भारत के पड़ोसी जिन्ना के देश के प्रधानमंत्री इन दिनों खाड़ी देशों में ज्यादा ही जा रहे हैं। पिछले दिनों पाकिस्तान-सऊदी अरब के बीच ‘नॉटो’ की नकल बताए गए चर्चित रक्षा समझौते के बाद से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ही नहीं, मंत्री भी बल्लियों उछलकर बहकी—बहकी बातें कर रहे हैं। पाकिस्तान और सऊदी अरब संबंधों में एक नया आयाम फिर से जुड़ा जब प्रिंस सलमान ने जिन्ना के कंगाल देश के भीख के कटोरे को भरते हुए अरबों रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणाएं कीं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ यूं तो रियाद में 9वें फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव (FII) सम्मेलन में भाग लेने गए हुए हैं, लेकिन भू-राजनीतिक समीकरणों को भुनाने के लिए चंदे का कटोरा और दिखाने को एक प्रतिनिधिमंडल साथ ले गए हैं।
सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान जानते हैं कि पाकिस्तान कंगाल है, इसलिए थोड़ा पैसा फैंको तो इस वफादार बनाया जा सकता है। यह अलग बात है कि इस्लामवादी पाकिस्तान खुद अपना ही वफादार नहीं माना जाता। शाहबाज शरीफ के गिड़गिड़ाने पर सऊदी अरब द्वारा अरबों रुपए की सहायता या निवेश की घोषणा करना फिलहाल पाकिस्तान के हौंसले भले ‘बुलंद’ कर दे, लेकिन यह पैसा लौटाने या निवेश को सही जगह लगाने की अक्ल न पाकिस्तान में पहले थी, न अब है।
पाकिस्तान लंबे समय से विदेशी ऋण, मुद्रा संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की कठोर शर्तों से राहत पाने के उद्देश्य से पाकिस्तान निरंतर सऊदी अरब, चीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के आगे भीख का कटोरा सरकाता रहा है। कंगाल पाकिस्तान की असल स्थिति यही है।
सऊदी अरब की ओर से जिन्ना के देश को दी जाने वाली यह आर्थिक सहायता किसी भावना की वजह से नहीं, बल्कि रणनीतिक निवेश ही कही जाएगी। सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान विजन—2030 के तहत सऊदी अर्थव्यवस्था की तेल पर निर्भरता से इतर जाना चाहते हैं। इसके लिए वे क्षेत्र में साझेदारी को प्राथमिकता दे रहे हैं। पाकिस्तान अपने भूगोल की वजह से न चाहते हुए भी सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है, इसलिए वह सऊदी अरब के इस विजन में एक सहयोगी भूमिका निभा सकता है। रक्षा, ऊर्जा, खनन और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्र सऊदी निवेश को आकर्षित कर सकते हैं।

पाकिस्तान और सऊदी अरब के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजहबी बुनियाद पर टिके हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच दूरियां भी देखने को मिली थीं, विशेषकर 2019-2020 के दौरान जब पाकिस्तान ने मलेशिया और तुर्की के साथ मिलकर एक इस्लामी सम्मेलन का समर्थन किया था। यह रियाद ने पसंद नहीं आया था।
दूसरी ओर, सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान रक्षा सहयोग में एक साझेदार रहा है। पाकिस्तान की सेना और सऊदी शाही परिवार के बीच दशकों से गहरे संबंध रहे हैं। सऊदी अरब पाकिस्तान को न केवल सैन्य प्रशिक्षण देता रहा है, बल्कि कई बार आर्थिक संकट से भी उबारता आया है। इस बार भी सऊदी निवेश रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में ही अधिक होने की संभावना है।
आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान की स्थिति जर्जर बनी ही हुई है। उसके विदेशी मुद्रा भंडार सीमित हैं, रुपया डूब रहा है और मुद्रास्फीति जनता को पीसे डाल रही है। ऐसी परिस्थिति में सऊदी आर्थिक सहायता एक तात्कालिक राहत तो दे ही सकती है, लेकिन यह कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं है। यदि पाकिस्तान लगातार इसी तरह बाहरी सहायता पर निर्भर रहता है, तो उसकी आर्थिक नीति स्वतंत्र नहीं रह जाएगी। सऊदी अरब जैसी दमदार अर्थव्यवस्थाएं फिर पाकिस्तान की नीतियों को अपने हितों के अनुरूप घुमाने की स्थिति में होंगी।
राजनीतिक संदर्भ में बात करें तो शाहबाज शरीफ और उनकी सरकार इस यात्रा को बेशक एक ‘कूटनीतिक उपलब्धि’ के रूप में दिखाएगी। उन्हें घरेलू स्तर पर यह दिखाना एक मजबूरी है कि वे आर्थिक संकट से उबरने की दिशा में ‘ठोस कदम’ उठा रहे हैं। लेकिन सतर्क विपक्ष सरकार को यह कहकर फिर से घेरेगा कि ‘देश भीख पर चलाया जा रहा है।’
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य की बात करें तो शरीफ की यह सऊदी अरब यात्रा भारत और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते संबंधों की पृष्ठभूमि में भी देखी जा सकती है। सऊदी अरब भारत में तेजी से बढ़ते तकनीकी और ऊर्जा निवेश का बड़ा साझीदार बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रिंस सलमान के बीच मधुर संबंध सऊदी-भारत साझेदारी को नए स्तर पर ले गए हैं। ऐसे में पाकिस्तान चाहता है कि वह इस साझेदारी की छाया में पूरी तरह खो न जाए। शाहबाज शरीफ की यह यात्रा इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है ताकि पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए एक वैकल्पिक सामरिक साझेदार बना रहे।
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगभग सात दशकों से बाहरी ऋण, विदेशी सहायता और प्रवासी आय पर निर्भर बनी हुई है। खासतौर पर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और चीन जैसे देशों से प्राप्त आर्थिक सहायता उसकी वित्तीय स्थिरता का अस्थायी सहारा रही है।पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा लघु अवधि के ऋण, अनुदान, और विदेशी जमा पर आधारित है। इससे उसकी वित्तीय संप्रभुता अक्सर बाहरी शक्तियों की नीतियों पर निर्भर हो जाती है। उदाहरण के लिए, 2018 से 2023 के बीच पाकिस्तान को सऊदी अरब से प्रत्यक्ष सहायता, मुफ्त तेल आपूर्ति, और मुद्रा स्वैप के रूप में सहायता मिली, जिसने IMF की सख्त शर्तों से अस्थायी राहत प्रदान की।

















