गत दिनों इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर दो दिवसीय ‘समग्र संघ साहित्य परिचर्चा’ आयोजित की गई। कुल चार सत्रों में संपन्न इस परिचर्चा में 32 साहित्यकारों, प्राध्यापकों एवं शोधार्थियों ने भारतबोध, राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, हिंदुत्व, एकात्ममानव दर्शन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, डॉ. हेडगेवार, कार्यकर्ता निर्माण, संघ और स्वतंत्रता आंदोलन, संघ और भारत विभाजन, संघ और सामाजिक समरसता, पर्यावरण, कुटुंब व्यवस्था, नारीशक्ति, शिक्षा, संघ गीत सहित अनेक विषयों से संबंधित संघ विचारकों द्वारा लिखित पुस्तकों का सार प्रस्तुत किया।
परिचर्चा के दौरान सुरुचि प्रकाशन द्वारा पुस्तक-प्रदर्शनी भी लगाई गई। परिचर्चा के उद्घाटन-सत्र की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने विरोधियों को अनेक बार क्षमा किया है, परंतु राष्ट्र विरोधियों को कभी क्षमा नहीं किया। मुख्य अतिथि और केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के पूर्व कुलाधिपति डॉ. बलवंत जानी ने कहा कि संघ भारतीय परंपरा का संवाहक है।
विशिष्ट अतिथि के नाते सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली ने कहा कि संघ को ऐसे लोगों ने गढ़ा है जो रुके नहीं, टूटे नहीं, झुके नहीं और बिके नहीं। कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष डॉ. अवनिजेश अवस्थी ने कहा कि संघ के बारे में प्रामाणिक जानकारी लोगों तक पहुंचे, इसलिए हमने समग्र संघ साहित्य परिचर्चा का आयोजन किया। परिचर्चा के समारोपण सत्र में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री मनोज कुमार ने कहा कि संघ ने ऐसे लोग तैयार किए जिन्होंने देश के लिए प्राण देने पड़े तो प्राण दिए, नहीं तो देश के लिए जिए।












