जीवन में सब कुछ वापस पाया जा सकता है- पत्नी, राज्य, मित्र और धन। केवल एक चीज जिसे आप कभी वापस नहीं पा सकते हैं वह है आपका शरीर (पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही। एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः ॥)। एक बार स्वास्थ्य खो जाने के बाद, यह फिर से अपनी पूर्णता तक नहीं पहुंच सकता है।
सामान्यता धनतेरस को हम धन प्राप्ति या धन वर्षा का उत्सव मानते हैं, दरअसल अगर हम दीपावली के उत्सव के क्रम को बेहतर तरीके से समझे तो हम पाएंगे की धनतेरस वास्तव में भगवान धन्वन्तरि के लिए जो स्वास्थ्य के देवता हैं , अगले दिन रूप चौदश होता है जो बाह्य सौंदर्य की बात करता है फिर दीपोत्सव का पर्व आता है।
इस उत्सव का प्रारम्भ स्वास्थ्य के देव धन्वंतरि से होता है, क्योंकि स्वास्थ्य ही धन है। अगर स्वास्थ्य बेहतर नहीं तो धन-सम्पदा , वैभव सब व्यर्थ है। इसीलिए प्रथम दिवस स्वास्थ्य देव को समर्पित है।
भगवान धन्वंतरि और धनतेरस
इस दिन लोग सोना, चांदी, बर्तन या नई चीजें खरीदते हैं ताकि घर में लक्ष्मी का आगमन हो और जीवन में समृद्धि आए। धनतेरस शब्द में छिपा ‘धन’ सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है? आयुर्वेद के अनुसार असली धन है – स्वास्थ्य। यह अपने तन, मन और आत्मा को स्वस्थ रखने का संदेश देता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा होती है, जिन्होंने मानवता को ‘आयुर्वेद’ का ज्ञान दिया था। इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। उनके हाथों में एक ओर अमृत कलश और दूसरी ओर आयुर्वेद का ग्रंथ है। ये दोनों ही रोग-निवारण और उपचार के प्रतीक हैं। समुद्र मंथन के अमृत कलश से प्रकट होकर भगवान धन्वंतरि ने मानवता को आरोग्य का अमृत प्रदान किया। वे केवल देवता नहीं, बल्कि आयुर्वेद के प्रथम वैज्ञानिक और चिकित्सा के आदिदेव हैं। उनके ही वंश में काशिराज दिवोदास हुए जिन्होंने विश्व का पहला शल्य-चिकित्सा विद्यालय काशी में स्थापित किया। उनके शिष्य ऋषि सुश्रुत, जो विश्वामित्र के पुत्र थे, ने प्रसिद्ध सुश्रुत संहिता की रचना की और शल्यचिकित्सा को विज्ञान का रूप दिया। महाभारत, भागवत, विष्णु पुराण और अग्नि पुराण में धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंशावतार कहा गया है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया था कि वे पृथ्वी पर जन्म लेकर आयुर्वेद के आठ अंगों का विभाजन करेंगे और रोगों से मानवता की रक्षा करेंगे। ब्रह्मा से प्रारंभ यह विद्या प्रजापति, अश्विनी कुमार, इन्द्र और फिर धन्वंतरि तक पहुँची -जिसे आगे सुश्रुत और चरक ने समृद्ध किया। धन्वंतरि ने सिखाया कि अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है, यदि मनुष्य जीवन को संतुलन, संयम और प्रकृति के अनुरूप जीए। उन्होंने अमृत निर्माण और शरीर की आयु की वैज्ञानिक माप का सिद्धांत दिया -जो आज भी चिकित्सा के मूल विचारों में गूंजता है।
भगवान धन्वंतरि की पूजा
धन्वंतरि पूजा तुलसी के पत्तों, घी के दीपक और जड़ी-बूटियों से की जाती है। धन्वंतरि मंत्र -“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतराय अमृत कलश हस्ताय सर्व भय विनाशाय त्रैलोक्य नाथाय श्री महाविष्णवे नमः” – का जाप करने से रोगों और नकारात्मक ऊर्जाओं से रक्षा होती है। पूजा स्थान पर लाल या पीले वस्त्र का आसन बिछाकर भगवान धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। दीपक जलाने से पहले नीचे चावल या नया धान रखें। तांबे के कलश में जल भरकर उसे पूजा स्थल पर रखें और उसी जल से सभी देवी-देवताओं को आचमन कराएं। भगवान धन्वंतरि सहित लक्ष्मी, गणेश और कुबेर देव की भी पूजा करें।पूजा के दौरान रोली, हल्दी, चावल, पुष्प, पान, श्रीफल और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान धन्वंतरि से परिवार की आरोग्यता और दीर्घायु के लिए प्रार्थना करें।
आयुर्वेद – जीवन का आधार
भगवान धन्वंतरि ने आयुर्वेद की नींव रखी और इसे आठ शाखाओं में विभाजित किया —कायचिकित्सा , शल्य (Surgery) ,शालाक्य (ENT & Ophthalmology) ,कौमारभृत्य (Pediatrics), अगद तंत्र (Toxicology) ,रसायन (Rejuvenation Therapy) ,वाजीकरण (Fertility & Vitality) आदि।
आयुर्वेद, दुनिया की सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक, जीवनशैली प्रबंधन, आहार-विहार और प्राकृतिक उपचारों के माध्यम से शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन को बढ़ावा देता है। आयुर्वेदिक परंपरा के केंद्र में भगवान धन्वंतरि हैं। भगवान धन्वंतरि से आधुनिक चिकित्सा के लिए चार प्रमुख शिक्षाएँ
1.रोग की रोकथाम और जीवनशैली प्रबंधन (Preventive Health Care)
भगवान धन्वंतरि ने “उपचार से पहले रोकथाम” पर बल दिया। आयुर्वेद व्यक्ति की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुसार भोजन, व्यायाम और दिनचर्या का निर्धारण करता है। आधुनिक चिकित्सा में भी Non-Communicable Diseases (NCDs) जैसे मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप आदि को रोकने के लिए यही सिद्धांत अपनाए जा रहे हैं।
2. औषधीय जड़ी-बूटियाँ और प्राकृतिक उपचार (Herbal & Natural Therapies)
भगवान धन्वंतरि की शिक्षाएँ प्रकृति-संगत उपचार पर आधारित हैं। अश्वगंधा, त्रिफला, हल्दी (Curcumin) जैसी औषधियाँ आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित हैं। इनमें सूजनरोधी (Anti-inflammatory), एंटीऑक्सीडेंट और तनाव घटाने वाले (Adaptogenic) गुण पाए जाते हैं। अश्वगंधा और तुलसी जैसी जड़ी-बूटियाँ शरीर की तनाव-रोधी क्षमता बढ़ाती हैं।वे कोर्टिसोल हार्मोन को कम करती हैं और नींद की गुणवत्ता में सुधार लाती हैं। आधुनिक चिकित्सा भी अब इन जड़ी-बूटियों को “Adaptogens” की श्रेणी में मान्यता दे रही है
3. समग्र उपचार प्रणाली (Holistic Healing)
धन्वंतरि का सिद्धांत शरीर, मन और आत्मा की एकता पर आधारित है। योग, ध्यान (Meditation) और प्राणायाम जैसी साधनाएँ मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और शारीरिक स्फूर्ति देती हैं। आधुनिक वैज्ञानिक शोधों ने भी सिद्ध किया है कि योग और ध्यान अवसाद, चिंता और तनाव को कम करने के प्रभावी उपाय हैं।
4. संतुलन और संयम (Balance and Moderation)
आयुर्वेद का मूल है — संयमित जीवन। अत्यधिक कार्य, अति-भोजन या अति-विलास से असंतुलन पैदा होता है। भगवान धन्वंतरि ने “मध्यम मार्ग” की बात कही है -“न अत्यल्प, न अत्यधिक — संतुलन ही स्वास्थ्य का आधार।” आयुर्वेद के अनुसार, भोजन में 6 रस शामिल होने चाहिए। ये 6 रस हैं- मधुर (मीठा), लवण (नमकीन), अम्ल (खट्टा), कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा) और कषाय (कसैला)। शरीर की प्रकृति के अनुसार ही भोजन करना चाहिए। इससे शरीर में पोषक तत्त्वों का असंतुलन नहीं होता।
सरकार की भूमिका और नीति दिशा
भारत सरकार ने 2016 से राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस की शुरुआत धन्वंतरि जयंती पर की। 2022 में WHO के साथ मिलकर विश्व पारंपरिक चिकित्सा केंद्र की स्थापना की गई। राष्ट्रीय आयुष मिशन (NAM) के माध्यम से देशभर में 12,000 से अधिक AYUSH डिस्पेंसरी और 400 अस्पताल विकसित किए गए। एकीकृत स्वास्थ्य नीति 2023 के तहत सरकार ने आयुर्वेदिक दवाओं के निर्यात और अनुसंधान को प्राथमिकता दी है।
धन्वंतरि चाहे देवता रहे हों, वैज्ञानिक या अलौकिक मानव – वे सदैव मानवता के आरोग्य और लोककल्याण के उपासक रहे। उन्होंने जरा और व्याधि से मुक्ति के लिए ऐसा वातावरण और साधन बनाए जो आज भी स्वास्थ्य-चिंतन का आदर्श हैं। आधुनिक जीवन में जब हम स्वास्थ्य-संरक्षण के नियमों को भूल रहे हैं, तब रोग हमारे शरीर का स्थायी भाग बनते जा रहे हैं। केवल दवा और उपचार ही पर्याप्त नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने की जीवनशैली ही वास्तविक चिकित्सा है।
आयुर्वेद है जीवन का दर्शन
भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा, आयुर्वेद, केवल औषधि-विज्ञान नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन है — “सर्वे सन्तु निरामयाः” का जीवंत उदाहरण। जहाँ आधुनिक चिकित्सा रोग आने के बाद उपचार पर केंद्रित है, वहीं आयुर्वेद पहले से रोग रोकने और जीवन को संतुलित रखने की दिशा दिखाता है।वर्तमान में जब भारत बढ़ते स्वास्थ्य-खर्च, जीवनशैली-जनित रोगों और दवाओं की विदेशी निर्भरता से जूझ रहा है,
तब यह सिद्ध हो रहा है कि “आयुर्वेद केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर स्वास्थ्य की दिशा है।” आयुर्वेदिक औषधियों का कच्चा माल देश में ही उपलब्ध है, इसलिए यह “वोकल फॉर लोकल” स्वास्थ्य-मॉडल को सशक्त बनाता है।आयुर्वेद आधारित कृषि (औषधीय पौधों की खेती), दवा निर्माण और निर्यात से ग्रामीण क्षेत्र में करोड़ों लोगों को रोजगार मिल सकता है।
भविष्य का मार्ग है आयुर्वेद
आयुर्वेद भारत के लिए केवल परंपरा नहीं – भविष्य का मार्ग है। यह सस्ता है क्योंकि यह प्रकृति-आधारित है; यह सुरक्षित है क्योंकि यह दवा से अधिक जीवनशैली पर केंद्रित है; और यह आत्मनिर्भर है क्योंकि इसमें सब कुछ भारत की मिट्टी, जड़ी-बूटियों और ज्ञान से जुड़ा है। यदि हम आयुर्वेद को अपनाएँ —तो व्यक्ति स्वस्थ रहेगा, परिवार का खर्च घटेगा, सरकार का स्वास्थ्य-बजट सुरक्षित होगा और राष्ट्र चिकित्सा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।
ॐ नमो भगवते महासुर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरायेः
अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय।
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णुस्वरूप
श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषणचक्र नारायणाय नमः।।
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