पंजाब में सत्ताधारी पार्टी के विधायक के मौसेरे भाई ने बठिंडा जिले के कस्बे माईसरखाना में स्थित महामाई ज्वाला जी के मंदिर का घोर अपमान किया। इसके विरोध में विभिन्न हिंदू संगठनों के सदस्यों ने सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन किया और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए हिंदू संगठन और भाजपा नेता
इसमें महावीर दल के एडवोकेट राजन गर्ग, भाजपा के जिलाध्यक्ष बठिंडा शहरी सरूप चंद सिंगला, प्रांतीय महासचिव दयाल सोढी, भाजपा नेत्री परमपाल कौर मलूका, सुखपाल सरां, भाजपा नेता सह मीडिया प्रभारी सुनील सिंगला, विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष हरप्रीत सिंह गिल, धार्मिक नेता अमृतपाल गिरी, आरएसएस के रमणीक वालिया सहित विभिन्न मंडियों से आए हिन्दू नेता प्रदर्शन में शामिल हुए।
आरोपियों पर केस दर्ज करने की मांग
सरूप सिंगला ने मांग की कि दोषियों पर केस दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए। प्रदर्शनकारी पंजाब सरकार और पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करते हुए जिलाधीश कार्यालय के बाहर पहुंचे तथा वहां कई घंटे तक धरना दिया। सुखपाल सरां ने बताया कि एसपी सिटी नरेंद्र सिंह के इस आश्वासन के बाद कि आरोपियों पर केस दर्ज किया जाएगा, प्रदर्शन समाप्त किया गया।
क्या है मामला..?
मंदिर के महंत और सनातन धर्म महावीर दल के प्रधान श्री सरूप बिहारी शरण ने भुच्चो मंडी के कोटफत्ता थाना की पुलिस को दी शिकायत में बताया कि विधानसभा क्षेत्र मौड़ मंडी के विधायक सुखबीर सिंह माइसरखाना के मौसेरे भाई भोला सिंह अपने साथी भगवंत सिंह उर्फ भंता व 200-250 लोग 5 अक्तूबर को दोपहर 12 बजे मंदिर में आ धमके।
हमलावरों का मंदिर में प्रवेश और गाली गलौच
उस समय मंदिर प्रबंधक कमेटी की बैठक चल रही थी। हमलावरों ने आकर गाली गलौच करना शुरू कर दिया और कई हमलावर बूट व चप्पलों सहित महामाई के दरबार में घुस गए। वहां उन्होंने प्रबंधक कमेटी के लोगों के साथ दुर्व्यवहार किया। शिकायत में बताया गया है कि हमलावर मंदिर कमेटी पर कब्जा करना चाहते हैं, जिसके चलते इस घटना को अंजाम दिया गया।
हमलावरों ने की बदसलूकी और धमकियां
हमलावरों ने प्रबंधक कमेटी के सदस्यों को गालियां दीं और कईयों को कुर्सी से उठा कर जमीन पर बैठने को मजबूर किया। इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में गहरा रोष फैल गया और पूरे इलाके में तनाव का माहौल बन गया।
क्या है मंदिर का इतिहास
माईसरखाना मंदिर पंजाब के मालवा इलाके का सिद्ध शक्तिपीठ है। कथा के अनुसार, 1515 ई. में यहां रहने वाला किसान बाबू कमालू दास, नथाना वाले बाबा कालूराम का शिष्य था। कमालू भक्त हर साल अपने गुरु बाबा कालूनाथ जी के साथ ज्वाला जी दर्शन के लिए जाया करता था।
देवी मां ने दिए दर्शन, मंदिर निर्माण का आदेश
सालों बाद जब कमालू बूढ़ा हो गया और यात्रा करने में असमर्थ हुआ, तो उसने देवी मां से प्रार्थना की कि अब शायद अगली बार न आ सकूं। इस पर देवी मां ने जोत में दर्शन दिए और कहा कि अपने गांव में मंदिर बनवाओ। साथ ही आशीर्वाद दिया कि हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्र की छठ को माईसरखाना के मंदिर में मेरी जोत प्रकट होगी।
श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना माईसरखाना मंदिर
गांववालों ने कमालू भक्त के सहयोग से मंदिर का निर्माण किया और समय के साथ यह प्रसिद्ध हुआ। उसी दिन से प्रत्येक बरस दोनों नवरात्रों में माता की ज्योति जलती है। षष्ठी को यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें बठिंडा ही नहीं बल्कि पूरे उत्तर भारत से पांच लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां मां की ज्योति के दर्शन से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

















