शेखावाटी साहित्य संगम का छठा संस्करण: सात दिवसीय पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक चेतना का विस्तार
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शेखावाटी साहित्य संगम का छठा संस्करण: सात दिवसीय पुस्तक परिचर्चा से साहित्यिक चेतना का विस्तार

शेखावाटी साहित्य संगम के छठे संस्करण में 14 पुस्तकों पर चर्चा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय से गांधी जयंती तक सात दिवसीय आयोजन। नवलगढ़ से सीकर तक विस्तार, युवाओं में साहित्यिक रुचि जागृत। 10 हजार पुस्तकें प्रदर्शित।

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by कुलदीप सिंह
Oct 13, 2025, 09:45 am IST
inकला-साहित्य, राजस्थान
Shekhawati book discussion

सीकर। शेखावाटी की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान को नई दिशा देने वाला शेखावाटी साहित्य संगम इस वर्ष अपने छठे संस्करण में एक विशिष्ट और नवाचारपूर्ण स्वरूप में आयोजित किया गया। हर वर्ष की तरह इस बार भी यह आयोजन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती (25 सितंबर) से प्रारंभ होकर गांधी जयंती (2 अक्टूबर) तक चला, किंतु इस बार इसका रूप पहले से भिन्न था।

जहां पूर्व में संगम का आयोजन केवल सीकर शहर में होता था, वहीं इस वर्ष इसे पुस्तक परिचर्चा के रूप में संपूर्ण शेखावाटी क्षेत्र नवलगढ़, झुंझुनूं, पिलानी, चूरू, सरदारशहर, लक्ष्मणगढ़ और सीकर में विस्तारित किया गया। इस पहल का उद्देश्य था साहित्य को पाठशालाओं और महाविद्यालयों तक पहुंचाकर युवाओं में अध्ययन और विमर्श की परंपरा को पुनर्जीवित करना।

25 सितंबर : पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ग्रंथों पर चर्चा

संगम का शुभारंभ पंडित दीनदयाल उपाध्याय जयंती के अवसर पर सीकर की तीन प्रमुख शिक्षण संस्थाओं में हुआ। एस.के. स्कूल और दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय, सीकर में उनकी प्रसिद्ध कृति ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’ पर परिचर्चा आयोजित की गई। वहीं श्री कल्याण कन्या महाविद्यालय में उनकी पुस्तक ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ पर चर्चा सत्र हुआ। मुख्य वक्ता अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री मनोज कुमार ने बताया कि ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ का यह बत्तीसवां संस्करण है, जो उपाध्याय जी की गहन चिंतनशीलता और संवेदनशील साहित्यिक दृष्टि का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि पंडित जी का एकात्म मानववाद केवल राजनीतिक दर्शन नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक समग्र दृष्टिकोण है। उनकी रचनाएं समाज और व्यक्ति दोनों के मध्य सेतु का कार्य करती हैं।

कुलगुरु प्रो. अनिल राय ने अपने उद्बोधन में कहा कि विश्वविद्यालय के लिए यह गौरव की बात है कि उपाध्याय जी की जयंती पर उनकी रचनाओं पर चर्चा का अवसर मिला। उन्होंने शेखावाटी साहित्य संगम और अखिल भारतीय साहित्य परिषद का आभार जताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय आगे चलकर “पंडित दीनदयाल उपाध्याय : साहित्यकार के रूप में” विषय पर शोध को भी प्रोत्साहन देगा। इस सत्र में अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी और साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

उसी दिन दोपहर बाद चार बजे राजकीय कन्या महाविद्यालय, सीकर में दूसरा सत्र आयोजित हुआ। यहां भी उपाध्याय जी की ऐतिहासिक कृति ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ पर चर्चा हुई। मुख्य वक्ता मनोज कुमार रहे और कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्य डॉ. अरविंद कुमार महला ने की। वक्ताओं ने कहा कि ऐसी परिचर्चाएं आज के युग में अत्यंत आवश्यक हैं, क्योंकि पुस्तक संवाद से ही पाठक और लेखक के विचारों में सजीव संबंध बनता है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सीकर में ली शिक्षा

डॉ. महला ने कहा कि यह हमारे लिए गौरव की बात है कि जिस सीकर की धरती ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को शिक्षा दी, वहीं आज उनकी कृति पर इतनी गहन चर्चा हो रही है। उन्होंने साहित्य संगम और साहित्य परिषद को इस रचनात्मक पहल के लिए धन्यवाद दिया।
अगले दिन 26 सितंबर को पिलानी में सुरेश सोनी द्वारा लिखित पुस्तक ‘भारत में विज्ञान की उज्ज्वल परंपरा’ पर परिचर्चा हुई, जिसमें बिट्स पिलानी के विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है भारत की संस्कृति

27 सितंबर को चूरू नगर के श्री सभागार में श्रीधर पराड़कर की पुस्तक ‘तत्त्वमसि’ पर चर्चा का आयोजन हुआ। इस अवसर पर मनोज कुमार ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा “वसुधैव कुटुंबकम्” के आदर्श पर आधारित है और इस आदर्श को साहित्य के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना आज की आवश्यकता है। 29 सितंबर को एस.बी.डी. कॉलेज, सरदार शहर में ‘डॉ. हेडगेवार’ और ‘पारसमणि’ पुस्तकों पर परिचर्चा हुई, जिसमें उपस्थित विद्यार्थियों और अध्यापकों ने लेखकों की विचारधारा पर सार्थक विमर्श किया।

30 सितंबर को मोरारका राजकीय महाविद्यालय, नवलगढ़ में “संविधान के 75 वर्ष” विषय पर आधारित विशेष चर्चा आयोजित हुई। इस सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. नारायण लाल गुप्ता रहे, जिन्होंने संविधान की आत्मा में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुता के सिद्धांतों पर प्रकाश डाला। 1 अक्टूबर को शारदा सदन, लक्ष्मणगढ़ में ‘आनंदमठ’ और ‘वंदे मातरम् की आत्मकथा’ पुस्तकों पर परिचर्चा हुई। मुख्य अतिथि कमल कोठारी ने कहा कि ‘वंदे मातरम्’ केवल गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वाधीनता संग्राम की आत्मा है।

2 अक्टूबर, गांधी जयंती के अवसर पर, श्रीकृष्णा सत्संग महाविद्यालय, सीकर में समापन सत्र आयोजित हुआ। यहां दो महत्वपूर्ण पुस्तकों ‘संवर्धिनी’ और ‘रानी अबक्का देवी’ पर विमर्श हुआ। शुचि चौहान और डॉ. अंशु हर्ष ने विषय प्रस्तुत करते हुए कहा कि ये दोनों कृतियां भारतीय नारी के अदम्य साहस और नेतृत्व की प्रतीक हैं। यह पूरा सत्र महिला-केंद्रित रहा, जिसने साहित्य में स्त्री दृष्टि के विस्तार पर गंभीर विचार-विमर्श को जन्म दिया।

14 पुस्तकों पर परिचर्चा

इस वर्ष के सात दिवसीय संगम में कुल 14 पुस्तकों पर परिचर्चा हुई। साहित्य संगम के आरंभ की पूर्व संध्या पर चौमू में ‘स्वामी विवेकानंद’ विषयक चर्चा आयोजित की गई थी, जिसमें मनोज कुमार ने मुख्य वक्ता के रूप में विचार साझा किए। पहले जहां यह आयोजन दो या तीन दिवसीय हुआ करता था, वहीं इस बार इसे सात दिनों तक विस्तारित किया गया। इस विस्तार का प्रमुख उद्देश्य शेखावाटी के विभिन्न अंचलों तक साहित्यिक चेतना का प्रसार करना था।

शेखावाटी साहित्य संगम अब केवल एक आयोजन न रहकर एक जनांदोलन का स्वरूप ले चुका है। इससे शेखावाटी क्षेत्र में साहित्य-पठन की परंपरा सशक्त हुई है। विद्यार्थियों में अध्ययन और विमर्श की रुचि बढ़ी है तथा स्थानीय लेखकों और प्रकाशकों को भी प्रोत्साहन मिला है। संगम के दौरान प्रतिवर्ष लगभग तीस प्रकाशकों की दस हजार से अधिक पुस्तकें प्रदर्शित की जाती हैं, जिससे पाठकों को विविध विषयों पर साहित्य उपलब्ध होता है।

दो दिवस से शुरू हुआ यह साहित्य संगम पहले तीन दिन हुआ फिर पांचवे संस्करण को पांच दिवसीय करते हुए छठवें संस्करण में इसे सात दिवसीय करके विस्तार दिया गया l शेखावाटी साहित्य संगम के कारण शेखावाटी में साहित्य पढ़ने में लोगों की रुचि बढ़ी हैl इस साहित्य संगम में प्रतिवर्ष तीस प्रकाशकों की 10 हजार से अधिक पुस्तकें उपलब्ध रहती हैl

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