हिमालयी राज्यों विशेषकर उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में इस बार आई भीषण आपदा के कारण तीर्थों और पर्यटन केंद्रों के यात्रा मार्ग अवरुद्ध और क्षतिग्रस्त थे। वर्ष 2015 से प्रत्येक वर्ष सितंबर माह में हिमालय दिवस के आसपास आयोजित खतलिंग हिमालय जागरण महायात्रा का उद्देश्य युवाओं को हिमालय की आध्यात्मिक,सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्ता से जोड़ना रहा है। बाबा बूढ़ा केदार से मासरताल और सहस्रताल तक की यात्रा को जोड़ने से क्षेत्र के समग्र विकास की दिशा में नए अवसर के लिए भी यह महायात्रा एक माध्यम मानी जाती है।
इंद्रमणि बडोनी जी ने अस्सी के दशक में भगवान शंकर के सिद्धपीठ खतलिंग को “पांचवां धाम” घोषित किया था, जो तिब्बत सीमा से सटा हुआ एक सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह स्थान पर्यावरणीय, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और गंगी जैसे सीमांत गांवों के विकास की कुंजी बन सकता है। युवा वर्ग और मातृशक्ति इस महायात्रा में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। प्रतिवर्ष दिल्ली से आयोजित होने वाले पांचवें धाम खतलिंग की 41वीं हिमालय जागरण महायात्रा इस बार बूढ़ा केदार और खतलिंग क्षेत्र के तीर्थ स्थलों और सिद्धपीठों की यात्रा के रूप में परिणत की गई थी।
खतलिंग महायात्रा देहरादून के लिए रवाना
नई दिल्ली के पालम स्थित इंडिया टाइम 24 न्यूज के कार्यालय से हिमालय संरक्षण पर एक गोष्ठी के उपरांत खतलिंग महायात्रा देहरादून के लिए रवाना की गई। खतलिंग हिमालय जागरण महायात्रा के संयोजक सूर्य प्रकाश सेमवाल के नेतृत्व में यात्रीदल में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ.रामकृष्ण भट्ट, वरिष्ठ पत्रकार व्योमेश जुगरान, कवि बीर सिंह राणा, समाजसेवी सुरेशानंद बसलियाल, संजय तड़ियाल और विपिन थपलियाल मौजूद थे। खतलिंग हिमालय जागरण महायात्रा का यात्रीदल अगले दिन देहरादून पहुंचा, जहां यात्री दल ने उत्तराखंड हथकरघा एवं विकास परिषद के उपाध्यक्ष तथा पर्वतीय लोकविकास समिति के संरक्षक श्री वीरेंद्र दत्त सेमवाल के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार के वन एवं पर्यावरण तथा उच्च तकनीकी शिक्षा मंत्री श्री सुबोध उनियाल से भेंट की।
हिमालय में पर्यावरण परिवर्तन पर अध्ययन
श्री उनियाल ने यात्रियों को शुभकामनाएं दीं और उनसे हिमालय क्षेत्र में हो रहे पर्यावरणीय परिवर्तनों पर एक अध्ययन रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तराखंड की जीवनरेखा है, जिसकी रक्षा सामूहिक जनजागरण से ही संभव है। महायात्रा दल ने श्री उनियाल को बताया कि हमने सामूहिक रूप से संकल्प लिया है कि हिमालय संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन और क्षेत्रीय तीर्थाटन के लिए जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे। देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार श्री तेजराम सेमवाल, एडवोकेट लोकेंद्र दत्त जोशी और द्वारी के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य श्री लक्ष्मी प्रसाद सेमवाल यात्री दल से जुड़े। टिहरी और घनसाली से यात्रा स्थानीय लोगों के साथ बाल गंगा घाटी की ओर बढ़ी और सर्वप्रथम आदि केदार माने जाने वाले वेलेश्वर महादेव के सिद्धपीठ पहुंची।
पांडव काल का शिव मंदिर
भिलंगना की पट्टी केमर घाटी में बेलेश्वर क्षेत्र में विद्यमान शिव मंदिर पांडव काल का है। यहां केदारनाथ के मंदिर सदृश शिवलिंग विराजमान है। इसे आदि केदार के रूप में माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां जब पांडव कैलाश यात्रा के लिये निकले थे तो रात्रि विश्राम के समय भोलेनाथ ने पांडवों को भील के रूप में दर्शन दिए थे। वास्तव में इस दिव्य और भव्य मंदिर के दर्शनों से सभी यात्री और श्रद्धालु आह्लादित थे। इसके उपरांत यात्रीदल बूढ़ा केदार के पवित्र धाम में पहुंचा। यह सिद्धपीठ चार धामों से भी प्राचीन और सिद्ध माना जाता है। भगवान शिव का यह धाम नई टिहरी से 60 किलोमीटर दूर है। दिव्य और भव्य बूढ़ा केदार मंदिर बाल गंगा और धर्म गंगा नदियों के संगम पर स्थित है।
ऐसी मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद, पांडव भगवान शिव की खोज में निकले। रास्ते में, भृगु पर्वत पर उनकी भेंट बालखिल्य ऋषि से हुई। ऋषि ने उन्हें संगम स्थल पर ध्यानमग्न एक वृद्ध साधक से मिलने भेजा, जब वे पहुंचे तो वृद्ध साधक अदृश्य हो गए और उनके स्थान पर एक विशाल शिवलिंग प्रकट हो गया। ऋषि के आदेशानुसार पांडवों ने इस शिवलिंग की अर्चना की और आज भी उत्तर भारत के इस सबसे विशाल शिवलिंगों में से एक पर पांडवों के भी चित्र मौजूद हैं। बूढ़ा केदार के शिवलिंग की पूजा अर्चना और जलाभिषेक के उपरांत यात्रीदल बालखिल्य पर्वत की उपत्यका में विद्यमान सिद्धपीठ चूलागढ़ पहुंचा जहां दस “महाविद्याओं” में से एक ‘त्रिपुरसुन्दरी/ षोडशी’ माँ राज राजेश्वरी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माँ राजराजेश्वरी का मन्दिर बालखिल्य पर्वत की सीमा में मणिद्वीप आश्रम में स्थित है जो कि बासर, केमर, भिलंग एवं गोनगढ़ के केन्द्रस्थल में चमियाला से 15 किमी.और मांदरा से 3 किमी.दूरी पर है।
राजेश्वरी का इतिहास
माँ श्री राज राजेश्वरी के बारे में आख्यान मिलता है कि सतयुग में देवासुर संग्राम के दौरान, आकाश मार्ग से विचरण करते समय माँ दुर्गा का ‘शक्ति शस्त्र ‘ चूलागढ की पहाड़ी पर गिरा था । जो माँ श्री राज राजेश्वरी मन्दिर के गर्भगृह में विद्यमान है। भारतीय पुरातत्व विभाग के अनुसार यह ‘शक्ति शस्त्र’ लाखों वर्ष पुरातन है। इन दिनों मंदिर समिति के अध्यक्ष आचार्य नलिन भट्ट और महासचिव भास्कर नौटियाल की देखरेख में मंदिर के भव्य जीर्णोद्धार का कार्य प्रगति पर चल रहा है।
यहां से खतलिंग हिमालय जागरण महायात्रा का यात्रीदल विभिन्न छोटे मंदिरों और सुरम्य पर्यटन स्थलों का स्पर्श करता हुआ घनसाली पहुंचा जहां इंद्रमणि बडोनी कला एवं साहित्य मंच के सहयोग से होटल वसुलोक में गोष्ठी के उपरांत साहित्य, शिक्षा, मीडिया, कृषि और पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया। घनसाली से यात्री दल मानचंपु मंदिर, भगवती रानीगढ़ के दर्शन करता हुआ भिलंग पट्टी के चंद्रेश्वर महादेव मंदिर, सिद्धपीठ बगुलामुखी, बुगीलाधार, भिल्लेश्वर महादेव पीठ और देवलिंग से होते हुए अंत में खतलिंग की गोद में बसे तिब्बत सीमा से सटे सीमांत गंगी गाँव स्थित सोमेश्वर महाराज के सिद्धपीठ पहुंची।
भगवान सोमेश्वर के दर्शनों के उपरांत घुत्तू भिलंग में स्वर्गीय इंद्रमणि बडोनी जी द्वारा स्थापित श्री नवजीवन आश्रम इंटर कॉलेज घुत्तू में इंद्रमणि बडोनी जी की विशाल प्रतिमा में माल्यार्पण और पुष्प अर्पण के साथ 41 वीं ऐतिहासिक खतलिंग हिमालय जागरण महायात्रा पूर्ण हुई।













