तकनीक में तरक्की के साथ छापेखानों और उनकी मशीनों में भी नित नए सुधार होते गए हैं। कभी लेटरप्रेस पर कागज छपता था, फिर दोरंगा छापने की मशीनें आई, उसके बाद एक साथ चौरंगी छपाई की तेज रफ्तार मशीनों ने छापेखानों की गति में आशातीत तेजी लाने का काम किया। देखते ही देखते मिनट भर में लाखों की संख्या में कागज छपने लगे। इस सुघड़ता के पीछे जो उपकरण और यंत्र लगाए गए हैं, वे भी अपनी ही तरह की देखभाल चाहते हैं। सूत बराबर का संतुलन डिगना मतलब छपाई की सीध हिलना, यानी स्याही का सूत से इतर भागना और छपाई चौपट होना।
श्री देवेन्द्र कुमार गर्ग ने 1985 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर नाजुक मिजाज मशीनों की सधी मरम्मत में अपने को झोंक दिया। दिन-रात की साध और जतन से काम के चलते उनका नाम मशीनों के जादूगर के नाते जाना जाने लगा। और आज, देवेन्द्र जी ग्रेटर नोएडा के सूरजपुर गांंव में लगभग 17 करोड़ रु. सालाना का कारोबार कर रही कंपनी के मालिक हैं। 2010 में यहां स्थापित हुई इस कंपनी का नाम है ‘मल्टी हाईटेक प्राइवेट लिमिटेड’ और इसमें करीब 60 कामगार गुणवत्तापूर्ण उत्पाद बनाने में रत हैं।

देवेन्द्र जी बताते हैं, बोतलों आदि पैकेजिंग पर जो लेबल लगते हैं, उन पर छपाई एक खास तरह के मैग्नेटिक सिलेंडर लगी मशीन से की जाती है। फैशन, मद्य और फार्मा उद्योगों में ये लेबल अधिक प्रयोग होते हैं। इन लेबलों को छापने वाली मशीनों में सूक्ष्म नाप के रोलर होते हैं। इन्हें कहते हैं ‘नेरौ वेब टूलिंग’, जो होते हैं प्रिंट और मैग्नेटिक सिलेंडर। इनका अगर सूत के सौवें भाग बराबर भी नाप गड़बड़ा जाए तो बहुत कम चौड़े लेबल मशीन पर डगमगा जाएंगे और काम बिगड़ जाएगा। देवेन्द्र जी की कंपनी के बने सूक्ष्म नाप के रोलरों की अपनी ही धूम है इस कारोबार में। वे बताते हैं,’भारत में रोलरों की खपत अगर 100 मान लें तो इसमें से 50 आज भी विदेश से आते हैं, बचे 50 में से 40 हम देश को उपलब्ध कराते हैं। बढ़ती मांग को देखते हुए काम और बढ़ाना है। जल्दी ही वह दिन भी आएगा जब बाकी के 50 रोलर की मांग भी यहीं पूरी करेंगे।’ यह बड़ी उपलब्धि है एक मायने में। अब देवेंन्द्र जी के सहयोग के लिए उनके दोनों पुत्र वैभव और सिद्धांत भी दिन-रात जुटे रहते हैं। दोनों युवा हैं इसलिए काम को और व्याप देने को तैयार हैं।

















