नक्सलवाद, यह शब्द सुनते ही आंखों के सामने खून से सनी धरती, जले हुए गांव और डरे हुए मासूम चेहरे उभर आते हैं। भारत ने आजादी के बाद जितना विकास देखा, उतना ही इस लाल आतंक ने उसे भीतर से लहूलुहान किया। जिन वनवासी अंचलों में कभी जनजातीय गीतों की गूंज होती थी, वहां बारूद की गंध हवा में तैरने लगी।
नक्सलियों ने वनवासियों से कहा कि वे उनके हक की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन असल में उन्होंने उन्हीं के जीवन से हक छीन लिया। उनके बच्चों को बंदूक थमाई, महिलाओं को ढाल बनाया। जिन्होंने उनकी बात नहीं मानी, उन्हें बर्बरता से मार डाला। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि शहरों में बैठे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी या अर्बन नक्सल इन खूनी नक्सलियों की वकालत करते हैं।
अर्बन नक्सल दरअसल ऐसे ही दानव हैं, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर नक्सली आंतक की आग को हवा देते हैं। वे विश्वविद्यालयों और विभिन्न मंचों से हिंसा को वैचारिक जामा पहनाते हैं, जबकि असल में वे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से खोखला करने की साजिश रच रहे होते हैं। नक्सलियों ने वनवासियों को ऐसे-ऐसे घाव दिए हैं जो शायद ही कभी भर सकें। हालांकि सरकार द्वारा लाल आतंक के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाए जाने के बाद नक्सलवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है।
नक्सलवाद से पीड़ित लोगों का भी यही कहना है कि उन्हें अब यह उम्मीद जगी है कि लाल आतंक पूरी तरह खत्म हो जाएगा और विकास की बयार बहेगी। गत 28 सितंबर को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘नक्सल मुक्त भारत : प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में लाल आतंक का खात्मा’ विषय पर हुए एक दिवसीय ‘भारत मंथन’ में नक्सल हिंसा के शिकार कुछ लोग पहुंचे थे। पाञ्चजन्य संवाददाता नैन्सी बाजपेई के साथ अदिति और हिमांशु मिश्रा ने ऐसे ही कुछ पीड़ितों से बातचीत की :
‘मैं बच गया पर मेरे भाई को मार डाला’

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर के चिनारी गांव के रहने वाले बिरसा पोटाई बताते हैं, ”नक्सली हमसे बंदूक की नोक पर अपने काम करवाते थे। यदि कोई ऐसा न करे तो उसे पुलिस का मुखबिर बताकर मार दिया जाता था। साल 2010 का मार्च महीना था। तारीख मुझे याद नहीं है। गांव में अचानक नक्सली आ धमके। बंदूकों के बल पर उन्होंने मुझे और मेरे गांव के दो लोगों को उठा लिया। जब हमने पूछा तो उनके कमांडर ने कहा कि तुम पुलिस के मुखबिर हो। वे आंखों पर पट्टी बांधकर हमें जंगल में ले गए। उन्होंने दो दिन तक बर्बरता से हमें मारा-पीटा। मेरे सामने मेरे गांव के दोनों लोगों को उन्होंने फांसी पर लटका दिया। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था, बेहोश हो गया। जब मुझे होश आया तो उन्होंने मुझे यह कहकर छोड़ दिया कि सात साल तक तुम अपने गांव में दिखाई नहीं दोगे, नहीं तो तुम्हें मार दिया जाएगा। जब मैं गांव पहुंचा और पुलिस को मेरे आने की खबर मिली तो पुलिस ने मुझसे उस जगह पर चलने को कहा, जहां नक्सलियों ने हमें रखा था। मैंने कहा, यदि मैंने ऐसा किया तो वे मुझे मार डालेंगे। पुलिस ने सुरक्षा का आश्वासन दिया। मुझे परिवार सहित नारायणपुर भेज दिया गया। लेकिन पीछे से नक्सलियों ने मेरे भाई को पकड़ लिया और गोलियों से भून डाला। अब मैं नारायणपुर में ही मजदूरी कर गुजर-बसर कर रहा हूं।” वह बताते हैं, ”आज हालात थोड़े सुधरे हैं। सरकार की योजनाएं पहुंचने लगी हैं, सड़कें और स्कूल बन रहे हैं। उम्मीद है कि हम फिर से अपने गांव जा पाएंगे।”
‘बम धमाके में उड़ गया दायां पैर’

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के बीजापुर गांव की रहने वाली मड़कम सुक्की का बचपन नक्सलियों ने छीन लिया। बचपन में सुक्की की मां की बीमारी के चलते मौत हो गई थी। इसके बाद उसके पिता को नक्सलियों ने पुलिस का मुखबिर बताकर उनका गला काटकर मार डाला था। सुक्की और उसकी छोटी बहन का पालन-पोषण अब उसके मामा कर रहे हैं। अनाथ हो चुकी सुक्की मामा के घर रहकर पढ़ाई कर रही थी। 2024 की गर्मियों में, जब जंगलों में महुआ बीनने का मौसम था, 13 साल की सुक्की अपनी सहेली के साथ हंसते-खेलते टोकरी लेकर जंगल से महुआ बीनने निकली थी। वहां नक्सलियों ने सुरक्षाबलों के लिए आईईडी लगाई हुई थी।
सुक्की बताती है, ”मैं और मेरी सहेली महुआ बीन रहे थे। मेरा पैर आईईडी पर पड़ गया। जोरदार धमाका हुआ। मैं बेहोश हो गई। जब होश आया तो मेरा दायां पैर नहीं था। पूरा शरीर बारूद से जल गया था। मेरी पढ़ाई छूट गई, पैर नहीं रहा।” यह कहते हुए सुक्की की आंखें भर आती हैं, गला रूंध जाता है। वह रूंधे हुए गले से बस यही कहती है, ”हर हालत में नक्सली पूरी तरह खत्म होने चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो न जाने मेरे जैसे कितने बच्चों का बचपन ऐसे ही खत्म हो जाएगा।”
‘मेरी आंखों के सामने पिता को गोली मारी’

ओडिशा के मलकानगिरि के रहने वाले नंद पुजारी बताते हैं,”वर्ष 2002–03 तक हमारे क्षेत्र में नक्सलवाद नाम की कोई चीज नहीं थी। इसके बाद धीरे-धीरे नक्सली बढ़ते चले गए।”नक्सली बच्चों को पढ़ने से रोकते थे। उनका मानना था कि यदि बच्चे पढ़-लिख गए तो वे कुछ न कुछ बन जाएंगे। कई बार ऐसा हुआ कि बच्चे स्कूल पढ़ने गए और लौटते हुए उन्हें उठा लिया गया। बाद में उनके पिता को उनके सामने मार दिया जाता था, ताकि कोई स्कूल न जाए। पुजारी बताते हैं, ”24 दिसंबर, 2016 की बात है। मैं 10वीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा था। रात को गांव में करीब 50 हथियारबंद नक्सली आए और मेरे पिता को खींचकर बाहर निकाला, फिर गोलियों से भून डाला। उस रात दो और लोगों की भी हत्या कर दी गई। नक्सलियों ने स्पष्ट कहा कि जो भी अपने बच्चों को स्कूल भेजेगा, वह इसी तरह मारा जाएगा।” वह बताते हैं, ” इस घटना के बाद मेरा परिवार पूरी तरह बिखर गया। हमें गांव छोड़कर प्रशासन के पास शरण लेनी पड़ी। सुरक्षा मिली, पर रोजमर्रा की जिंदगी फिर भी संभल नहीं पाई। अब हालात बदल रहे हैं। गांव के पास ही बीएसएफ का कैंप है, और सरकारी योजनाएं भी लोगों तक पहुंच रही हैं। जो नुकसान हो गया, उसकी भरपाई तो संभव नहीं है, लेकिन कम से कम ऐसा आगे न हो, इसके लिए नक्सलवाद का खात्मा होना बेहद जरूरी है। सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ जो मुहिम शुरू की है, उम्मीद है कि उससे भारत जल्द ही नक्सल-मुक्त हो जाएगा और हर परिवार फिर से सम्मानपूर्वक जीवन जी सकेगा।”
‘पूरा परिवार तबाह हो गया’

ओडिशा के तेलंगपानी के रहने वाले उमेश बताते हैं, ”2011 की बात है। मेरी उम्र तब 24 वर्ष थी। रात के आठ बजे थे। घर में खाना परोसा जा चुका था। मैं अपने पिता और मां के साथ बैठा था। अचानक दरवाजे पर धमाके की आवाज हुई। करीब साठ-सत्तर हथियारबंद लोग घर में घुस आए और बोले कि हम नक्सल हैं। वे मेरे पिता को घर से खींचकर बाहर ले गए। पुलिस को मुखबिरी का आरोप लगाकर उन्होंने उन्हें गोली मार दी। पिता के जाने के बाद परिवार का सबकुछ बिखर गया। मां बीमार रहने लगीं, उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया।”
‘घुट कर रह गई चीख’

ओडिशा के कोरापुट जिले के एक छोटे गांव की रहने वाली बसंती खेलार ने बताया,”वर्ष 2016 सितंबर की बात है। मैं अपने पति और दोनों बच्चों के साथ घर पर थी। मेरे पति गांव के चौकीदार थे। अचानक नक्सली मेरे घर आ धमके। उन्हें शक था कि मेरे पति पुलिस को मुखबिरी करते हैं। नक्सलियों ने मेरे पति को बाहर निकाला और सीने में कई गोलियां दाग दीं। मेरी आंखों के सामने उन्होंने मेरे पति को मार डाला। मैं बहुत तेज चिल्लाना चाहती थी, चीखना चाहती थी, लेकिन डर के मारे चिल्ला भी न सकी, मेरी आवाज अंदर ही घुट गई। मुझे लगा, कहीं मेरे दोनों बच्चों को भी वे मार न डालें। मैं गांव के लोगों के घरों में काम कर जैसे-तैसे गुज़ारा कर रही हूं।” बसंती का कहना है कि अब उनके बच्चे 15–16 साल के हैं। वे अब स्कूल भी जाते हैं। अब तो गांव के पास सीआरपीएफ का कैंप भी बन गया है। उम्मीद है, जल्द ही नक्सली पूरी तरह खत्म हो जाएंगे।
‘पैर गंवाया, अब बैसाखी सहारा’

छत्तीसगढ़ के सुदूरवर्ती जिले बीजापुर में एक गांव है, तिमापुर। वहां के रहने वाले 31 वर्षीय अवलम मारा, 22 फरवरी 2017 को ठिठुरन भरी सुबह में अपने पिता अवलम पाण्डू और कुंजाम पाण्डू के साथ बांस काटने जंगल को निकले। वे सभी तिमापुर गांव से लगभग 7–8 किलोमीटर दूर आ चुके थे। तेजी से कदम बढ़ाने के कारण अवलम माड़ा अपने पिता और कुंजाम पाण्डू से थोड़ा आगे ही था। एकाएक तेज धमाके की आवाज ने अवलम पाण्डू और कुंजाम पाण्डू को थर्रा दिया। उनसे आगे-आगे चल रहे अवलम का पैर माओवादियों द्वारा लगाए गए प्रेशर बम पर पड़ गया था। अवलम ने अपना बायां पैर हमेशा के लिए खो दिया। कभी परिवार को सहारा देने वाले अवलम को अब जीवनभर बैसाखी के सहारे चलना होगा।
‘धमाके में एक आंख चली गई’

राधा सलाम छत्तीसगढ़ के नारायणपुर के गांव कोंगेरा की रहने वाली हैं। वर्ष 2013 दिसंबर की बात है। बस्तर में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। नारायणपुर जिले के ग्राम कांगेरा में आंगनबाड़ी के नजदीक सैनू सलाम का घर है। वहां अपने घर के बाहर सैनू सलाम की 3 वर्षीया बेटी राधा अपने 5 साल के चचेरे भाई रामू के साथ दोपहर की गुनगुनी धूप में खेल रही थी।
खेलते-खेलते रामू को केतली जैसी कोई चमकदार चीज दिखाई पड़ी। दोनों भाई-बहन कौतूहलवश उसे देखने गए। रामू ने उसे अपने हाथों में उठा लिया, पर न जाने क्या अहसास हुआ कि रामू ने उसे अपने हाथों से छोड़कर नजरें फिरा लीं। पर तब तक देर हो चुकी थी। धमाका हो गया। राधा और रामू दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए। राधा की एक आंख खराब हो गई, और बम के छर्रों ने चेहरे पर निशान छोड़ दिए हैं। रामू के हाथों और पैरों में गंभीर चोटें आईं। आज इस घटना को दस साल से ज्यादा हो गए, पर इसकी याद आज भी राधा को झकझोर कर रख देती है। राधा की माताजी का निधन हो चुका है, और अब उसके पिता ही उसकी देखभाल कर रहे हैं।

‘अस्पताल तक जाने नहीं दिया नक्सलियों ने’

28 मार्च, 2024 की सुबह आठ-सवा आठ बजे छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में कचीलवार गांव के रहवासी रामलाल तेलम के मोबाइल फोन की घंटी बजती है। फोन की दूसरी तरफ से तोड़का गांव के सुखराम ताती थोड़े घबराते और थोड़े हड़बड़ाते हुए समाचार देते हैं कि कचीलवार गांव के गुड्डूराम लेकाम का पैर उड़ गया है। गुड्डूराम लेकाम, कचीलवार गांव का रहने वाला 18 वर्षीय नौजवान था। मिर्ची के बगीचे में मिर्ची तोड़ने की मजदूरी करने वह और उसका दोस्त गए हुए थे। वहां का अपना सारा काम निपटाकर दोनों 11 मार्च, 2024 की सुबह पैदल ही घर वापस आ रहे थे। लगभग 24 किलोमीटर का सफर तय कर वे शाम साढ़े सात बजे के लगभग गांव पहुंचने वाले थे। पर गुड्डू का पैर आईईडी पर पड़ गया। तेज धमाका हुआ। इसमें उसका दायां पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। जब गांव वाले वहां पहुंचे और उसे उपचार के लिए ले जाने लगे तो नक्सलियों ने धमकी दी कि कोई उसे अस्पताल नहीं ले जाएगा। 17 दिनों तक स्थानीय स्तर पर उसका उपचार करने का प्रयास किया गया लेकिन नक्सलियों के डर से कोई उसे अस्पताल नहीं ले गया। बाद में जब उपचार मिला तो पैर खराब हो चुका था। उसकी जान बचाने के लिए पैर को काटना पड़ा। मजदूरी करके घर का आर्थिक सहयोग करने वाला गुड्डू अपना एक पैर खो चुका है और अब मजदूरी करने लायक भी नहीं बचा है।
‘छर्रों की मार से शरीर लाचार हुआ’

खेती के साथ-साथ पशुपालन भी बस्तरवासियों की जीवनचर्या का अभिन्न अंग है, और दंतेवाड़ा जिले के साकिन कोण्डापारा निवासी भीमे मरकाम की भी ऐसी ही जीवनचर्या है। पति की मृत्यु के बाद तो उनका दायित्व और भी बढ़ गया था। बच्चों की देखभाल, परिवार के लालन-पालन के लिए आमदनी का जुगाड़ सब उन्हें ही करना था। 9 नवम्बर 2016 को भीमे अपनी गाय-बकरियों तथा बैलों को चराने के बाद वापस घर लाैट रही थीं, अचानक उनकी एक गाय अलग दिशा में भागने लगी। वे उसे पकड़ने उसके पीछे-पीछे दौड़ीं। पर यह दौड़ पूरी नहीं हो सकी। भीमे का पैर माओवादियों द्वारा लगाए गए एक आईईडी पर पड़ गया। तेज धमाके ने उन्हें हवा में उछाल दिया। हाथों और पैरों में गहरे जख्म आने के साथ-साथ पूरे सिर में बम के छोटे-छोटे छर्रे धंस गए। बाएं पैर को ज्यादा क्षति पहुंची। इसके बाद से वह कोई काम करने के लायक नहीं रह गई हैं। पति के न होने से पहले जीवन में कष्ट था, अब शारीरिक अक्षमता होने के चलते वे दूसरों पर निर्भर हैं, उन्हें ठीक से दिखाई भी नहीं देता। शरीर में धंसे बम के छर्रे आज तक दर्द देते हैं।
‘दोनों आंखों की रोशनी चली गई’

खेकोसी माड़वी और उनके पति हुंगा माड़वी छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित जिले दंतेवाड़ा के ग्राम गुड़से के रहने वाले हैं। 9 अक्तूबर 2020 की सुबह आठ बजे के लगभग दोनों पति-पत्नी अपनी बड़ी बेटी पाले कवासी से मिलने की चाह लिए उसके गांव सूरनार के लिए निकले। बस्तर में दशकाें तक नक्सलियों के चलते विकास नहीं हो सका था, सड़कों का विकास बहुत प्रभावित था इसलिए तब पैदल चलना आवागमन का सबसे प्रचलित माध्यम था। माड़वी दंपती भी पैदल ही सूरनार जाने के लिए निकले थे। राह में पड़ने वाले एक गांव तेलम में माओवादियों ने सड़क किनारे एक आईईडी लगा रखा था। कोसी ने उस पर अपना पैर रख दिया। जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके के छर्रे माड़वी के चेहरे में धंस गए और दोनों आंखों की रोशनी चली गई। हाथ-पैर व शरीर के अन्य हिस्सों में भी गंभीर चोटें आईं। एक हाथ आज तक काम नहीं करता। बेटी से मिलने के लिए घर से निकली कोसी अब कभी अपनी बेटी को आंखों से नहीं देख सकेंगी। लाल आतंक ने उनके पूरे जीवन में अंधेरा कर दिया। उनके पति और उनके बच्चे ही अब उनका सहारा हैं।
‘ अपने भाई को अपनी आंखों मरते देखा ‘

साप्ताहिक हाट बस्तर की कुछ सबसे रौनकभरी जगहों में से एक होते हैं। ऐसे ही कोण्डागांव के मटवाल गांव के साप्ताहिक बाजार में किसी जगह गल्ला व्यापारी दो भाई रूपेन्द्र कश्यप और केदारनाथ कश्यप कुर्सी पर बैठे बात कर रहे थे। अचानक वहां तीन नक्सली दिखे। रूपेन्द्र के नाम से माओवादियों ने पर्चा जारी किया हुआ था, इस पर केदार के मन में अनिष्ट की आशंका हुई। दोनों वहां से निकलकर भागे, लेकिन उन्होंने पीछे फायरिंग शुरू कर दी। रूपेन्द्र को पीठ और कंधों पर कुल तीन गोलियां लगीं, एक गोली उसकी कोहनी से टकराकर केदार की जांघ में घुस गई। दोनों ने फिर भी भागने की कोशिश जारी रखी, लेकिन रूपेन्द्र उनके हाथ आ गया। उन्होंने रूपेन्द्र पर कई गोलियां चलाईं और फिर भी जब उन्हें उसके मरने का विश्वास नहीं हुआ, तो चाकू से उसकी अंतड़ियां बाहर निकाल दीं। केदार छिपकर अपनी जान बचा पाया, लेकिन वह असहाय होकर अपने भाई की बर्बर हत्या को देखता रहा। जांघ में लगी गोली ने उसे भी अपाहिज बनाकर रख दिया। केदार के व्यापार करने पर नक्सलियों ने रोक लगा दी। घर की आर्थिक स्थिति भी चौपट हो गई।
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