हिन्दू समाज दबी जुबान अपने मंदिरों पर जारी सरकारी नियंत्रण को लेकर आवाज़ उठाता रहा है। सोशल मीडिया के आगमन के पश्चात मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की बात गुप्त नहीं रही और अधिक से अधिक लोगों को इस बाबत जानकारी प्राप्त हुई। इसके पूर्व हिन्दू समाज में एक आम धारणा यह थी कि मंदिर अवश्य स्वशासी ही होते होंगे और अपने वित्तीय मामलों में वे आत्मनिर्भर भी होंगे, मगर परिस्थिति इसके ठीक विपरीत है।
भारत के अधिकांश हिन्दू मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं। दानदाताओं द्वारा दिए गए दान का पैसा सरकार के खज़ाने में जमा होता है और राज्य सरकारें अपने विवेक के अनुसार विभिन्न मदों में इसका प्रयोग करती आ रही हैं। इसमें यह भी आवश्यक नहीं है कि यह पैसा मंदिरों के रखरखाव, मरम्मत, सौंदर्यीकरण, जीर्णोद्धार या अन्य हिन्दू समाज के कार्यों में ही लगाया जाए, बल्कि अनुभव में यह आता है कि अधिकांश पैसा केवल उन्हीं कार्यों में होता है, जो या तो राज्य सरकार के कर्तव्यों के अधीन होते हैं, जैसे कि सड़क बनवाना या मरम्मत करवाना, पेयजल या बिजली आपूर्ति जैसे कार्य इत्यादि। कई बार सरकारों द्वारा गैर-हिन्दू गतिविधियों में भी मंदिरों का पैसा खर्च कर दिया जाता है, जैसे कि गैर-हिन्दुओं की पांथिक यात्राओं की व्यवस्था करना या उनके लाभार्थ योजनाओं में खर्च करना इत्यादि सम्मिलित है।
मंदिरों पर सरकारी अधिपत्य का नियम कितना पुराना है
भारत में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का प्रारंभ ब्रिटिशों के शासन काल के दौरान लगभग 1810 से ही प्रारंभ हो चुका था, जब बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी कानून बनाए जा रहे थे। सन् 1925 में ‘मद्रास हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम’ के तहत इसे अमलीजामा पहना दिया गया था एवं स्वतंत्रता के बाद 1951 में इसी अधिनियम को राज्य सरकारों द्वारा आगे बढ़ाने का सिलसिला कायम रखा गया। 19 वीं शताब्दी में ही कई कानून ऐसे बनाए गए, जिसके द्वारा अंग्रेजों ने सीधे-सीधे मंदिरों में हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया था। विडम्बना यह भी है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आने वाली सरकारें हिन्दुओं को लेकर विचित्र उपेक्षा भाव से भरी रहीं और उन्होंने भी इस विषयक कुछ करना आवश्यक नहीं समझा। हमारे संविधान में भी हिन्दू हितों को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी, बल्कि अनुच्छेद 25 (2) के तहत् राज्यों को धार्मिक मामलों में सीमित नियंत्रण का अधिकार दे दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि दक्षिण भारत के राज्यों के अधिकांश मंदिर, जिनमें भारी चढ़ावा प्राप्त होता है, वे सरकारी खज़ाने के एक बड़े आय-स्रोत बन गए।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका
10 अक्टूबर 2025 को श्री कश्मीर चंद शांड्याल द्वारा हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्तिद्वय श्री विवेक सिंह ठाकुर और श्री राकेश कैंथला ने मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं, जो कि आने वाले समय में मंदिरों पर सरकारी अधिपत्य के मामलों में एक नज़ीर साबित होगी। याचिकाकर्ता ने हिन्दू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ निधि अधिनियम 1984 का कड़ाई से पालन करवाने हेतु हाईकोर्ट से निर्देश देने की अपील की गई थी।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले पर क्या कहा
भक्त द्वारा दान की गई राशि के व्यय के संबंध में याचिकाकर्ता की चिंता उचित है। देवता एक न्यायिक व्यक्ति हैं। धन, देवता का है, सरकार का नहीं। मंदिरों को प्राप्त हुई धनराशि का उपयोग सार्वजनिक भवनों, पुलों, सड़कों आदि के निर्माण के लिए नहीं किया जाएगा।
इस राशि का उपयोग विशिष्ट व्यक्तियों के लिए उपहार या स्मृति चिह्न खरीदने में भी नहीं किया जाएगा। मंदिरों को दान में प्राप्त हुई धनराशि का दुरुपयोग रोकने और इच्छित उद्देश्यों में उपयोग के लिए उसे रेगुलेट किया जाना आवश्यक है। हिन्दू धर्म की पृष्ठभूमि एवं इतिहास को ध्यान में रखते हुए अधिनियम की धारा 17 के अंतर्गत किए जाने वाले व्यय को समझना होगा। भक्तजन मंदिरों को इस विश्वास के साथ दान देते हैं कि इससे देवताओं के देखभाल में सहायता होगी, मंदिरों का उचित रखरखाव होगा और साथ ही सनातन धर्म का प्रचार होगा।
मंदिर के चढ़ावे पर अधिकार विचारधारा के साथ विश्वासघात
जब सरकार उस चढ़ावे को अपने अधिकार में ले लेती है, तो वह उक्त विचारधारा के साथ विश्वासघात करती है। इस प्रकार का दुरुपयोग न केवल सार्वजनिक दान का दुरुपयोग है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत पवित्रता के मूल पर भी प्रहार करता है।
अगर राशि का दुरुपयोग किसी ट्रस्टी के माध्यम से किया जाएगा या वह दुरुपयोग का कारण बनेगा, तो उससे वह राशि वसूल की जाएगी। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले पर 31 बिन्दुओं के माध्यम से राज्य सरकार को निर्देशित किया है, जिन पर इस धन का उपयोग किया जाएगा। उनमें से कुछ मुख्य बिन्दु हैं:-
- वेदों एवं योग की शिक्षा, अध्ययन और सनातन धर्म के प्रचार के लिए बुनियादी ढॉंचे जैसे गुरुकुल तैयार करने एवं अन्य मंदिरों के रखरखाव में
- इस राशि का उपयोग मवेशियों की सुरक्षा और देखभाल के लिए गौशालाओं के संचालन में
- किसी भी प्रकार के भेदभाव एवं अस्पृश्यता को मिटाने की गतिविधियों में
- अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए
- हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए
- विश्वविद्यालयों में छात्रवृत्तियॉं एवं सीटें प्रदान करने के लिए
- यज्ञशालाओं एवं धार्मिक सभा हॉल बनाने के लिए
- हिन्दू धर्म अथवा हिन्दू दर्शन के अनुयायियों के साथ ही प्रत्येक जीवित मानव के लिए दान के महत्व को बढ़ावा देने के लिए
मद्रास हाईकोर्ट ने स्टालिन सरकार को दिया आदेश
इसके पूर्व अगस्त माह में इसी प्रकार की एक याचिका मद्रास हाईकोर्ट में भी पेश की गई थी, जिसमें कोर्ट से यह मांग की गई थी कि वे राज्य सरकार को निर्देशित करें कि वे मंदिरों की संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग न करें। याचिकाकर्ता ने कहा कि तमिलनाडु की डीएमके नीत स्टालिन सरकार मंदिर के पैसों से विवाह के मण्डप (विवाह मण्डपम्) बनवा रही है, जिन्हें किराये पर उठाकर वह धन अर्जित करना चाहती है, जो कि धार्मिक उद्देश्य की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि स्टालिन सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने हाईकोर्ट में यह तर्क दिया कि भवनों का निर्माण अवश्य ही किया जा रहा है, मगर उनमें केवल हिन्दुओं के ही विवाहों का आयोजन किया जाएगा, मगर भवनों को किराये पर उठाने की बात को वे सफाई से छिपा गए। हालांकि, कोर्ट ने सरकारी वकील के तर्क को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की अपील को तर्कसंगत मानकर राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वे हिन्दू मंदिरों की राशि का सरकारी इस्तेमाल बंद करें।
मद्रास हाईकोर्ट ने क्या कहा
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि मंदिर के पैसे को सार्वजनिक पैसा या सरकारी पैसा नहीं माना जा सकता। राज्य सरकार मंदिरों के पैसों का व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं कर सकती है। तमिलनाडु सरकार मंदिर के संसाधनों का उपयोग केवल मंदिरों के रखरखाव और विकास तथा उससे जुड़ी धार्मिक गतिविधियों पर करने के लिए बाध्य है। हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 अधिनियम के तहत राज्य सरकार मंदिर की संपत्ति का उपयोग सिर्फ रखरखाव के लिए कर सकती है। भक्तों द्वारा मंदिर या देवता को दान की गई चल और अचल संपत्ति पर देवता का अधिकार होता है। ऐसे में इसका उपयोग केवल मंदिरों में उत्सव मनाने के लिए या मंदिर के रखरखाव के लिए या विकास के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। इसी के साथ कोर्ट ने स्टालिन सरकार के उन 5 आदेशों को भी रद्द कर दिया, जिसमें मंदिरों के धन से विवाह मण्डप निर्माण किए जाने थे।
सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकारी हस्तक्षेप पर लगाया प्रतिबंध
इसके पूर्व भी कई बार अनीश्वरवादी स्टालिन सरकार अपने हिन्दू विरोधी बयानों के कारण खासी चर्चा में रहती आई है। दिसम्बर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय भी तमिलनाडु के सनातनी देवस्थानों में अनधिकृत सरकारी हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगा चुका है। ध्यातव्य है कि स्टालिन के पिता एम.करुणानिधि ने 1971 में हिन्दू धार्मिक अधिनियम को निरस्त कर वंशानुगत नामकरण की व्यवस्था को समाप्त कर डाला था, जिसके विरोध में हिन्दू समाज ने एकजुट होकर विरोध किया, जिसकी परिणति कोर्ट के प्रतिबंध से हुई। ये वही स्टालिन हैं, जिन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया से करके करोड़ों सनातनियों की आस्था पर प्रहार किया था।
ये दोनों ही मामले खुले घाव पर रुई का नर्म ठण्डा फाहा रखने जैसा सुखद है। ये इस अर्थ में सुखदायक हैं कि इससे हिन्दुओं के न केवल मंदिरों की रक्षा होगी, बल्कि उनमें यह भावना भी दृढ़ होगी कि इस देश में हिन्दू का भी अस्तित्व है एवं वे उपेक्षित नहीं हैं। अन्य राज्य सरकारों को भी चाहिए कि वे हाईकोर्ट द्वारा निर्देशित नियमों को अपने राज्यों में लागू करवाऍं।

















