इधर गाजा में इस्राएल—हमास के बीच युद्धविराम को लेकर गाजा पट्टी के दोनों तरफ खुशी के आंसू छलक रहे हैं तो उधर जिन्ना के देश में इसी मुद्दे पर खूनखराबा हो रहा है, आगजनी और हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। फिलिस्तीन के गाजा क्षेत्र में लोग सड़कों पर जश्न मना रहे हैं तो पाकिस्तान में कट्टरपंथी गुट टीएलपी युद्धविराम को लेकर ऐसा चिढ़ा है कि इसके विरुद्ध वहां आफत मचा रहा है। उसे गुस्सा इस बात का है कि ‘यहूदियों के साथ संधि क्यों की’। बता दें कि पाकिस्तान फिलिस्तीन के आसपास भी नहीं है, लेकिन मजहबी उन्मादियों को इससे फर्क नहीं पड़ता, वे अपना आक्रोश जिन्ना के देश में ही जताए जा रहे हैं।
पाकिस्तान में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान या टीएलपी नामक मजहबी उन्मादी संगठन गाजा युद्धविराम के खिलाफ सड़कों पर उतरकर हिंसक प्रदर्शन कर रहा है। विडंबना यह है कि ये प्रदर्शन किसी मानवीय कारण या फिलिस्तीनियों के समर्थन में नहीं, बल्कि यहूदियों से समझौता करने के विरोध में हो रहे हैं। यानी, जब फिलिस्तीन खुद जश्न मना रहा है, पाकिस्तान के कट्टरपंथी फिलिस्तीनियों से ज्यादा ‘इस्लामी नाराजगी’ दिखाने में लगे हैं।

टीएलपी का यह बर्ताव नया नहीं है। यह वही संगठन है जिसने 2017 में इस्लामाबाद में ईशनिंदा कानून के नाम पर हिंसक धरना दिया था और सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया था। बाद में 2021 में फ्रांसीसी राजदूत को देश से निकालने की मांग को लेकर भी इसी गुट ने देशभर में खून सना कोहराम मचाया था। अब गाजा युद्धविराम का विरोध उसी कट्टर विचारधारा की अगली कड़ी है, जिसमें इस्लाम के नाम पर हिंसा की जाती है, और किसी भी ‘यहूदी या पश्चिम’ वाले को हिाकरत से देखकर दुश्मन मान लिया जाता है।
पाकिस्तान दशकों से खुद को फिलिस्तीन का सबसे बड़ा समर्थक बताता रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि इस समर्थन का कोई व्यावहारिक या मानवीय आधार नहीं है, यह केवल राजनीतिक इस्लाम से प्रेरित एक ‘भावनात्मक दिखावा’ मात्र होता है। पाकिस्तान के लिए फिलिस्तीन का मुद्दा अक्सर घरेलू असफलताओं को छिपाने का जरिया बनता रहा है।

बहरहाल, फिलहाल पाकिस्तान के लाहौर शहर में TLP के समर्थकों ने इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया, विशेषकर आजादी चौक, चौबुर्जी, शाहदरा, मुल्तान रोड और कई स्थानों पर पुलिस द्वारा रोक लगाए जाने पर हिंसक झड़पें हुई हैं। क्योंकि यह मार्च अमेरिकी दूतावास तक जाकर विरोध प्रदर्शन में बदल जाना था, इसलिए इस्लामाबाद और रावलपिंडी में भी भारी सुरक्षा व्यवस्था है, सड़कें बंद हैं, इंटरनेट/मोबाइल नेटवर्क बंद किए गए हैं। पंजाब सूबे के अन्य कई जिलों में प्रदर्शनों का असर देखा जा रहा है। कई क्षेत्रों में भी TLP समर्थकों की गिरफ्तारी हुई है और पुलिस से झड़प हुई है।
अभी तक समाचारों के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी सहित कुल पांच लोग मारे गए हैं, लेकिन TLP का दावा है कि हौर में पुलिस फायरिंग में उसके 11 कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। लाहौर में TLP ने 2 लोगों के मारे जाने का दावा किया है और लगभग 50 घायल बताए हैं। इस हिंसा में सबसे ज्यादा प्रभावित लाहौर रहा है। इस्लामाबाद/रावलपिंडी में अभी भी तनाव है।
पाकिस्तान में हालत ऐसी ही है कि जब देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही हो, महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर हो, और जनता बेरोजगारी से त्रस्त हो तब सत्ता और मजहबी संगठन इस्लामिक मुद्दों को हवा देकर जनता का ध्यान भटकाते रहे हैं। टीएलपी का उभार इसी का नतीजा है। लेकिन पाकिस्तान की समस्या केवल टीएलपी या कुछ कट्टर मजहबी नेताओं तक सीमित नहीं है। यह पूरे समाज में गहराई तक पैठ चुकी है।

















