बिहार का जंगल राज से सुशासन तक का सफर: 20 सालों में अपराध पर काबू, विकास की नई दिशा
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बिहार का जंगल राज से सुशासन तक का सफर: 20 सालों में अपराध पर काबू, विकास की नई दिशा

बिहार में 1990-2005 के जंगल राज से मुक्ति को 20 साल हो चुके हैं। लालू राज के अपराध-हिंसा के दौर से नीतीश-मोदी की डबल इंजन सरकार ने हत्याओं में 20% कमी, डकैती-फिरौती में 80% गिरावट लाई। माओवाद समाप्ति और घुसपैठ पर सख्ती से विकास की राह।

Written byमनोज रघुवंशीमनोज रघुवंशी — edited by कुलदीप सिंह
Oct 26, 2025, 08:20 am IST
in विश्लेषण, बिहार
Bihar Jangalraj

प्रतीकात्मक तस्वीर

बिहार में 1990 से 2005 के “जंगल राज” के ग्रहण से मुक्ति मिले 20 हुए साल हो गए हैं। बदलाव ये आया है कि सन् 2005 से 2024 तक हत्या की वारदातों में 20 प्रतिशत की कमी आयी है। डकैती और फ़िरौती के अपराध 80 प्रतिशत घटे हैं। अपहरण का फैला हुआ उद्योग बंद हुआ है। लूट-पाट पर काबू पा लिया गया है।

बिहार में लाल राज-जंगलराज

लालू राज के दौरान लोग डरे हुए थे। अपराधियों से भी और जातिवादी हिंसा से भी। पुलिस का साइरन आश्वस्त करने के बजाये दिल की धड़कने बढ़ा देता था। अपराधियों को मिली हुई नेताओं की मौन स्वीकृति पुलिस की लाचारी का कारण थी। मोहम्मद शहाबुद्दीन जैसे माफ़िया डॉन सरे आम हथियारों के साथ अपनी निजी फ़ौज ले कर मंडराते थे। जिस शहाबुद्दीन पर 75 आपराधिक मुकद्दमे थे, जिन में ट्रिपल मर्डर शामिल था, और जिस सरगना को दो सज़ाएं हो चुकी थीं, उस का सामना करने में पुलिस भी डरी हुई थी, तो आम आदमी तो सहम ही जायेगा।

वो एक भयावह माहौल था जिस में अपराध के तार सीधे मुख्यमंत्री आवास तक पहुँचते थे। लालू यादव खुद ही अपराधी निकले और जेल गए। उस गुंडाराज में लोग दहशत के मारे शाम पांच बजे के बाद घर से नहीं निकलते थे। अपहरणकर्ताओं की मौज थी। फ़िरौती की रकम दो करोड़ से पांच करोड़ तक होती थी।

मोदी-नीतीश की डबल इंजन की सरकार में हालात बदले

नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की डबल इंजन सरकार में नरसंहारों का दौर इतिहास बन चुका है। पुरानी पीढ़ी नयी पीढ़ी को आज भी बताती है सन् 1981 के दंगों के बारे, में और 1998 और 2000 के नृशंस जनसंहार के बारे में। पिछले 10 साल से प्रदेश में कोई सामूहिक संहार नहीं हुआ है। वर्तमान सरकार को “सुशासन” की संज्ञा देने वालों के सामने सब से बड़ा तथ्य ये है कि पिछले 20 साल से नीतीश कुमार लगातार चुनाव जीत रहे हैं। और इस चुनाव में भी मोदी-नीतीश का ऍन. डी. ऐ., राजद-कांग्रेस वग़ैरह के महागठबंधन से बहुत आगे है। युवा वोटरों को सीधा तजुर्बा तो नहीं है कि जंगल राज कैसा था, लेकिन अपने घर के बड़े बुज़ुर्गों और मीडिया के ज़रिये वो लालू राज के समय की हक़ीक़त बख़ूबी जानते हैं।

जंगलराज 2.0 से बचने की जरूरत

सोशल मीडिया में इस बात का भी प्रभाव है कि कानून व्यवस्था इतनी सुधर गयी है कि बिहार का चुनाव छह या सात चरणों में न हो कर केवल दो चरणों में हो रहा है। अधिकतर लोगों का मन है कि एक जंगल राज बीत गया, काफ़ी है; अब जंगल राज 2.0 न हो तो अच्छा।सुरक्षित वातावरण में बड़ी हुई पीढ़ी भी विनाश और विकास के बीच अंतर करना जानती है। रंगदारी, हत्या, फ़िरौती और अपहरण जब एक उद्योग के रूप में फल-फूल रहे थे तब सब से ज़्यादा आक्रांत थीं महिलाएं, और गरीब, दलित और महा-पिछड़े वर्ग। विकास के लिए कानून व्यवस्था का बहाल होना अनिवार्य था।

जंगलराज में खुशहाल थे माओवादी

लालू के शासनकाल में माओवादी आतंकवाद का बोलबाला था। माओवाद से प्रभावित बिहार के डेढ़ दर्जन से ज़्यादा ज़िलों में शाम को तो क्या, लोग दिनदहाड़े भी घर से बाहर नहीं निकल पाते थे। पुलिस की बेरुखी देख कर लोग न्याय की उम्मीद छोड़ देते थे। सैकड़ों लोग माओवादी आतंक के शिकार हुए। लेकिन कोई उपचार नहीं मिल पा रहा था।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद केंद्रीय सरकार के सतत प्रयास के कारण माओवादियों की कमर टूट गयी है। लोग केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की बात को भरोसे की नज़र से देख रहे हैं, कि 31 मार्च, सन् 2026 तक, हथियारबंद माओवाद सिर्फ बिहार में नहीं, पूरे देश में जड़ से समाप्त हो जायेगा।

सोशल मीडिया पर ये बात गूँज रही है कि बिहार में मतदाता सूची के शुद्धिकरण के बाद ऍन. डी. ऐ. की नयी सरकार आते ही ग़ैरकानूनी मुस्लिम घुसपैठियों को चुन-चुन कर देश के बाहर भगाया जायेगा। ये घुसपैठिये प्रदेश के युवाओं की नौकरी और गरीबों का राशन हड़प रहे हैं। ये घुसपैठिये देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होते हैं, और शहाबुद्दीन जैसे माफ़िया सरगनाहों का समर्थन करते हैं।

बिहार में जंगल राज के दौरान उद्यमी और सफल व्यवसायी डर के मारे प्रदेश छोड़ रहे थे। सत्ता परिवर्तन के बाद, अनुकूल वातावरण के कारण, ये ट्रेंड पलट गया है। मतलब ज़्यादा रोज़गार और अधिक आर्थिक खुशहाली। जंगल राज के सन्दर्भ में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का एक वचन लोगों के दिमाग में कौंध रहा है, कि महागठबंधन के बड़े-बड़े नेता हज़ारों करोड़ की चोरी के इलज़ाम पर, ज़मानत पर बाहर हैं।

Topics: लालू यादव अपराधनीतीश कुमार सुशासनमाओवादी आतंकवादअपहरण फिरौती घटनाBihar Jungle RajLalu Yadav Crimeपाञ्चजन्य विशेषNitish Kumar Good Governanceबिहार चुनाव 2025Modi Nitish GovernmentBihar elections 2025Maoist Terrorismमोदी नीतीश सरकारKidnapping Ransom Incidentबिहार जंगल राज
मनोज रघुवंशी
मनोज रघुवंशी
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