते, ओआईसी के अधिकांश बयान भारत के खिलाफ होते हैं और उनमें ‘अवैध कब्जा’ और ‘संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन’ जैसे शब्दों का खुलकर उपयोग किया जाता है।

पाकिस्तान के संदर्भ में यह हर साल, खासतौर पर 27 अक्तूबर को भारत के खिलाफ ऐसे ही आरोप दोहराता रहा है। 2022 में भी ओआईसी ने बयान जारी कर भारत पर कश्मीर के कथित ‘अवैध कब्जे’ के 75 साल पूरे होने पर ‘कड़ी टिप्पणी’ की थी। 2024 और 2025 में भी उसके बयान ज्यादा नहीं बदले। बेशक, इसमें पाकिस्तान की पहल रहती है और मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के पुराने प्रस्तावों के हवाले से ही उछालने की कोशिश की जाती है।
ओआईसी में सऊदी अरब और उसके सहयोगियों का दबदबा है, लेकिन कश्मीर मुद्दे पर संगठन आमतौर पर पाकिस्तान की अगुआई में ही बयान जारी करता रहा है। अन्य मुद्दों, जैसे अफगानिस्तान या चीन के मुसलमानों के विषय में यही ओआईसी मौन धारण कर लेता है यानी उसके बयान भी ‘सेलेक्टिव’ विषयों पर ही आते हैं। चीन या अफगानिस्तान के संदर्भ में मुंह खोलने की इस इस्लामी संगठन की जुर्रत नहीं होती।
ओआईसी की सोच कश्मीर मुद्दे पर लगभग स्थिर रही है। पाकिस्तान के इशारे पर ‘जनमत के अधिकार’ के समर्थन से लेकर भारत के खिलाफ सार्वजनिक आलोचना तक इस संगठन द्वारा की गई है। हालांकि संगठन ‘मौलिक मानवाधिकारों’ की बात करता है, मगर बाकी विवादित मुस्लिम मुद्दों पर उसकी आवाज उतनी मुखर नहीं होती। उसकी रणनीति मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को दबाव में लाने की रहती है, लेकिन कई सदस्य देशों के राष्ट्रीय हितों के आगे यह प्रचार सीमित ही रहता है।
भारत ने हमेशा ओआईसी के ऐसे बयानों को खारिज किया है और साफ कहा है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, और रहेगा। ओआईसी के पास भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर अधिकृत रूप से बयान दे चुके हैं कि कश्मीर मुद्दे में विषय अब बस पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर को शेष जम्मू कश्मीर से मिलाने भर का है।

















